अंतर्राष्ट्रीय
07-Jun-2026
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मछलियों को चाकुओं से चीरकर जश्न मनाया, लाल हुआ समंदर कोपेनहेगन(ईएमएस)। इंसानों की क्रूरता की ऐसी खौफनाक तस्वीर शायद ही आपने कभी देखी हो। मछलियों को पकड़कर जीवन यापन करना एक सामान्य बात है, लेकिन व्हेल और डॉल्फिन जैसे बेहद संवेदनशील और बुद्धिमान जलीय जीवों को जिंदा ही चाकुओं से चीर डालना और फिर उन्हें तड़पते देखकर जश्न मनाना बेहद दिल दहलाने वाला है। डेनमार्क के अधिकार क्षेत्र में आने वाले फारो द्वीप पर लोग हर साल इस तरह का एक क्रूर उत्सव मनाते हैं, जिसे स्थानीय भाषा में द ग्रिंड कहा जाता है। इस पारंपरिक संहार को देखने के लिए बड़ी संख्या में स्थानीय महिलाएं और बच्चे भी समंदर के किनारे इकट्ठा होते हैं। इस बार आयोजित हुए द ग्रिंड के दौरान लगभग 700 व्हेल और डॉल्फिन को नावों के जरिए जबरन खींचकर किनारे की ओर लाया गया और फिर उथले समंदर में धारदार चाकुओं से उन्हें बेरहमी से फाड़ डाला गया। इन बेजुबान जीवों की इस नृशंस हत्या से इतना खून निकला कि समंदर का पूरा पानी लाल हो गया। जानकारी के मुताबिक, यह खूनी आयोजन बीते 27 मई को किया गया था, जिसके बाद समंदर का पूरा तट सैकड़ों कटी-फटी मछलियों के शवों से पट गया। ग्लोबल मरीन कंजर्वेशन सी शेफर्ड की डायरेक्टर वैलेंटीना क्रास्ट ने इस पर कड़ा विरोध जताते हुए कहा कि उन्होंने यूरोपीय सरकारों से इस बर्बर कार्यक्रम पर तुरंत प्रतिबंध लगाने की मांग की है, लेकिन प्रशासन द्वारा इस दिशा में कोई सुनवाई नहीं की जा रही है। सरकारी आंकड़ों और रिपोर्ट के मुताबिक, इस बार द ग्रिंड वाले दिन कम से कम 402 पायलट व्हेल और लगभग 300 डॉल्फिन को मौत के घाट उतार दिया गया। पशु अधिकार संस्था पेटा की अध्यक्ष एलिसा एलेन ने इस पर गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि ये जलीय जीव दर्द से कराहते हैं और छटपटाते हैं। व्हेल और डॉल्फिन जैसी मछलियां इंसानों की तरह ही अपने पूरे परिवार के साथ समूह में रहती हैं, और इस उत्सव के नाम पर उनके पूरे कुनबे को ही निर्दयता से मिटा दिया जाता है। चूंकि ये जीव बेहद संवेदनशील होते हैं, इसलिए इन्हें शारीरिक और मानसिक दर्द का अहसास भी बहुत ज्यादा होता है।एनीमल राइट एक्टिविस्ट्स का कहना है कि यह नृशंस कार्यक्रम करीब 1000 साल पुराने वाइकिंग युग की परंपरा है। हालांकि, फारो द्वीप एक स्वायत्त और स्वतंत्र क्षेत्र है, इसलिए यहां के लोग इसे अपनी प्राचीन संस्कृति और पहचान का अहम हिस्सा मानते हैं। आलोचकों और एक्टिविस्ट्स का तर्क है कि आज के आधुनिक और सभ्य युग में इस तरह की हिंसक परंपराओं की कोई जरूरत नहीं है। वीरेंद्र/ईएमएस/07जून2026