राष्ट्रीय
03-Jun-2026
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-लंबित मुकदमों और जमानत संबंधी समस्याओं ने कारागारों में बढ़ाई भीड़ -देश की न्याय व्यवस्था पर फिर उठे सवाल नई दिल्ली,(ईएमएस)। भारत की जेलों में बंद कैदियों का एक बड़ा हिस्सा अभी तक किसी अपराध में दोषी सिद्ध नहीं हुआ है। आंकड़ों के अनुसार देश की जेलों में बंद कुल कैदियों में से लगभग 73 से 74 प्रतिशत विचाराधीन (अंडरट्रायल) हैं, जिन्हें अपने मामलों में अदालत के अंतिम फैसले का इंतजार है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति देश की न्यायिक प्रक्रिया में देरी और जेल प्रबंधन की गंभीर चुनौतियों को उजागर करती है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक देशभर की जेलों में पांच लाख से अधिक कैदी बंद हैं। इनमें लगभग तीन-चौथाई ऐसे हैं जिनके मामलों का अभी निपटारा नहीं हुआ है। वहीं दोष सिद्ध कैदियों की हिस्सेदारी केवल 25 से 26 प्रतिशत के आसपास है। इस असंतुलन का सीधा असर जेलों की क्षमता पर पड़ रहा है। विशेष चिंता की बात यह है कि विचाराधीन कैदियों में युवाओं की संख्या काफी अधिक है। रिपोर्टों के अनुसार करीब आधे अंडरट्रायल कैदी 18 से 30 वर्ष आयु वर्ग के हैं। सामाजिक विशेषज्ञों का कहना है कि लंबी न्यायिक प्रक्रिया के कारण युवाओं का एक महत्वपूर्ण समय जेलों में बीत जाता है, जिसका उनके भविष्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। निर्धारित क्षमता से अधिक कैदी देश की अधिकांश जेलें अपनी निर्धारित क्षमता से अधिक कैदियों का बोझ उठा रही हैं। राष्ट्रीय स्तर पर जेलों का औसत ऑक्यूपेंसी रेट 120 प्रतिशत से अधिक बताया जाता है। कई राज्यों में स्थिति और भी गंभीर है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की जेलों में क्षमता से लगभग दोगुने कैदी बंद होने की बात सामने आती रही है। इससे कैदियों के रहने, स्वास्थ्य और सुरक्षा संबंधी व्यवस्थाओं पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। विशेषज्ञों के अनुसार मामलों के लंबित रहने की बड़ी वजह अदालतों में मुकदमों का भारी बोझ है। इसके अलावा आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के अनेक आरोपी जमानत राशि जमा नहीं कर पाते या सक्षम कानूनी सहायता हासिल नहीं कर पाते, जिसके कारण उन्हें लंबे समय तक जेल में रहना पड़ता है। सुधार के प्रयास जारी स्थिति में सुधार के लिए विभिन्न स्तरों पर प्रयास किए जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गठित अंडरट्रायल रिव्यू कमेटियां (यूटीआरसी) नियमित रूप से जेलों का निरीक्षण कर ऐसे कैदियों की पहचान करती हैं, जिन्हें कानूनी सहायता या जमानत का लाभ मिल सकता है। इसके अलावा संविधान के अनुच्छेद 39ए के तहत आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को मुफ्त कानूनी सहायता उपलब्ध कराने की व्यवस्था भी है। सरकार ने जेल सुधारों को ध्यान में रखते हुए मॉडल प्रिज़न एंड करेक्शनल सर्विसेज़ एक्ट जैसे प्रावधान भी लागू किए हैं। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि जेलों में भीड़ कम करने और न्याय प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाने के लिए लंबित मामलों के शीघ्र निपटारे, न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने और जमानत प्रक्रिया को सरल बनाने जैसे कदमों की आवश्यकता है। हिदायत/ईएमएस 03जून26