राज्य
10-Jun-2026


- यौन हिंसा पर झारखंड हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला - जीरो एफआईआर न लिखने वाले थानेदारों पर होगी जेल और विभागीय कार्रवाई - 2 महीने में पूरी होगी जांच, टू-फिंगर टेस्ट पूरी तरह बैन रांची (ईएमएस)। झारखंड हाईकोर्ट ने यौन हिंसा और दुष्कर्म से जुड़े मामलों में एक बेहद कड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने स्पष्ट आदेश दिया है कि दुष्कर्म या यौन उत्पीड़न के मामलों में थाना प्रभारियों को बिना किसी देरी के तुरंत जीरो एफआईआर दर्ज करनी होगी। इसके बाद ही केस को संबंधित क्षेत्राधिकार वाले थाने में ट्रांसफर किया जाएगा। यदि कोई थाना प्रभारी अधिकार क्षेत्र का बहाना बनाकर एफआईआर दर्ज करने से मना करता है, तो उसके खिलाफ सख्त आपराधिक और विभागीय कार्रवाई की जाएगी। कोर्ट ने साफ किया कि पुलिस किसी भी संज्ञेय अपराध, खासकर महिला हिंसा के मामलों में टालमटोल नहीं कर सकती। इसके साथ ही, अदालत ने टू फिंगर टेस्ट को पूरी तरह से प्रतिबंधित करते हुए सभी सरकारी और निजी अस्पतालों को इसे तुरंत रोकने के लिए सर्कुलर जारी करने का निर्देश दिया है। अदालत ने पीड़ित महिलाओं और उनके बच्चों के पुनर्वास के लिए भी दूरगामी आदेश दिए हैं। हाईकोर्ट ने कहा कि दुष्कर्म की घटना से जन्मे बच्चों की 12वीं कक्षा तक की पढ़ाई का पूरा खर्च राज्य सरकार उठाएगी और उन्हें मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा दी जाएगी, जिसकी निगरानी के लिए हर जिले में एक नोडल अधिकारी तैनात होगा। यदि ये बच्चे आगे चलकर आईआईटी, आईआईएम या एम्स जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में चुने जाते हैं, तो सरकार उन्हें विशेष छात्रवृत्ति प्रदान करेगी। इसके अलावा, एफआईआर दर्ज होने के 15 दिनों के भीतर पीड़िता को अंतरिम मुआवजा और अदालत का फैसला आने के 30 दिनों के भीतर अंतिम मुआवजे का भुगतान सुनिश्चित करना होगा, जो पीड़िता को पहुंची चोट और नुकसान के अनुरूप होना चाहिए। जांच प्रक्रिया को गति देने और संवेदनशील बनाने के लिए कोर्ट ने समय-सीमा तय कर दी है। अब किसी भी ऐसे मामले की प्रारंभिक जांच 15 दिनों के भीतर और अंतिम जांच अधिकतम दो महीने में पूरी करनी होगी। पीड़िता का बयान अनिवार्य रूप से केवल महिला पुलिस अधिकारी ही दर्ज करेगी। साथ ही, पुलिसकर्मियों को संवेदनशीलता, मानवाधिकार और समयबद्ध जांच का विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा। कोर्ट ने पीड़िताओं को मुफ्त मनोवैज्ञानिक परामर्श (काउंसलिंग) उपलब्ध कराने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए रोजगार व कौशल विकास प्रशिक्षण की योजना तैयार करने का भी आदेश दिया है। हाईकोर्ट ने यह सख्त रुख झारखंड में महिला अपराधों के डरावने आंकड़ों को देखते हुए अपनाया है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो और मौजूदा आंकड़ों के अनुसार, झारखंड में हर दिन महिला हिंसा के औसतन 25 मामले दर्ज होते हैं, जिनमें से 5 से 6 मामले अकेले दुष्कर्म के होते हैं। राज्य में साल 2021 में महिलाओं के खिलाफ कुल 8,700 मामले दर्ज हुए थे जिनमें 1,300 दुष्कर्म के थे। यह आंकड़ा साल 2022 में बढ़कर 8,900 (1,350 दुष्कर्म) और साल 2023 में करीब 1,450 दुष्कर्म के मामलों तक पहुंच गया। महिला सुरक्षा और न्याय व्यवस्था में सुधार के लिए कोर्ट ने अधिवक्ता सुमित गाड़ोदिया और झालसा के महत्वपूर्ण सुझावों को स्वीकार करते हुए यह विस्तृत गाइडलाइन जारी की है। रामयश/ईएमएस 10 जून 2026