लेख
06-Jun-2026
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शिक्षा किसी भी राष्ट्र की प्रगति, संस्कृति और सभ्यता की आधारशिला होती है। यह केवल ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि व्यक्ति के चरित्र निर्माण, नैतिक विकास और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना को विकसित करने का सबसे महत्वपूर्ण साधन है। किसी भी देश का भविष्य उसकी शिक्षा व्यवस्था पर निर्भर करता है क्योंकि आज के विद्यार्थी ही कल के नागरिक, वैज्ञानिक, शिक्षक, प्रशासक और राष्ट्रनिर्माता बनते हैं। इसलिए शिक्षा का स्तर कभी गिरना नहीं चाहिए। जब शिक्षा अपनी मूल भावना से भटक जाती है, तब उसका प्रभाव केवल विद्यार्थियों तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरे समाज और राष्ट्र पर पड़ता है। दुर्भाग्य से वर्तमान समय में शिक्षा व्यवस्था अनेक चुनौतियों से घिरी हुई है। पेपर लीक जैसी घटनाएँ, बढ़ता व्यवसायीकरण, नैतिक मूल्यों का ह्रास तथा प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित कर रही हैं। हाल के वर्षों में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं और भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाएँ लगातार सामने आई हैं। यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। कोई भी विद्यार्थी परीक्षा की तैयारी में महीनों और वर्षों तक कठिन परिश्रम करता है। वह अपने सपनों को पूरा करने के लिए दिन-रात एक कर देता है। उसके माता-पिता भी अनेक त्याग और संघर्ष करके उसकी पढ़ाई का खर्च वहन करते हैं। लेकिन जब परीक्षा का प्रश्नपत्र परीक्षा से पहले ही लीक हो जाता है, तब लाखों विद्यार्थियों की मेहनत पर पानी फिर जाता है। ऐसे मामलों में केवल परीक्षा ही रद्द नहीं होती, बल्कि विद्यार्थियों का मनोबल भी टूटता है। उनके मन में व्यवस्था के प्रति अविश्वास उत्पन्न होता है। वे यह सोचने लगते हैं कि क्या ईमानदार परिश्रम का कोई मूल्य नहीं रह गया है। इसलिए पेपर लीक जैसी घटनाएँ केवल प्रशासनिक विफलता नहीं हैं, बल्कि समाज और राष्ट्र पर लगा एक कलंक हैं। शिक्षा का उद्देश्य सदैव ज्ञान, विवेक और संस्कार प्रदान करना रहा है। प्राचीन भारतीय शिक्षा व्यवस्था में विद्यार्थियों को केवल विषयगत ज्ञान ही नहीं दिया जाता था, बल्कि उन्हें सत्य, अहिंसा, अनुशासन, सेवा, करुणा और राष्ट्रभक्ति जैसे जीवन मूल्यों की शिक्षा भी दी जाती थी। गुरु अपने शिष्यों के व्यक्तित्व के समग्र विकास पर ध्यान देते थे। आज स्थिति बदल चुकी है। विद्यालयों और महाविद्यालयों में अंकों, डिग्रियों और रोजगार की चर्चा अधिक होती है, जबकि चरित्र निर्माण और नैतिक शिक्षा पीछे छूटती जा रही है। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य अच्छे नागरिक तैयार करना है, केवल नौकरी पाने वाले व्यक्तियों का निर्माण करना नहीं। वर्तमान समय में शिक्षा अपेक्षित स्तर की नहीं दिखाई देती। इसका एक प्रमुख कारण शिक्षा का बढ़ता व्यवसायीकरण है। आज शिक्षा सेवा से अधिक उद्योग बनती जा रही है। अनेक निजी शिक्षण संस्थानों का मुख्य उद्देश्य गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के बजाय अधिक से अधिक लाभ कमाना बन गया है। विद्यालयों और कॉलेजों की ऊँची फीस सामान्य परिवारों के लिए चिंता का विषय बन चुकी है। प्रवेश प्रक्रिया से लेकर कोचिंग और अन्य सुविधाओं तक हर क्षेत्र में आर्थिक लाभ की प्रवृत्ति दिखाई देती है। शिक्षा अब समाज सेवा का माध्यम कम और व्यापार का साधन अधिक बनती जा रही है। कोचिंग संस्कृति ने भी शिक्षा को प्रभावित किया है। विद्यार्थी विद्यालय की पढ़ाई से अधिक कोचिंग संस्थानों पर निर्भर होते जा रहे हैं। बड़े-बड़े विज्ञापनों और आकर्षक परिणामों के माध्यम से शिक्षा को एक उत्पाद की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है। इससे शिक्षा का मूल स्वरूप प्रभावित हुआ है। विद्यार्थियों पर अत्यधिक प्रतिस्पर्धा का दबाव बढ़ गया है। सफलता को केवल अंकों और रैंक से मापा जाने लगा है। परिणामस्वरूप विद्यार्थी मानसिक तनाव, चिंता और अवसाद जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। शिक्षा के व्यवसायीकरण का एक दुष्परिणाम यह भी है कि समाज में असमानता बढ़ रही है। आर्थिक रूप से सक्षम परिवार अपने बच्चों को महंगे विद्यालयों और कोचिंग संस्थानों में भेज सकते हैं, जबकि गरीब और मध्यम वर्ग के अनेक प्रतिभाशाली विद्यार्थी संसाधनों के अभाव में पीछे रह जाते हैं। शिक्षा का अधिकार सभी को समान अवसर प्रदान करने के लिए है, लेकिन जब शिक्षा अत्यधिक महंगी हो जाती है, तब यह समानता का सिद्धांत कमजोर पड़ने लगता है। आज आवश्यकता केवल पाठ्यक्रम पूरा करने की नहीं, बल्कि विद्यार्थियों में नैतिक और मानवीय मूल्यों का विकास करने की है। बचपन में प्राप्त संस्कार जीवनभर व्यक्ति का मार्गदर्शन करते हैं। माता-पिता और शिक्षक दोनों ही विद्यार्थियों के चरित्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि शिक्षा के साथ संस्कारों का समावेश हो, तो विद्यार्थी केवल सफल पेशेवर ही नहीं बल्कि अच्छे इंसान भी बन सकते हैं। ईमानदारी, अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा, सहिष्णुता और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे गुण शिक्षा के माध्यम से विकसित किए जाने चाहिए। शिक्षकों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। शिक्षक केवल ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा का स्रोत होता है। जब शिक्षक अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करते हैं, तब विद्यार्थी भी उनसे प्रेरणा ग्रहण करते हैं। इसी प्रकार अभिभावकों को भी बच्चों पर केवल अंक प्राप्त करने का दबाव डालने के बजाय उनके व्यक्तित्व विकास पर ध्यान देना चाहिए। शिक्षा का उद्देश्य जीवन को सार्थक बनाना है, केवल परीक्षा में सफलता प्राप्त करना नहीं। सरकार और शिक्षा प्रशासन को भी शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए प्रभावी कदम उठाने चाहिए। परीक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी और सुरक्षित बनाया जाना चाहिए ताकि पेपर लीक जैसी घटनाओं पर पूर्णतः रोक लग सके। दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई होनी चाहिए ताकि भविष्य में कोई भी ऐसी गतिविधियों में शामिल होने का साहस न कर सके। साथ ही, शिक्षा संस्थानों में गुणवत्ता, नैतिकता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी नीतियाँ बनाई जानी चाहिए। नई शिक्षा नीति और विभिन्न सुधारात्मक प्रयास तभी सफल हो सकते हैं जब उनका उद्देश्य केवल तकनीकी और व्यावसायिक दक्षता बढ़ाना न होकर विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास करना हो। शिक्षा को रोजगार से जोड़ना आवश्यक है, लेकिन उसे केवल रोजगार तक सीमित कर देना उचित नहीं है। शिक्षा का संबंध व्यक्ति के विचार, व्यवहार, चरित्र और सामाजिक चेतना से भी है। अंततः कहा जा सकता है कि शिक्षा किसी भी राष्ट्र की सबसे मूल्यवान संपत्ति है। इसका स्तर गिरना पूरे समाज के लिए चिंता का विषय है। पेपर लीक जैसी घटनाएँ विद्यार्थियों की मेहनत और सपनों के साथ अन्याय हैं तथा समाज पर कलंक के समान हैं। शिक्षा का बढ़ता व्यवसायीकरण भी इसकी मूल भावना को कमजोर कर रहा है। आज आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा को पुनः ज्ञान, संस्कार और चरित्र निर्माण का माध्यम बनाया जाए। यदि हम शिक्षा में गुणवत्ता, नैतिकता और समान अवसर सुनिश्चित कर सकें, तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल शिक्षित ही नहीं बल्कि संस्कारित, जिम्मेदार और राष्ट्रहित के प्रति समर्पित नागरिक बनेंगी। यही किसी भी सशक्त और विकसित राष्ट्र की वास्तविक पहचान है। (वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार-स्तम्भकार) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 6 जून /2026