रोहिणी नौतपा भारतीय पारंपरिक ज्योतिष और लोक मान्यताओं में ग्रीष्म ऋतु के सबसे अधिक गर्म दिनों को कहा जाता है। यह वह समय माना जाता है जब सूर्य रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करता है और लगभग 9 दिनों तक अत्यधिक गर्मी पड़ती है। इसी कारण इसे “नौतपा” कहा जाता है — अर्थात नौ दिनों की तीव्र तपन। सूर्य देव हर साल 25 मई को रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करते हैं। इस के साथ ही ज्येष्ठ महीने के सबसे गर्म 9 दिनों, नौतपा की शुरुआत होती है। भारतीय परंपरा में महत्व एवं लोक मान्यता के अनुसार नौतपा के दौरान अच्छी गर्मी पड़ना मानसून के लिए शुभ माना जाता है। कहा जाता है कि यदि इन दिनों पर्याप्त गर्मी हो, तो वर्षा अच्छी होती है, किसान इसे खेती और वर्षा चक्र से जोड़कर देखते हैं। यह वैज्ञानिक नियम नहीं है, लेकिन लंबे अनुभवों के मौसम ज्ञान पर आधारित है। ज्योतिष और लोक-परंपराओं के अनुसार, नौतपा का न तपना भारी नुकसान का संकेत माना जाता है। यदि इन 9 दिनों में गर्मी नहीं पड़ती या बारिश हो जाती है, तो मानसून चक्र प्रभावित होता है, कीट-पतंगों की संख्या बढ़ जाती है और फसलों को भारी नुकसान होने की आशंका रहती है। इन नौ दिनों में यदि बारिश हो जाय, तो कहते हे नौतपा गल गया। नौतपा में धरती पर तेज गर्मी अपने चरम पर होती है। आमतौर पर यह अवधि मई के अंत से जून की शुरुआत तक (25 मई से 2 जून ) मानी जाती है। इस दौरान तापमान तेजी से बढ़ता है, लू चलती है और दिन बेहद तपने वाले होते हैं। नौतपा के दौरान सूर्य रोहिणी नक्षत्र में स्थित होता है , सूर्य का उत्तरी गोलार्ध की ओर अधिक झुकाव होता है। इस अवधि में सूर्य की किरणें अधिक सीधी पड़ती हैं, भूमि अत्यधिक गर्म हो जाती है, लू चलती है, तापमान वर्ष के उच्चतम स्तर पर पहुँच सकता है। इस समय पृथ्वी अपनी धुरी पर ऐसे झुकी होती है कि सूर्य की किरणें उत्तरी गोलार्ध (विशेष रूप से भारत जैसे देशों में) पर बिल्कुल सीधी और लंबवत पड़ती हैं, जिससे इन 9 दिनों में पृथ्वी पर गर्मी अपने चरम पर होती है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इस अवधि (मई के अंत से जून की शुरुआत) के दौरान सूर्य पृथ्वी के सबसे करीब या भूमध्य रेखा के सबसे करीब होता है। पृथ्वी का अपनी कक्षा में लगभग (23.5^) झुकाव होने के कारण, सूर्य की किरणें उत्तरी गोलार्ध में बहुत कम दूरी तय करके सीधे सतह पर पहुंचती हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से पृथ्वी और सूर्य की स्थिति, वायुमंडलीय परिस्थितियों तथा गर्म हवाओं के कारण यह समय अत्यधिक गर्म होता है। नवतपा के दौरान सावधानियाँ : दोपहर में धूप से बचें, पर्याप्त पानी पिएँ, हल्के सूती कपड़े पहनें, नींबू पानी आदि लें, बच्चों और बुजुर्गों का विशेष ध्यान रखें। जलवायु परिवर्तन और पृथ्वी के बढ़ते तापमान आज पूरी दुनिया के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं। इसके पीछे अनेक वैज्ञानिक कारण कार्य कर रहे हैं। सरल शब्दों में समझें तो पृथ्वी का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है, जिससे मौसम के स्वरूप, वर्षा चक्र, समुद्र स्तर और प्राकृतिक संतुलन पर प्रभाव पड़ रहा है। गर्मी में बढ़ते तापमान और भीषण लू (हीटवेव) के पीछे मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन, ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन, और शहरों में पेड़ों की कटाई के कारण बढ़ता अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव है。बढ़ते तापमान और इसके लगातार विकराल रूप लेने के प्रमुख कारण जलवायु परिवर्तन , जीवाश्म ईंधन के अत्यधिक उपयोग और वनों की कटाई के कारण कार्बन डाइऑक्साइड (CO_2) और मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैसें वायुमंडल में जमा हो रही हैं। ये गैसें सूर्य की गर्मी को सोख लेती हैं और उसे अंतरिक्ष में जाने से रोकती हैं, जिससे पृथ्वी का औसत तापमान बढ़ रहा है。शहरी ऊष्मा द्वीप शहरों में कंक्रीट, डामर (कोलतार) वाली सड़कें और बहुमंजिला इमारतें दिन भर गर्मी को सोख लेती हैं और रात के समय उसे छोड़ती हैं। इसके अलावा, पेड़ों की अंधाधुंध कटाई से प्राकृतिक हरियाली खत्म हो गई है। वनों की कटाई पेड़ों के कटने से छाया और प्राकृतिक वाष्पीकरण की प्रक्रिया कम हो जाती है, जिससे आसपास के वातावरण में नमी घट जाती है और तापमान में उछाल आता है।मार्च-अप्रैल और मई के महीनों में धूल भरी आंधी और हल्की बारिश से तापमान में गिरावट आती है। इनमें कमी आने और वायुमंडल में उच्च दबाव का क्षेत्र बनने से गर्म हवाएं नीचे की तरफ धकेली जाती हैं, जिससे भीषण लू की स्थिति बनती है। प्रशांत महासागर में पानी के गर्म होने से भी मौसम का चक्र प्रभावित होता है, जो भारत और अन्य क्षेत्रों में हवाओं के पैटर्न और मानसून को बदल देता है, जिससे गर्मी का प्रकोप बढ़ जाता है। गर्मियों में बढ़ते तापमान के कारण स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव, जैसे हीटस्ट्रोक से बचने के लिए हमेशा पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं।बाहर निकलते समय सिर और चेहरे को सूती कपड़े से ढक कर रखें। ग्रीनहाउस प्रभाव ,पृथ्वी के वायुमंडल में कुछ गैसें ऐसी होती हैं जो सूर्य से आने वाली ऊष्मा को रोककर पृथ्वी को गर्म बनाए रखती हैं। इन्हें ग्रीनहाउस गैसें कहते हैं। मुख्य ग्रीनहाउस गैसें कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ-2), मीथेन नाइट्रस ऑक्साइड जलवाष्प, क्लोरोफ्लोरोकार्बन। इन गैसों की सामान्य मात्रा पृथ्वी पर जीवन के लिए आवश्यक है, लेकिन जब इनकी मात्रा अत्यधिक बढ़ जाती है, तब अधिक ऊष्मा वायुमंडल में फँस जाती है और पृथ्वी का तापमान बढ़ने लगता है। जीवाश्म ईंधनों का अत्यधिक उपयोग, औद्योगिक क्रांति के बाद से मानव द्वारा कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस का अत्यधिक उपयोग किया जाने लगा।इनके जलने पर बड़ी मात्रा में सीओ-2 उत्पन्न होती है।वाहन, बिजली उत्पादन संयंत्र, उद्योग, एयर कंडीशनर और मशीनें आदि इसके मुख्य कारण है। रासायनिक अभिक्रिया इससे वायुमंडल में सीओ-2 की मात्रा लगातार बढ़ती जा रही है। वनों की कटाई , पेड़-पौधे प्रकाश संश्लेषण द्वारा सीओ-2 को अवशोषित करते हैं और ऑक्सीजन छोड़ते हैं।जब बड़े पैमाने पर जंगल काटे जाते हैं, सीओ-2 अवशोषण कम हो जाता है, वायुमंडल में कार्बन बढ़ता है, तापमान वृद्धि तेज होती है औद्योगीकरण और प्रदूषण, कारखानों से निकलने वाला धुआँ, रसायन और गैसें वायुमंडल को प्रदूषित करती हैं। थर्मल पावर प्लांट, सीमेंट उद्योग, स्टील उद्योग, रासायनिक उद्योग, इनसे ग्रीनहाउस गैसों के साथ-साथ सूक्ष्म कण भी निकलते हैं, जो पर्यावरण और स्वास्थ्य दोनों को प्रभावित करते हैं। वाहनों की बढ़ती संख्या, डीजल और पेट्रोल से चलने वाले वाहन, सीओ-2, कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसी गैसें छोड़ते हैं। आज महानगरों में तापमान वृद्धि का एक बड़ा कारण कंक्रीट, डामर सड़कें, कम हरियाली, गर्मी को अधिक अवशोषित करती हैं। मीथेन गैस का बढ़ना, मीथेन सीओ-2 से कई गुना अधिक प्रभावशाली ग्रीनहाउस गैस है। ओजोन परत में क्षति, ओजोन परत सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों से पृथ्वी की रक्षा करती है। सीएफसी गैसों के कारण ओजोन परत कमजोर होती है। ताप संतुलन प्रभावित होता है, यूवी विकिरण बढ़ता है। पर्यावरणीय असंतुलन उत्पन्न होता है। समुद्र और बर्फ पर प्रभाव, बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियर पिघल रहे हैं, ध्रुवीय बर्फ घट रही है, समुद्र स्तर बढ़ रहा है, बर्फ के पिघलने से पृथ्वी की परावर्तन क्षमता कम हो जाती है। जब बर्फ कम होती है, तो पृथ्वी अधिक ऊष्मा अवशोषित करती है। जनसंख्या वृद्धि और ऊर्जा की मांग, जनसंख्या बढ़ने से ऊर्जा खपत बढ़ती है, वाहन बढ़ते हैं, उद्योग बढ़ते हैं, प्राकृतिक संसाधनों का दोहन बढ़ता है, जिससे कार्बन उत्सर्जन में वृद्धि होती है। समाधान एवं रोकथाम, दुनिया के कई देश जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए मिलकर कार्य कर रहे हैं। व्यक्तिगत स्तर पर पेड़ लगाना, ऊर्जा बचाना, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग, प्लास्टिक कम करना इत्यादि शामिल हे जलवायु परिवर्तन मुख्यतः मानव गतिविधियों के कारण उत्पन्न समस्या है। जीवाश्म ईंधनों का उपयोग, वनों की कटाई, औद्योगिक प्रदूषण और बढ़ती ऊर्जा खपत ने पृथ्वी के तापमान को तेजी से बढ़ाया है। यदि समय रहते वैज्ञानिक उपाय और पर्यावरण संरक्षण के प्रयास नहीं किए गए, तो भविष्य में इसका प्रभाव और अधिक गंभीर हो सकता है। ईएमएस / 01 जून 26