नई दिल्ली,(ईएमएस)। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष इस कदर बढ़ गया है कि पार्टी अब टूटने की कगार पर पहुंच गई है। टीएमसी के इस उभरते आंतरिक संकट ने न केवल राज्य की राजनीति में हलचल बढ़ा दी है, बल्कि भारतीय जनता पार्टी भी इसे राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़े अवसर के रूप में देख रही है। पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि यदि टीएमसी में विभाजन होता है, तो इसका सबसे बड़ा राजनीतिक लाभ केंद्र की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार को संसद में मिल सकता है, जहां कई महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधन विधेयकों को पारित कराने के लिए अतिरिक्त संख्या बल की आवश्यकता है। भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के अनुसार, पश्चिम बंगाल में सत्ता हासिल करना ही एकमात्र लक्ष्य नहीं है, बल्कि असली ध्यान संसद में अपनी स्थिति को मजबूत करने पर है। यदि टीएमसी का असंतुष्ट गुट अलग होकर नया समूह बनाता है, तो उसके सांसद राष्ट्रीय हितों से जुड़े मसलों पर एनडीए सरकार का समर्थन कर सकते हैं। टीएमसी के भीतर मतभेद उस समय खुलकर सामने आए जब कथित पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित किए गए नेता रितब्रत बनर्जी ने पार्टी के 80 में से 58 विधायकों के समर्थन का दावा करते हुए विपक्ष के नेता पद पर अपना दावा ठोक दिया। बाद में उन्होंने इस संख्या के 60 तक होने की बात कही, जो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए एक गंभीर राजनीतिक चुनौती है। बीजेपी इस स्थिति की तुलना महाराष्ट्र में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के विभाजन से कर रही है, जिसने वहां राजनीतिक समीकरण बदल दिए थे। इसके साथ ही आम आदमी पार्टी (आप) में हुए हालिया घटनाक्रम का भी हवाला दिया जा रहा है, जहां राज्यसभा के कई सांसद अलग होकर सरकार के करीब आए। संसद में संख्या बल बढ़ाने की यह कवायद इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अप्रैल में लोकसभा सीटों के पुनर्निर्धारण और सदन की सदस्य संख्या 545 से बढ़ाकर 850 करने से संबंधित संविधान (131वां संशोधन) विधेयक आवश्यक दो-तिहाई बहुमत न मिलने के कारण पारित नहीं हो सका था। इसके अलावा सरकार वन नेशन, वन इलेक्शन विधेयक को भी आगे बढ़ाने की तैयारी में है। इसी रणनीति के तहत भाजपा दक्षिण भारत में द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) के साथ भी संपर्क बढ़ाने की कोशिशों में जुटी है। गृह मंत्रालय परिसीमन विधेयक का ऐसा नया मसौदा तैयार कर रहा है, जिससे दक्षिणी राज्यों की चिंताओं को दूर किया जा सके। पूर्व में कांग्रेस, टीएमसी और डीएमके समेत पूरे विपक्षी गठबंधन ने एकजुट होकर इस विधेयक का विरोध किया था। वर्तमान में टीएमसी के 28 और डीएमके के 22 सांसद हैं। यदि विपक्षी दलों में मतभेद उभरते हैं और टीएमसी का असंतुष्ट गुट एनडीए के पक्ष में आता है, तो सरकार के लिए संवैधानिक संशोधनों के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत का लक्ष्य हासिल करना बेहद आसान हो जाएगा। वीरेंद्र/ईएमएस 05 जून 2026