लेख
08-Jun-2026
...


‘‘ आंदोलन से उठते कुछ सुलगते, उगलते और अनसुलझे सवाल।’’ ‘‘ भूमिका ’’। राजनीति में कभी-कभी एक छोटी-सी ‘‘चिंगारी’’ भी दूर तक ‘‘रोशनी’’ फैला देती है। ‘‘कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी)’’ का उदय ऐसा ही एक घटनाक्रम प्रतीत होता है। 15 में 2026 को सुप्रीम कोर्ट में एक प्रकरण की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की एक विवादास्पद मौखिक टिप्पणी जिसमें कुछ बेरोजगार युवाओं को ‘‘कॉकरोच’’ कहा गया था, के जवाब मेंअभिजीत दिपके द्वारा शुरू किया गया यह ‘‘व्यंग्यात्मक राजनीतिक आंदोलन’’ कुछ ही दिनों में सोशल मीडिया की सीमाएँ लांघकर दिल्ली के जंतर-मंतर तक पहुँच गया। जिस ‘‘कॉकरोच’’ शब्द का प्रयोग कथित रूप से अपमान के लिए हुआ, उसी को प्रतीक बनाकर सकारात्मक प्रतिरोध का माध्यम बनाना अपने आप में एक नया राजनीतिक प्रयोग है। मानो यह कहने का प्रयास हो कि ‘‘लोहा लोहे को काटता है’’। ‘‘ जंतर-मंतरः केवल प्रदर्शन नहीं, अनेक संकेत ?’’ लंबे समय बाद अन्ना आंदोलन के बाद जंतर-मंतर फिर राष्ट्रीय चर्चा का केंद्र बना। संयोग देखिए, ‘‘जंतर-मंतर’’ का अर्थ आकाशीय गतिविधियों को मापने के उपकरणों से है। इस बार जंतर-मंतर के प्रदर्शन के माध्यम से देश की राजनीति के तापमान को सांकेतिक रूप से मापने का प्रयास करते हैं। मात्र बीस दिनों में ‘‘ऑनलाइन’’ अभियान का ऑफलाइन प्रदर्शन में बदल जाना अपने आप में साहसिक सफल कदम होकर ‘‘अध्ययन’’ का विषय है। 12 संकेत, जो नजरअंदाज नहीं किये सकते हैं__ ‘‘ पहला: संख्या कम, संदेश बड़ा’’ पुलिस कर्मियों और युटयुबर्स की तुलना में प्रदर्शनकारियों की संख्या अपेक्षाकृत कम थी। आलोचकों के अनुसार 2.90 करोड़ ऑनलाइन समर्थकों वाली पार्टी के कार्यक्रम में केवल कुछ हजार लोग ही पहुँचे? जेएनयू विश्वविद्यालय की अध्यक्षता के अनुसार लगभग 5000। ‘‘ऑनलाइन से ऑफलाइन’’ आने में ‘‘चमक की दमक’’ कम होना तो स्वाभाविक ही है। यद्यपि किसी भी आंदोलन में संख्या का महत्व है, मगर इतिहास गवाह है, कई बार छोटी संख्या भी बड़ा संदेश दे जाती है। ‘‘ दूसरा: प्रशासन का असाधारण, अप्रत्याशित व्यवहार ।’’ अभिजीत दिपके का रेड कारपेट स्वागत, आवेदन के बिना प्रदर्शन की अनुमति और प्रशासनिक व्यवहार को समर्थक लोकतांत्रिक उदारता मान रहे हैं, तो आलोचक इसके पीछे राजनीतिक अर्थ पर्दे के पीछे पटकथा तलाश रहे हैं। सवाल वह क्या यह आंदोलन स्वतःस्फूर्त है या किसी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा होकर ‘‘अन्ना आंदोलन’’ 2.0 जैसा प्रायोजित प्रयोग’’? ‘‘तीसरा: पूर्णतः शांतिपूर्ण स्वरूप। आज के दौर में जब छोटी घटनाएँ भी हिंसक मोड़ ले लेती हैं, तब यह प्रदर्शन एक-दो उकसावे के बावजूद पूरी तरह शांतिपूर्ण रहा। ‘‘ *चौथा: हाथ में संविधान की प्रति! ’’ अभिजीत दिपके का संविधान की प्रति लेकर पहुँचना अनेक राजनीतिक संदेश देता है। पिछले कुछ वर्षों में ‘‘संविधान की किताब’’ विपक्षी राजनीति खासकर राहुल गांधी की राजनीति का एक प्रमुख हथियार बन चुका है। स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि क्या राहुल गांधी से अभिजीत अभिप्रेरित है? ‘‘ पाँचवां: सांप्रदायिकता से ऊपर’’। ‘‘हिंदू-मुस्लिम राजनीति बंद करो’’ जैसे नारों ने संकेत दिया कि युवा वर्ग रोजगार और परीक्षा व्यवस्था जैसे मुद्दों को सांप्रदायिक विमर्श से ऊपर रखना चाहता है। ‘‘छठा: मीडिया की बदलती भूमिका* ’’। अन्ना आंदोलन की सफलता का सबसे बड़ा हथियार मेंनस्ट्रीम मीडिया था। इसके विपरीत यह आंदोलन लगभग पूरी तरह सोशल मीडिया और यूट्यूब आधारित दिखाई दिया। गोदी मीडिया विरोधी नारे और मुख्यधारा मीडिया की लगभग अनुपस्थिति। मतलब अब आंदोलन टीवी स्टूडियो से नहीं, मोबाइल स्क्रीन से भी खड़े हो सकते हैं? ’सातवां: कांग्रेस की दुविधा ? समाजवादी पार्टी, शिवसेना (उद्धव), एनसीपी (शरद) सोशल मीडिया में समर्थन के साथ देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए लोगो के साथ लद्दाख के प्रसिद्ध जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक और सीपीआई (एमएल) के महामंत्री दीपंकर भट्टाचार्य एआईएसए की प्रत्यक्ष सक्रिय भागीदारी के साथ कांग्रेस का मौन, बेरुखी व सावधानी पूर्ण दूरी। यद्यपि कांग्रेस के किसी भी अधिकृत हैंडल्स से इस प्रदर्शन की आलोचना नहीं की गई है। पेपर लीक जैसा युवा मुद्दा को क्या विपक्ष को दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर एकजुट समर्थन नहीं देना चाहिए? जैसा कि योगेंद्र यादव ने आव्हान भी किया है। ’ आठवाँ: हर कोई भ्रमित ’’। कुछ लोग इसे भाजपा प्रायोजित बता रहे हैं, तो भाजपा सहित इसे आम आदमी पार्टी की ‘‘बी टीम’’ कह रहे हैं। कुछ इसे विपक्ष की रणनीति मान रहे हैं। मतलब हर जगह भ्रम व अविश्वास की स्थिति। दरअसल आज भारतीय राजनीति ऐसी स्थिति में पहुँच गई है, जहाँ ‘‘दूध का जला (अन्ना आंदोलन) छाछ भी फूँक-फूँक कर पीता है’’। नौवां: क्या सोशल मीडिया नया जनादोलन बना सकता है ? नामचीन, संगठन, पारंपरिक नेतृत्व और बड़े राजनीतिक ढाँचे के बिना क्या कोई आंदोलन खड़ा हो सकता है? प्रसिद्ध पत्रकार प्रभु चावला जैसे कुछ युटयुबर्स, इस आंदोलन का कोई बड़ा संज्ञान लेने को इसलिए तैयार नहीं है कि मुद्दा बहुत छोटा सा है, न कोई बड़ा नाम है, न कोई बड़ा नारा है, जैसा ‘‘अन्ना आंदोलन’’ के समय। उसके पीछे विवेकानंद फाउंडेशन और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का संस्थागत समर्थन समर्थन था, में भी मुद्दा मात्र ‘‘लोकपाल’’ का था, जो भ्रष्टाचार से जुड़ा था। जबकि यहां भी मुद्दा पेपर लीकेज का है, जो भ्रष्टाचार से जुड़ा हुआ है। गुजरात के मुख्यमंत्री चिमन भाई पटेल के विरुद्ध महंगाई व भ्रष्टाचार को लेकर प्रारंभ किया गया नवनिर्माण आंदोलन जो अंततः जेपी के हाथों जाकर ‘‘संपूर्ण क्रांति’’ में बदल गयाय में प्रारंभ में कौन नामी-गिरामी नेता थे? गुजरात का ही पाटीदार आंदोलन, महाराष्ट्र का आरक्षण आंदोलन जैसे अनेक आंदोलन हुए जो अनजान चेहरों द्वारा प्रारंभ किए गए और सरकार को उनके सामने झुकना पड़ा। दसवाँ : क्या हमारी हर बात पर संदेह करने की नुक्ताचीनी निकालने की आदत सी बन गई है? ग्यारहवां: यदि प्रदर्शन की अनुमति नहीं मिलती, क्या तब भी गिरफ्तारी, लाठी चार्ज के ड़र से इतने ही युवा इकट्ठे होते? ‘‘ जन आंदोलन से निकली पांच प्रमुख पार्टियां ?’’ भारतीय राजनीति में अनेक दल जन आंदोलनों से निकले हैं। कांग्रेस (1927) स्वतंत्रता आंदोलन से, डीएमके, (1949) द्रविड़ आंदोलन से, जनता पार्टी,(1974) संपूर्ण क्रांति से, असम गण परिषद, (1989), छात्र आंदोलन से और आम आदमी पार्टी, (2012) अन्ना आंदोलन से निकली। ‘‘आप व असम गण परिषद’’ के सत्ता में दो-दो बार बैठने के बावजूद आज उनकी स्थिति क्या है? दोनों के ‘‘संस्थापक’’ तक चुनाव हार चुके हैं। विदेशी पुट का एक संयोग यह भी है कि कांग्रेस पार्टी की स्थापना ब्रिटिश नागरिक एलन ऑक्टेवियन ह्यूम ने की थी। जबकि कॉकरोच जनता पार्टी की स्थापना भारतीय नागरिक अभिजीत दिपके ने विदेश अमेरिका (विदेश) के बोस्टन शहर से की थी। लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि आंदोलन खड़ा करना और उसे स्थायी सफल राजनीतिक संगठन में बदलना दो अलग-अलग चुनौतियाँ हैं। बरवां‘‘ अंतिम प्रश्नः ज्वार-भाटा? ‘‘क्या यह लहर आगे बढ़ेगी या समुद्र के ‘‘ज्वार’’ की तरह कुछ समय बाद ‘‘भाटा’’ बनकर लौट जाएगी? राजनीति का इतिहास बताता है कि कई बार छोटी चिंगारी बुझ जाती है और कई बार वही ‘‘मशाल’’ बन जाती है। ‘‘ निष्कर्ष।’ ’ जंतर-मंतर के इस प्रदर्शन ने विपक्ष, मीडिया और युवाओं सभी के सामने कुछ असहज प्रश्न सोशल मीडिया आधारित लामबंदी, पारंपरिक मीडिया से दूरी, युवा असंतोष और स्थापित राजनीतिक दलों के प्रति अविश्वास, अवश्य खड़े कर दिए हैं, जिनके उत्तर आने वाले समय में मिलेंगे। (लेखक, कर सलाहकार एवं पूर्व अध्यक्ष, बैतूल सुधार न्यास) ईएमएस / 08 जून 26