राष्ट्रीय
06-Jun-2026
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नई दिल्ली (ईएमएस)। भागदौड भरी जिंदगी में लोग जटिल और गंभीर समस्या ईटिंग डिसऑर्डर को सामान्य डाइटिंग या भोजन से जुड़ी मामूली खराबी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। हैल्थ विशेषज्ञ इस समस्या को केवल भोजन से जुड़ी समस्या नहीं मानते, बल्कि यह व्यक्ति की भावनाओं, आत्मविश्वास और शरीर की बनावट के प्रति उसकी धारणा (बॉडी इमेज) से जुड़ा एक गहरा मानसिक विकार है। इसमें व्यक्ति समाज के दबाव, बुलिंग, या तीव्र तनाव के कारण या तो अत्यधिक भूखा रहने लगता है (एनोरेक्सिया) या फिर बार-बार अनियंत्रित रूप से खाता है (बुलिमिया या बिंग ईटिंग)। इस समस्या के कारण व्यक्ति को कुपोषण, दिल की कमजोरी, पाचन तंत्र की गड़बड़ी, और गंभीर अवसाद जैसी कई जानलेवा स्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। जानकारों का मानना है कि चूंकि ईटिंग डिसऑर्डर का सीधा संबंध मरीज के मानसिक तनाव, अपराधबोध और भावनात्मक असंतुलन से है, इसलिए इसका सफल इलाज भी केवल डाइट चार्ट बदलने या शारीरिक लक्षणों पर ध्यान केंद्रित करने से नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक स्तर पर होना चाहिए। इस दिशा में, होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति एक बेहद कारगर और सुरक्षित विकल्प के रूप में उभर कर सामने आई है। होम्योपैथी विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि ईटिंग डिसऑर्डर केवल एक शारीरिक बीमारी नहीं, बल्कि मन और शरीर के बीच बिगड़े हुए तालमेल का सीधा परिणाम है। होम्योपैथी में होलिस्टिक अप्रोच यानी संपूर्ण स्वास्थ्य के सिद्धांत पर काम किया जाता है। इस पद्धति में, मरीज के केवल बाहरी शारीरिक लक्षणों को ही नहीं देखा जाता, बल्कि उसके गहरे मानसिक तनाव, बचपन के आघात, कम आत्मविश्वास, शरीर के प्रति नकारात्मक सोच और डिप्रेशन के मूल कारणों को भी समझा जाता है। इस विकार के इलाज के लिए, होम्योपैथी में मरीज की कॉन्स्टिट्यूशनल केस टेकिंग यानी उसके विस्तृत व्यक्तिगत, शारीरिक और मानसिक इतिहास का अध्ययन किया जाता है। यह केस टेकिंग मरीज के अद्वितीय भावनात्मक मेकअप और उसकी विशिष्ट प्रतिक्रियाओं को समझने में मदद करती है, जिससे सबसे उपयुक्त दवा का चुनाव किया जा सके। उदाहरण के लिए, जो लोग तीव्र मानसिक तनाव या किसी सदमे के कारण खाना पूरी तरह छोड़ देते हैं और भोजन से घृणा करने लगते हैं, उनके लिए इग्नेशिया जैसी दवाएं मानसिक संभल देने और भावनात्मक संतुलन बहाल करने का काम करती हैं। वहीं, जो युवा अपने शरीर की बनावट को लेकर अत्यधिक संवेदनशील होते हैं, या स्वयं से नफरत करने लगते हैं, उनके इलाज में नैट्रम म्यूर और आर्सेनिक एल्बम जैसी औषधियां प्रभावी साबित होती हैं। ये दवाएं आत्मविश्वास बढ़ाने और आत्म-छवि को सकारात्मक बनाने में मदद करती हैं। यदि तनाव के कारण कोई व्यक्ति भूख न होने पर भी बार-बार खाता है (बिंग ईटिंग), तो उसकी इस अनियंत्रित इच्छा और पाचन क्रिया को ठीक करने के लिए नक्स वोमिका या पल्साटिला जैसी दवाएं दी जाती हैं, जो भोजन के प्रति व्यक्ति के संबंध को सामान्य करती हैं। होम्योपैथिक दवाएं अपनी सूक्ष्म खुराक और प्राकृतिक गुणों के कारण बिना किसी साइड-इफेक्ट के काम करती हैं। ये दवाएं मस्तिष्क में न्यूरोकेमिकल्स को संतुलित करती हैं, जिससे मरीज का खुद के प्रति नजरिया बदलता है, उसका आंतरिक तनाव कम होता है, और भोजन के साथ उसका संबंध धीरे-धीरे प्राकृतिक और स्वस्थ होने लगता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि होम्योपैथी इस समस्या का इलाज जड़ से करती है, जिससे दोबारा इसके उभरने की संभावना कम हो जाती है। सुदामा/ईएमएस 06 जून 2026