लेख
03-Jun-2026
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आजादी के अमृतकाल से गुजरते भारत में आज जय जवान, जय किसान का नारा केवल राजनीतिक रैलियों और दीवारों पर लिखे विज्ञापनों तक सिमट कर रह गया है। सच तो यह है कि जिसे हम देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहते हैं, वह कृषि क्षेत्र आज नीतिगत उपेक्षा, आर्थिक विसंगतियों, ढांचागत विकास के क्रूर अंतर्विरोधों और जलवायु परिवर्तन के जानलेवा चक्रव्यूह में फंसा हुआ है। देश का पेट भरने वाला अन्नदाता आज अपने ही वजूद को बचाने के लिए एक ऐसे दर्दनाक मोड़ पर खड़ा है, जहाँ व्यवस्था चमचमाते शहरों की चकाचौंध में गांवों की सिसकियों को सुनना भूल गई है। उत्तर के मैदानी इलाकों से लेकर पूर्वोत्तर की वादियों, मध्य भारत के आदिवासी अंचलों, दक्षिण के सूखे पठारों और हिमालय की सर्द घाटियों तक, हर राज्य के किसान की आँखों में एक ही बेबसी और व्यवस्था के खिलाफ एक गहरी टीस साफ देखी जा सकती है। इसी अन्याय के खिलाफ अब देश की सर्वोच्च अदालत की दहलीज पर व्यवस्था के गणित को सीधी चुनौती दी गई है। देश के अन्नदाताओं को न्याय दिलाने के लिए सिफा (कंसोर्टियम ऑफ इंडियन फार्मर्स एसोसिएशन) के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष, श्री प्रकाश पोहरे जी के नेतृत्व में एक ऐतिहासिक जनहित याचिका (PIL) सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई है, जिसका एक ही संकल्प है कि किसान अब मजबूर नहीं, आत्मनिर्भर और मज़बूत बने। इस पूरे मिशन को सिफा के संस्थापक, श्री पी. चेंगल रेड्डी जी का मार्गदर्शन मिल रहा है। देश के 60 से अधिक किसान संगठनों का नेतृत्व करने वाला सिफा पिछले 17 सालों से भारतीय कृषि की दशा और दिशा बदलने में जुटा है। एक गौरवशाली अम्ब्रेला ऑर्गेनाइजेशन के तौर पर, सिफा ने निरंतर संघर्ष किया है और आज न्याय के इस धर्मयुद्ध में प्रख्यात वकील प्रशांत भूषण जी निस्वार्थ भाव से किसानों के साथ खड़े हैं, क्योंकि वो जानते हैं कि यह लड़ाई देश की मिट्टी बचाने की लड़ाई है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस पुकार को स्वीकार कर लिया है, जो इस संघर्ष की सच्चाई का सबसे बड़ा प्रमाण है। अदालत में पहुँचने वाली हर सौ याचिकाओं में से मुश्किल से दो स्वीकार होती हैं, और इस याचिका का स्वीकार होना ही किसानों की पहली और बड़ी जीत है। आखिर सवाल यह है कि अगर आज किसी सरकारी कर्मचारी की तनख्वाह को 15 साल पुराने स्तर पर लाकर खड़ा कर दिया जाए, तो क्या उसका चूल्हा जलेगा? फिर पूरी दुनिया की भूख मिटाने वाला हमारा किसान खुद तंगहाली की बेड़ियों में क्यों जकड़ा है? साल 2012 में जो कपास 10,000 रुपये क्विंटल बिकती थी, आज डेढ़ दशक बाद उसकी न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) घटाकर सिर्फ 8,110 रुपये क्यों कर दी गई? जब खाद, बीज, कीटनाशक और डीजल सब महंगे हैं, तो किसान की मेहनत कौड़ियों के भाव क्यों आंकी जा रही है? किसानी द्वारा की जा रही आत्महत्याएँ कोई इत्तेफाक नहीं हैं, बल्कि ये गलत नीतियों द्वारा किया गया क्रूर शिकार हैं। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट से साफ कहा गया है कि MSP सिर्फ कागज पर लिखी कोई संख्या नहीं, बल्कि किसान का कानूनी अधिकार होना चाहिए, क्योंकि बिना कानूनी गारंटी की MSP, बिना धार की तलवार जैसी है। यदि हम उत्तर और पश्चिम भारत के उन राज्यों पर नजर डालें जिन्हें हम समृद्ध कहने की भूल कर बैठते हैं, तो पंजाब और हरियाणा आज इसी नीतिगत और प्राकृतिक त्रासदी का सामना कर रहे हैं। इन राज्यों ने कभी हरित क्रांति के दौर में अपनी मिट्टी की परवाह किए बिना पूरे देश का पेट भरने के लिए अपने खेतों को झोंक दिया था। लेकिन आज व्यवस्था की अदूरदर्शिता का नतीजा यह है कि वही धान-गेहूं का अत्यधिक फसल-चक्र इन राज्यों के लिए अभिशाप बन चुका है। इन दोनों राज्यों के लगभग अस्सी प्रतिशत प्रशासनिक ब्लॉकों में भूजल का इस कदर अंधाधुंध दोहन हुआ है कि पानी का स्तर चिंताजनक रूप से पाताल में चला गया है। मानो व्यवस्था ने किसान से उसका वर्तमान ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी छीन लिया हो। इस कृषि संकट का सबसे भयावह और संवेदनशील चेहरा महाराष्ट्र के विदर्भ और मराठवाड़ा क्षेत्रों में देखने को मिलता है, जो कपास और सोयाबीन की खेती के बावजूद आज किसानों की कब्रगाह में तब्दील हो चुके हैं। महाराष्ट्र में कृषि संकट की जड़ें संरचनात्मक अभावों में बहुत गहरी हैं, जहाँ सिंचाई परियोजनाओं की कमी के कारण लगभग 80 प्रतिशत खेती पूरी तरह वर्षा-आधारित है। जब भी मानसून दगा देता है या बेमौसम ओलावृष्टि होती है, तो किसान के अरमान खेतों में ही दम तोड़ देते हैं। लागत मूल्य में भारी बढ़ोतरी और वैश्विक बाजार की अनिश्चितता के कारण कपास उत्पादक किसान आढ़तियों और निजी साहूकारों के ऐसे दुष्चक्र में फंस जाता है जिससे निकलने का उसे कोई रास्ता नहीं सूझता। संस्थागत ऋण की जटिल प्रक्रिया के कारण छोटे किसानों को मजबूरी में ऊंचे ब्याज दरों पर कर्ज लेना पड़ता है, और जब फसल का सही दाम नहीं मिलता, तो सम्मान के साथ जीने वाला किसान हताशा में मौत को गले लगा लेता है। महाराष्ट्र में हर साल होने वाली हजारों किसानों की आत्महत्याएं हमारे आर्थिक मॉडल की नैतिक विफलता का दस्तावेज़ हैं। पड़ोसी राज्य राजस्थान में स्थिति और भी विकट है, जहाँ देश की ग्यारह प्रतिशत कृषि भूमि होने के बावजूद सतही जल मात्र एक प्रतिशत ही उपलब्ध है। पानी की इस भीषण किल्लत के बीच राजस्थान और गुजरात के सीमावर्ती इलाकों के किसान खारे पानी की समस्या, लगातार पड़ते सूखे और आवारा पशुओं द्वारा फसलों की बर्बादियों के बीच अपने हक का हिसाब मांग रहे हैं। गुजरात के नकदी फसलों के किसान बाजार में कीमतों के भारी उतार-चढ़ाव और महँगी होती जा रही बिजली व खाद की मार से इस कदर बेहाल हैं कि उनकी रातें खेतों की रखवाली में और दिन कर्जदारों के डर में बीतते हैं। इस संकट का सबसे संस्थागत रूप हमें हिंदी पट्टी के दो सबसे बड़े कृषि राज्यों—बिहार और उत्तर प्रदेश—में देखने को मिलता है। बिहार, जो कभी कृषि के मामले में असीम संभावनाओं से भरा था, आज नीतिगत गलतियों का सबसे बड़ा शिकार है। साल 2006 में एपीएमसी (APMC) यानी मंडी व्यवस्था को खत्म करने के बाद दावा किया गया था कि इससे निजी निवेश आएगा, लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट रही। आज बिहार में मंडी व्यवस्था न होने के कारण पूरा बाजार बिचौलियों और व्यापारियों के रहमोकरम पर है। यहाँ स्थानीय बिचौलिए किसानों की बेबसी का फायदा उठाकर धान और गेहूं को MSP से आधे दामों पर खरीद लेते हैं। सरकारी खरीद के लिए बनाई गई पैक्स (PACS) व्यवस्था भी पूरी तरह वेंटलेटर पर है, जहाँ भुगतान के लिए महीनों इंतजार करना पड़ता है। इस आर्थिक चक्रव्यूह में फंसा बिहार का लघु किसान साल दर साल कर्ज के दलदल में धंसता जा रहा है और अंततः महानगरों में मजदूर बनने के लिए पलायन को मजबूर है। दूसरी तरफ, देश के सबसे बड़े चीनी उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश के किसानों की कहानी मीठे गन्ने की कड़वी सच्चाई जैसी है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर पूर्वांचल तक का गन्ना किसान सालों से अपने भुगतान के लिए चीनी मिलों और सरकार के चक्कर काट रहा है। कानूनन 14 दिनों के भीतर गन्ने का भुगतान हो जाना चाहिए, लेकिन मिलों पर किसानों का करोड़ों रुपया बकाया रहता है। स्थिति यह है कि किसान के घर में शादी हो, बीमारी हो या बच्चों की स्कूल की फीस भरनी हो, उसे अपने ही कमाए पैसों के लिए मिल मालिकों के आगे हाथ फैलाना पड़ता है। गन्ने की बढ़ती लागत और समय पर भुगतान न होने के कारण उत्तर प्रदेश का किसान आर्थिक रूप से पंगु हो चुका है। इसी संकट का एक दूसरा रूप हमें मध्य और पूर्वी भारत के छत्तीसगढ़ और ओडिशा जैसे राज्यों में देखने को मिलता है। छत्तीसगढ़ को हम धान का कटोरा कहते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि राज्य के एक बड़े हिस्से में सिंचाई के पुख्ता साधन आज तक नहीं पहुंच पाए हैं। नतीजतन, किसान केवल साल में एक ही फसल ले पाता है। यहाँ के आदिवासी अंचलों में कोल्ड स्टोरेज की ऐसी भारी कमी है कि टमाटर और अन्य सब्जियां उगाने वाले किसान अक्सर औने-पौने दामों पर फसल बेचने या उसे सड़कों पर फेंककर रोने के लिए मजबूर हो जाते हैं। ओडिशा की कहानी तो कलेजे को चीर देने वाली है, जहाँ का तटीय क्षेत्र हर साल बंगाल की खाड़ी से उठने वाले चक्रवातों और बेमौसम भारी बारिश की मार झेलता है। चक्रवात के कारण समुद्र का खारा पानी जब खेतों में भर जाता है, तो जमीन सालों के लिए बंजर हो जाती है, और ऋण ग्रस्तता के कारण यहाँ के छोटे किसान आज भी सूदखोरों के रहमोकरम पर जीने को विवश हैं। मैदानी इलाकों से इतर जब हम भारत के बागवानी मानचित्र पर नजर डालते हैं, तो पहाड़ों की बर्फीली हवाओं में भी किसानों का गुस्सा सुलगता हुआ दिखाई देता है। हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के शांत पहाड़ी राज्य, जो अपने मीठे सेब के बागानों के लिए जाने जाते हैं, आज अभूतपूर्व संकट से गुजर रहे हैं। हिमाचल में जलवायु परिवर्तन के कारण अब पहाड़ों में सर्दियों के दौरान आवश्यक चिलिंग आवर्स पूरे नहीं हो पा रहे हैं, जिससे उत्पादन पर बहुत बुरा असर पड़ा है। इस मार के बीच सरकार ने पैकेजिंग सामग्री (कार्टन) और फफूंदनाशकों पर टैक्स का बोझ और बढ़ा दिया। यही दर्द जब जम्मू-कश्मीर के सेब उत्पादकों तक पहुँचता है, तो वहाँ सरकार की आयात-निर्यात नीतियां जख्मों पर नमक छिड़कती हैं। ईरान और अन्य देशों से कौड़ियों के भाव आने वाले विदेशी सेब ने घरेलू बाजार में कश्मीरी सेब की मांग को क्रैश कर दिया है। सरकार से आयातित सेब पर शत-प्रतिशत सीमा शुल्क लगाने की मांग अनसुनी रह जाती है, और राष्ट्रीय राजमार्गों पर खराब मौसम या सुरक्षा कारणों से लगने वाले लंबे जाम की वजह से सेब से लदे ट्रक रास्तों में ही सड़ जाते हैं। इन सब से दूर, देश का पूर्वोत्तर क्षेत्र अपनी विशिष्ट भौगोलिक परिस्थितियों के कारण एक अलग ही तरह की उपेक्षा झेल रहा है। असम, मेघालय, मणिपुर और त्रिपुरा जैसे राज्यों में खेती मुख्य रूप से पहाड़ों और वादियों की कठिन परिस्थितियों पर निर्भर है। असम का विशाल मैदानी भाग हर साल ब्रह्मपुत्र नदी में आने वाली प्रलयंकारी बाढ़ में डूब जाता है, जिससे लाखों हेक्टेयर खड़ी फसल मिट्टी में मिल जाती है। इसके विपरीत, पूर्वोत्तर के पहाड़ी इलाकों में कनेक्टिविटी और परिवहन का बुनियादी ढांचा इतना कमजोर है कि किसान अगर अदरक, अनानास या जैविक फसलें उगा भी लें, तो उन्हें देश के बड़े बाजारों तक समय पर पहुंचाना नामुमकिन होता है। स्थानीय स्तर पर प्रोसेसिंग इकाइयों की अनुपस्थिति के कारण ये मूल्यवान उत्पाद खेतों में ही सड़ जाते हैं। कृषि संकट का एक बिल्कुल नया, आधुनिक और क्रूर चेहरा अब गुजरात और राजस्थान के रेतीले और मैदानी इलाकों में दिखाई दे रहा है, जहाँ हरित ऊर्जा (ग्रीन एनर्जी) और सौर कॉरिडोर के विस्तार के नाम पर उपजाऊ जमीनों का बड़े पैमाने पर अधिग्रहण किया जा रहा है। खेतों के बीचों-बीच भारी-भरकम हाई-वोल्टेज टावर और ट्रांसफार्मर खड़े कर दिए जा रहे हैं। सर्कल रेट के नाम पर मिलने वाला मुआवजा बाजार भाव से बेहद कम होता है और इस औद्योगिक विस्तार में किसानों की सहमति को कुचल दिया जाता है। एक बार जब खेत के बीच में विशाल टावर लग जाता है, तो उस जमीन की कीमत हमेशा के लिए शून्य हो जाती है, और हाई-टेंशन तारों के साये में काम करने में जान का जोखिम हमेशा बना रहता है। गुजरात और राजस्थान के कई जिलों में इसे लेकर किसानों के तीखे प्रदर्शन यह बताने के लिए काफी हैं कि कैसे कॉर्पोरेट के फायदे के लिए अन्नदाता को उसकी अपनी ही ज़मीन पर लाचार किया जा रहा है। खेती की इस राष्ट्रव्यापी बदहाली के पीछे लागत की बढ़ती कीमतें, बाजार की अनिश्चितता और त्रुटिपूर्ण आयात-निर्यात नीतियां सबसे बड़े कारण हैं। पूरे देश में डीजल, बीज, कीटनाशक और पैकेजिंग सामग्री की कीमतें जहां लगातार आसमान छू रही हैं, वहीं बाजार में किसान की फसल का मूल्य बिचौलियों की साठगांठ और विदेशी डंपिंग के कारण न्यूनतम समर्थन मूल्य से बहुत नीचे गिर जाता है। आज आवश्यकता केवल चुनावी लाभ के लिए तात्कालिक राहत या कर्ज माफी जैसी लोकलुभावन घोषणाओं की नहीं है; बल्कि पंजाब के गिरते भूजल को बचाने, महाराष्ट्र के किसानों को आत्महत्याओं से उबारने, ओडिशा और असम की बाढ़ व चक्रवात का स्थाई प्रबंधन करने, कश्मीर व हिमाचल के बागवानों को विदेशी आयात की मार से सुरक्षा देने, छत्तीसगढ़ की भंडारण व्यवस्था को दुरुस्त करने, बिहार में बिचौलियों का खात्मा करने, उत्तर प्रदेश में गन्ना किसानों का समयबद्ध भुगतान सुनिश्चित करने और सौर कॉरिडोर परियोजनाओं में किसानों को उचित मुआवजा व उनके लोकतांत्रिक अधिकार देने की है। यह लड़ाई सिर्फ किसी एक संगठन या नेता की नहीं है, बल्कि यह देश के हर किसान के अस्तित्व और उनके बच्चों के भविष्य की लड़ाई है। दिल्ली की अदालत में गूँजती यह आवाज़ अब हर गांव, हर चौपाल और हर किसान तक पहुँचनी चाहिए ताकि देश का अन्नदाता जाग सके, साथ जुड़ सके और अपने हक का हिसाब मांग सके। जय जवान, जय किसान। ईएमएस/03/06/2026