क्षेत्रीय
02-Jun-2026
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- 25 साल बाद लीनियर एक्सीलेटर मशीन देगी सटीक इलाज जबलपुर (ईएमएस)। मेडिकल साइंस में एक मशीन पूरे इलाके की तकदीर बदल दे, ऐसा कम होता है। जबलपुर में ठीक वैसा ही होने जा रहा है। नेताजी सुभाषचंद्र बोस मेडिकल कॉलेज के स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट (एससीआई) में 25 साल से चली आ रही कोबाल्ट मशीनों की विदाई तय हो गई है। उनकी जगह अब वो तकनीक ले रही है जिसे दुनिया कैंसर के खिलाफ स्मार्ट हथियार कहती है: लीनियर एक्सीलेटर मशीन| यह बदलाव सिर्फ एक मशीन का नहीं है। यह महाकौशल, विंध्य और बुंदेलखंड के 13 जिलों के उन लाखों परिवारों के लिए उम्मीद है जो अब तक इलाज के लिए ट्रेनों में रातें काटते थे। भोपाल, इंदौर, दिल्ली, मुंबई की भीड़भाड़ में बेड ढूंढते थे। अब लड़ाई घर से लड़ी जाएगी। आखिर 25 साल क्यों लग गए?........ 1999 के आसपास जब देश के बड़े कैंसर सेंटर लीनियर एक्सीलेटर की तरफ शिफ्ट हो रहे थे, जबलपुर स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट कोबाल्ट-60 मशीनों पर टिका रहा। कोबाल्ट तकनीक अपने समय में क्रांतिकारी थी, पर उसकी सीमाएं साफ थीं। रेडिएशन की बीम कम सटीक होती है। ट्यूमर के साथ आसपास के स्वस्थ अंग भी चपेट में आ जाते हैं। साइड इफेक्ट ज्यादा, और रिकवरी धीमी होती है। डॉक्टर बताते हैं कि ब्रेस्ट, प्रोस्टेट, ब्रेन और हेड-नेक कैंसर जैसे मामलों में जहां मिलीमीटर का फर्क जिंदगी-मौत तय करता है, वहां कोबाल्ट अब आउटडेटेड मानी जाती है। मरीजों का दर्द यही था कि जबलपुर में इलाज तो था, पर सबसे अच्छा इलाज नहीं था। गंभीर केस रेफर कर दिए जाते थे। गरीब मरीज कई बार इलाज ही छोड़ देते थे क्योंकि महानगरों का खर्च और ठहरना उनके बस का नहीं था। लीनियर एक्सीलेटर: कैंसर पर सर्जिकल स्ट्राइक.......... अब जो मशीन आ रही है, वो रेडिएशन को बंदूक की गोली की तरह नहीं, बल्कि लेजर बीम की तरह टारगेट करती है। ये कैसे काम करती है?.............. लीनियर एक्सीलेटर हाई-एनर्जी एक्स-रे या इलेक्ट्रॉन पैदा करता है। 3डी इमेजिंग और कंप्यूटर प्लानिंग से पहले ट्यूमर का पूरा नक्शा बनाया जाता है। फिर बीम को इतना शेप किया जाता है कि वो सिर्फ ट्यूमर के आकार की हो। ट्यूमर के चारों ओर घूमकर ये मशीन अलग-अलग एंगल से वार करती है। नतीजा: ट्यूमर पर फुल डोज, लेकिन किडनी, फेफड़े, दिल जैसे पास वाले अंगों पर नाममात्र का असर। मरीज को सीधा फायदा क्या?............. मुंह में छाले, स्किन जलना, हमेशा थकान जैसी दिक्कतें 60-70प्रतिशत तक कम हो जाती हैं। कुछ कैंसर में इलाज के सेशन 30 से घटकर 5 रह जाते हैं। इसे एसबीआरटी कहते हैं। बच्चों का शरीर रेडिएशन के प्रति ज्यादा संवेदनशील होता है। सटीक बीम से उनके ग्रोथ और ब्रेन डेवलपमेंट को बचाया जा सकता है। कोबाल्ट से एक बार रेडिएशन ले चुके अंग पर दोबारा देना रिस्की था। लीनियर एक्सीलेटर से री-ट्रीटमेंट संभव है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक आधुनिक कैंसर केयर का बेसिक इंफ्रा लीनियर एक्सीलेटर ही है। जबलपुर का इस लीग में शामिल होना बड़ी छलांग है। सिर्फ मशीन नहीं, पूरा इकोसिस्टम बदल रहा.............. खबर सिर्फ लीनियर एक्सीलेटर की नहीं है। इसके साथ पीपीपी मोड पर पीईटी-सीटी स्कैन भी शुरू हो रहा है। इसे समझिए। कैंसर का इलाज शुरू करने से पहले सबसे जरूरी है स्टेजिंग यानी यह पता करना कि कैंसर शरीर में कितना फैला है। पीईटी-सीटी स्कैन शरीर का एक तरह का गूगल मैप बना देता है। इसमें रेडियोएक्टिव शुगर का इंजेक्शन दिया जाता है। कैंसर कोशिकाएं नॉर्मल कोशिकाओं से ज्यादा शुगर खाती हैं, इसलिए स्कैन में वो चमकने लगती हैं। छाती का छोटा सा ट्यूमर हड्डी तक पहुंचा है या नहीं, यह 30 मिनट में पता चल जाता है। अभी स्थिति ये है कि पूरे संभाग में सरकारी स्तर पर ये सुविधा नहीं है। प्राइवेट में खर्च 25 से 30 हजार रुपये आता है। पीपीपी मोड में रेट तय होंगे, जिससे आम आदमी की पहुंच में आएगा। सही स्टेजिंग का मतलब है सही इलाज। कई बार बिना पीईटी के मरीज को कम या ज्यादा रेडिएशन दे दिया जाता है। वो गलती अब रुकेगी। बंकर से लेकर ब्रेन तक तैयारी.......... ऐसी मशीनें लाना प्लग-एंड-प्ले नहीं होता। इसके लिए 6 फीट मोटी कंक्रीट की दीवारों वाला बंकर चाहिए होता है ताकि रेडिएशन बाहर लीक न हो। एससीआई में यह हाई-टेक बंकर पिछले साल ही कंप्लीट कर लिया गया था। मेडिकल कॉलेज के डीन डॉ. नवनीत सक्सेना बताते हैं कि मशीन के पार्ट्स की शिपमेंट जबलपुर आ चुकी है। अब काम तीन लेवल पर चल रहा है यूरोप से आई इंजीनियरों की टीम और कंपनी के एक्सपर्ट मशीन को असेंबल कर रहे हैं। फिजिसिस्ट हर बीम एंगल को नापेंगे। 1एमएम की गलती भी मरीज पर भारी पड़ सकती है, इसलिए 2 महीने सिर्फ टेस्टिंग में लगेंगे। जबलपुर के रेडिएशन ऑन्कोलॉजिस्ट, टेक्नीशियन और नर्सों को नई प्रोटोकॉल पर ट्रेन किया जा रहा है। आईएमआरटी, व्हीएमएटी, आईजीआरटी जैसी एडवांस तकनीक अब यहां रोजमर्रा का हिस्सा होंगी। मेडिकल कॉलेज का लक्ष्य है कि दिसंबर 2026 तक पहला मरीज इस मशीन पर ट्रीट हो जाए। मेडिकल टूरिज्म का उल्टा फ्लो शुरू होगा............. आज की तारीख में स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट में हर साल 8 से 10 हजार नए कैंसर मरीज रजिस्टर होते हैं। इनमें से 40 प्रतिशत को सिर्फ इसलिए नागपुर, भोपाल या मुंबई रेफर करना पड़ता है क्योंकि जबलपुर में हाई-एंड रेडिएशन नहीं था। दिल्ली में 2 महीने रुकना, कमरा किराया, खाना, आना-जाना और इलाज। ये बिल 2 से 3 लाख तक पहुंच जाता है। कई परिवार जमीन बेच देते हैं। अब यही इलाज जबलपुर में आयुष्मान भारत योजना के तहत लगभग मुफ्त होगा। इसका दूसरा पहलू भी है। जबलपुर अब रेफर आउट सेंटर से रेफर इन सेंटर बनेगा। मंडला, डिंडौरी, उमरिया जैसे आदिवासी जिले जहां से लोग पहले इलाज ही नहीं कराते थे, वहां से अब केस आएंगे। शहडोल, सतना, रीवा के प्राइवेट अस्पताल भी अपने मरीज यहां भेजेंगे। अनुमान है कि 5 साल में स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट की पेशेंट केपेसिटी दोगुनी हो जाएगी। चुनौतियां अभी बाकी हैं.......... सिर्फ मशीन लगा देना इलाज नहीं है। एक्सपर्ट बताते हैं कि इसके लिए लीनियर एक्सीलेटर चलाने के लिए क्वालिफाइड मेडिकल फिजिसिस्ट और आरटीटी टेक्नीशियन चाहिए। मध्यप्रदेश में इनकी भारी कमी है। सरकार को तुरंत पोस्ट क्रिएट करनी होंगी। ये मशीनें करोड़ों की हैं। सालाना एएमसी भी लाखों में होता है। फंड की निरंतरता जरूरी है, वरना मशीन बंद पड़ी रहती है। गांवों में अब भी लोग कैंसर को सजा मानते हैं। झाड़-फूंक में वक्त बर्बाद करते हैं। जब तक स्टेज 1-2 में मरीज नहीं आएगा, सबसे अच्छी मशीन भी जादू नहीं कर सकती। स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट प्रशासन का कहना है कि वो कैंसर स्क्रीनिंग वैन चलाकर गांव-गांव कैंप लगाएंगे। मुंह, ब्रेस्ट और सर्वाइकल कैंसर की शुरुआती जांच वहीं हो जाएगी। एक शहर की नई पहचान......... जबलपुर को अब तक संस्कारधानी और आर्मी बेस के लिए जाना जाता था। अगले साल से इसकी एक नई पहचान सेंट्रल इंडिया का कैंसर केयर हब के रुप में होगी। 25 साल का गैप सिर्फ टेक्नोलॉजी का नहीं था। वो हजारों परिवारों की उम्मीद और हिम्मत का गैप था। एक मां जो अपने बच्चे को लेकर एम्स की लाइन में लगती थी। एक किसान जो कर्ज लेकर मुंबई जाता था। एक बुजुर्ग जो दर्द में कहता था अब जितने दिन कट जाए। लीनियर एक्सीलेटर की बीम जब पहली बार किसी मरीज के ट्यूमर पर पड़ेगी, तो वो सिर्फ रेडिएशन नहीं होगा। वो 25 साल से रुकी हुई उम्मीदों का रिलीज होगा। सुनील साहू / मोनिका / 02 जून 2026/ 05.17