लेख
06-Jun-2026
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भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर आज देश में एक गंभीर बहस चल रही है। एक पक्ष का मानना है, कि 2004 से 2014 के बीच, विशेषकर 2011 तक, भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में शामिल थी। उस दौर में भारत की तुलना चीन, अमेरिका, रुस एवं अन्य यूरोपीय देशों के साथ वैश्विक मंचों पर होने लगी थी। सूचना प्रौद्योगिकी, सेवा क्षेत्र, विनिर्माण तथा लघु एवं मध्यम उद्योगों के विस्तार ने देश को नई आर्थिक ऊँचाइयों तक पहुँचाया था। 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी के दौरान जब अमेरिका और यूरोप की बड़ी-बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ संकट से जूझ रही थीं, तब भारत अपेक्षाकृत मजबूत आर्थिक स्थिति के साथ खड़ा दिखाई दिया। अनेक अर्थशास्त्रियों का मानना था, भारत के विशाल घरेलू बाजार, असंगठित क्षेत्र तथा लघु एवं मध्यम उद्योगों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यही कारण था, उस समय भारत को वैश्विक आर्थिक क्षेत्र के केंद्र बिन्दू के रूप में देखा जाने लगा था। लेकिन 2011 के बाद भारत का राजनीतिक माहौल तेजी से बदला। भ्रष्टाचार के आरोप, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्टों तथा अन्ना हजारे के नेतृत्व में चले जनलोकपाल आंदोलन ने तत्कालीन सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया। सरकार की छवि पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा। इसमें विदेशी ताकतों का हाथ भी बताया जाता है। कारपोरेट जगत भी मनमोहन सरकार के खिलाफ खड़ा हो गया था। इस तरह से सारा विपक्ष कांग्रेस और मनमोहन के खिलाफ खड़ा हो गया था। अंततः 2014 में सत्ता परिवर्तन हुआ। आलोचकों का आरोप है कि उस समय देश की आडिट रिपोर्ट में लगाए गए कई आर्थिक नुकसान के अनुमान न्यायिक प्रक्रिया में प्रमाणित नहीं हो सके, काल्पनिक आरोपों से तब तक राजनीतिक माहौल पूरी तरह बदल चुका था। वर्तमान आर्थिक परिदृश्य को लेकर भी गंभीर प्रश्न उठाए जा रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि पिछले एक दशक में ऐसी नीतियाँ अपनाई गईं, जिनसे बड़े कॉर्पोरेट समूहों को लाभ मिला, जबकि लघु एवं मध्यम उद्योगों तथा असंगठित क्षेत्र को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। नोटबंदी, जीएसटी के प्रारंभिक क्रियान्वयन और महामारी के प्रभाव ने छोटे व्यवसायों की कमर तोड़ दी। लाखों सूक्ष्म इकाइयाँ बंद हुईं। रोजगार के अवसर सिमटते चले गए। अर्थ- व्यवस्था में एक अन्य चिंता भारत के बढ़ते आयात और घटती विनिर्माण क्षमता को लेकर है। चीन से बड़े पैमाने पर उपभोक्ता वस्तुओं, इलेक्ट्रॉनिक्स और औद्योगिक उत्पादों का आयात लगातार बढ़ा है। इसके विपरीत भारत की निर्यात वृद्धि अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँच पाई। इससे व्यापार घाटा बढ़ा है। जिससे आर्थिक आत्मनिर्भरता के दावों पर भी प्रश्नचिह्न लगा है। बढ़ती बेरोजगारी, महँगाई और घरेलू ऋण चिंता के विषय बने हुए हैं। किसानों को उनकी उपज का मूल्य नहीं मिल रहा है। किसान कर्जदार और खेती मंहगी होती जा रही है। आम नागरिक की क्रय-शक्ति घट गई है। शिक्षा, स्वास्थ्य, खाद्यान्न और आवश्यक सेवाएँ लगातार महँगी होती जा रही हैं। दूसरी ओर, शेयर बाजार में तेजी और कॉर्पोरेट मुनाफों के बावजूद आम जनता की आर्थिक स्थिति में अपेक्षित सुधार दिखाई नहीं देता। इससे आर्थिक विकास और सामाजिक वास्तविकताओं के बीच का अंतर बढ़ गया है। आम आदमी की आय में आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपया की स्थिति बनी हुई है। आज आवश्यकता इस बात की है कि आर्थिक नीतियों का केंद्र केवल बड़े निवेश और कॉर्पोरेट लाभ न होकर रोजगार सृजन, लघु उद्योगों का संरक्षण, कृषि क्षेत्र की मजबूती तथा घरेलू मांग में विस्तार हो। भारत की वास्तविक शक्ति उसके करोड़ों छोटे उद्यमियों, किसानों, श्रमिकों और मध्यम वर्ग में निहित है। यदि आर्थिक विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुँचता, तो ऊँची विकास दर का सपना- सपना बनकर ही रह जायेगा। भारत के सामने चुनौती केवल विकास दर बढ़ाने की नहीं, बल्कि समावेशी और टिकाऊ विकास सुनिश्चित करने की है। आने वाले वर्षों में यही तय करेगा कि भारत वैश्विक दौड़ में आर्थिक शक्ति बनने की दिशा में आगे बढ़ता है या फिर अवसरों को खोकर नई चुनौतियों में फंसकर रह जाता है। जिस तरह के हालात वर्तमान में देखने को मिल रहे हैं वह चिंता बढ़ाने वाले हैं। संवैधानिक संस्थाएं सरकार के दबाव में काम कर रही हैं। चुनाव आयोग और न्यायपालिका के फैसलों पर आरोपों की झड़ी लग रही है। डॉलर और युआन के मुकाबले रुपए की कीमत लगातार घटती चली जा रही है। आयात और निर्यात का अंतर बढ़ता चला जा रहा है। जिसके कारण भारत एक ऐसे संकट में फंस गया है, जिससे सभी की चिंताएं बढ़ गई हैं। इस संकट से देश किस तरह से निकल पाएगा, इसको लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष की चिंताएं बढी हुई हैं। वर्तमान आर्थिक स्थिति ने भारत की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक चिंता को बढ़ा दिया है। एसजे/ 6 जून /2026