लेख
01-Jun-2026
...


केंद्र सरकार और राज्य सरकारों द्वारा ओरल कैंसर के मामलों को रोकने के लिए पिछले 12 वर्षों से गुटखा प्रतिबंध लागू कर रखा है। इसके बाद भी ओरल कैंसर के मरीजों की संख्या कम होने के स्थान पर साल-दर-साल बढ़ती चली जा रही है। सरकारी दावे और जमीनी हकीकत दोनों एक दूसरे के विपरीत हैं। 1 अप्रैल 2012 को मध्य प्रदेश सरकार ने गुटके पर प्रतिबंध लगाया था, उसके बाद गुटखा कंपनियों ने तुम डाल-डाल हम पात-पात की नीति अख्तियार करते हुए पैकिंग को बदल दिया। पान मसाला और तंबाकू की पैकिंग को अलग-अलग करते हुए ग्राहकों को पान मसाला के साथ तंबाकू के पैकेट को भी साथ में दिया जाने लगा, जिसके कारण सरकार ने जो प्रतिबंध लगाया था वह एक छलावा बनकर रह गया है। सरकार के आदेश पर गुटखा की पैकिंग में यह चेतावनी भी प्रकाशित की जाने लगी कि गुटखा खाना जानलेवा है। इस प्रकार प्रतिबंध लगाते समय जो सरकार ने सोचा था ठीक उसके विपरीत परिणाम देखने को मिल रहे हैं। तंबाकू और पान मसाला की पैकिंग अलग-अलग होने के कारण पहले निश्चित मात्रा में गुटखा के पाउच के साथ मिली हुई तंबाकू आती थी, लेकिन जब से पैकिंग अलग हुई है उसके बाद लोगों ने ज्यादा तंबाकू खाना शुरू कर दिया है, वह अपनी इच्छा के अनुसार पान मसाले में तंबाकू मिला लेते हैं। हाल ही में मध्य प्रदेश के जवाहरलाल नेहरू कैंसर अस्पताल के जो आंकड़े सामने आए हैं उसके अनुसार पिछले 14 वर्षों में ओरल कैंसर के मामले 42 फ़ीसदी तक बढ़ गए हैं। हर साल इसमें वृद्धि देखने को मिल रही है। 2012 में इस अस्पताल में 1836 ओरल कैंसर के मरीज आए थे जो 2025 में बढ़कर 2614 हो गए। यह केवल एक कैंसर हॉस्पिटल का आंकड़ा है। देश में इस बीच में कई कैंसर के नए अस्पताल खुले हैं, उनमें भी ओरल कैंसर के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ती चली जा रही है। कैंसर हॉस्पिटल और डॉक्टरों द्वारा इस पर चिंता व्यक्त की जा रही है। सरकार के प्रतिबंध लगाने के बाद गुटखा खाने वालों की संख्या पहले की तुलना में और ज्यादा बढ़ी है। पान मसाला और तंबाकू की अलग-अलग पैकिंग होने के कारण तंबाकू बड़े पैमाने पर खाई जा रही है। ओरल कैंसर के मरीज जो गुटखा खाते हैं कुछ समय के बाद उनका मुंह पूरा नहीं खुलता है। तंबाकू में मौजूद हानिकारक नाइट्रोसामाइंस गलों के अंदर की कोशिकाओं के डीएनए को सीधे नुकसान पहुंचाते हैं। इसके बाद इसमें ट्यूमर बनने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। पान मसाला में चूना मुंह की त्वचा को नुकसान पहुंचता है। तंबाकू में मौजूद निकोटिन और कर्सीनोजेनिक रसायन खून के साथ मिलकर तेजी के साथ ट्यूमर बनाने की प्रक्रिया में शामिल होते हैं, जिसके कारण ओरल कैंसर के मरीज का मुंह पूरा नहीं खुल पाता है, उसे खाने-पीने में तकलीफ होने लगती है। लगातार दर्द बढ़ता चला जाता है। ऐसी हालत में ओरल कैंसर के मरीज को ठीक कर पाना बहुत मुश्किल होता है। सरकार तरह-तरह के नियम और कानून बनाती है लेकिन उनका पालन कागजों तक सीमित होकर रह जाता है। जमीनी हकीकत ठीक इसके विपरीत होती है। गुटखा के इस कारोबार में भारी पैसा गुटका कंपनी कमाती हैँ, जितना गुटका एक नंबर में बिकता है उससे कई गुना ज्यादा गुटका दो नंबर में बिकता है, जिसके कारण सरकार को एक्साइज ड्यूटी और जीएसटी का बड़ा नुकसान उठाना पड़ता है। विज्ञापनों पर भी प्रतिबंध लगाया गया है लेकिन पान पसंद पान मसाला के नाम पर बड़े पैमाने पर विज्ञापन प्रकाशित किए जाते हैं। प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और सोशल मीडिया में गुटका कंपनियों के विज्ञापन पहले की तुलना में और भी बढ़ गए हैं। सरकार के पास सही आंकड़े उपलब्ध नहीं होते हैं। गुटखा कंपनियों के इस कारोबार में खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण की कोई निगरानी नहीं होती है। इसके पास निगरानी करने के लिए पर्याप्त संख्या में अधिकारी और कर्मचारी ही नहीं है। ऐसी स्थिति में खाद्य सुरक्षा के नाम पर गुटखा कंपनियों से वसूली करके यह विभाग आंख मूंद लेता है। गुटका का उत्पादन और विक्रय अघोषित तरीके से होने के कारण पुलिस, आयकर विभाग, जीएसटी, एक्साइज विभाग इत्यादि सभी की मिलीभगत होती है जिसके कारण ओरल कैंसर को रोकने के लिए सरकार द्वारा समय-समय पर जो भी प्रयास किए गए हैं वह सब कागजों तक सीमित रह गए हैं। केंद्र सरकारों और राज्य सरकारों का दायित्व है कि वह केवल तंबाकू को कैंसर का कारण मानकर आंख मूँदकर नहीं बैठे रहें। खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण के नियमों का पालन सुनिश्चित हो इसके लिए पर्याप्त संख्या में अधिकारियों और कर्मचारियों को तैनात करें, जो खाने-पीने की सभी चीजों का समय-समय पर परीक्षण करें। घातक रसायन और तंबाकू इत्यादि के जो उत्पाद हैं उनका उन पर किस तरह से नियंत्रण हो इसके लिए युद्ध स्तरीय प्रयास करने होंगे। कैंसर का इलाज काफी महंगा और काफी लंबा होता है, मरीज तो एक होता है लेकिन इसका खामियाजा पूरे परिवार को भुगतना पड़ता है। सर्वोच्च प्राथमिकता के आधार पर केंद्र एवं राज्य सरकारों को खाद्य सुरक्षा के मानकों को लागू करना समय की सबसे बड़ी जरूरत है। इस पर कोई भी लापरवाही होगी इसका खामियाजा सामाजिक और आर्थिक रूप में सभी को होगा। आशा करते हैं कि सरकार इस समस्या पर सर्वोच्च प्राथमिकता के अनुसार ऐसे निर्णय ले, जो जमीनी स्तर पर कामयाब हों। इसके लिए सरकार को एक जिम्मेदार तंत्र तैयार करना पड़ेगा यदि वह ठीक तरीके से काम नहीं करे, तो उसे दंडित करने का भी प्रावधान करना होगा तभी जाकर कैंसर जैसी बीमारी को बढ़ने से रोका जा सकता है। ईएमएस / 01 जून 26