क्षेत्रीय
10-Jun-2026
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- महोत्सव में विभिन्न सांस्कृतिक गतिविधियां के साथ शिल्प-व्यंजन मेला, कठपुतली प्रदर्शन एवं प्रशिक्षण भी हुआ भोपाल(ईएमएस)। मध्यप्रदेश शासन, संस्कृति विभाग द्वारा भोपाल में जनजातीय जीवन, देशज ज्ञान परम्परा और सौन्दर्यबोध एकाग्र मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय की स्थापना के तेरहवें वर्षगाँठ समारोह के अवसर पर ’महुआ महोत्सव’ आयोजित किया। जिसका समापन 10 जून, 2026 आज मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय, श्यामला हिल्स, भोपाल में हुआ। महोत्सव जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी एवं उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र- प्रयागराज के संयुक्त तत्त्वाधान में एवं दक्षिण मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र-नागपुर के सहयोग किया गया। समापन दिवस का शुभारंभ निदेशक, जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी डॉ. धर्मेंद्र पारे द्वारा कलाकारों के स्वागत से किया गया। महोत्सव में दोपहर 02 बजे उल्लास अंतर्गत बच्चों के लिए कठपुतली प्रदर्शन एवं प्रशिक्षण अंतर्गत विभाष उपाध्याय एवं साथी, छत्तीसगढ़ द्वारा कठपुतली बनाने की बारीकियों से अवगत कराया गया। वहीं धरोहर अंतर्गत पारंपरिक शिल्पियों को आमंत्रित किया गया, जिसमें बांस, धातु, कपड़ा, खराद, मिट्टी एवं अन्य शिल्प शामिल रहे। स्वाद अंतर्गत देशज व्यंजन में मध्यप्रदेश, उड़ीसा, त्रिपुरा, असम के व्यंजन का भी संयोजन किया गया। महोत्सव समापन दिवस पर 10 जून, 2026 को सुश्री वंदना मिश्रा एवं साथी, प्रयागराज द्वारा अवधी रामा-रामा रटते रटते बीती रे उमरिया..., तोहर देहिया ई माटी के मकान बा..., राम को देख कर श्रीजनक नंदिनी..., घर घर बजत बधईया अयोध्या मा सोहर हो..., तुम उठो सिया शृंगार करो शिव धनुष राम ने तोड़ है..., बड़े ऊँचे सिया तोरे भाग सजन मिले राम लला..., एवं अन्य कई गीतों और भजनों की प्रस्तुति दी। इसके बाद नन्दाकुमार क्षेत्रीय एवं साथी-सिक्किम द्वारा सिंग्गीछाम नृत्य की प्रस्तुति दी। सिंग्गीछाम नृत्य पौराणिक हिम शेर (Snow Lion) को समर्पित है, जिसे तिब्बती और सिक्किम संस्कृति में साहस, शक्ति, निर्भीकता और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। सिक्किम में कंचनजंगा पर्वत की चोटियों को इन पौराणिक हिम शेरों के समान मानते हैं। यह नृत्य कंचनजंगा पर्वत की पूजा करने और क्षेत्र की रक्षा करने वाली संरक्षक आत्माओं को सम्मान देने के लिए किया जाता है। नर्तक (जो आमतौर पर बौद्ध भिक्षु होते हैं) सफेद रोएं वाली शेर जैसी वेशभूषा पहनते हैं। एक शेर के जोड़े में दो नर्तक होते हैं, जो शेर के शरीर का हिस्सा बनते हैं। यह नृत्य विशेष रूप से सिक्किम के प्रसिद्ध पांग ल्हाबसोल (Pang Lhabsol) उत्सव के दौरान मठों में प्रस्तुत किया जाता है। नृत्य में पारंपरिक तिब्बती और भूटिया वाद्यों जैसे ढोल, झांझ, और सींग की थाप पर बहुत ही ऊर्जावान और लयबद्ध तरीके से प्रयोग किया जाता है। अगले क्रम में डूगरचंद एवं साथी, राजस्थान द्वारा गैर नृत्य की प्रस्तुति दी। गैर नृत्य राजस्थान का लोक नृत्य है, जो मुख्य रूप से होली के अवसर पर किया जाता है। इसमें पुरुष पारंपरिक वेशभूषा पहनकर और हाथों में लकड़ी की डंडियाँ लेकर गोल घेरे में लयबद्ध तरीके से नृत्य करते हैं। यह नृत्य मूल रूप से भील जनजाति का है, लेकिन अब इसे राजस्थान के अन्य समुदायों और क्षेत्रों में भी बड़े उत्साह के साथ किया जाता है। नर्तक सिर पर रंग-बिरंगी पगड़ियाँ, शरीर पर सफेद अंगरखी और कमर पर धोती पहनते हैं। नृत्य करते समय वे हाथों में छोटी-छोटी डंडियाँ रखते हैं, जिन्हें आपस में टकराकर वे विशेष ताल और ध्वनि उत्पन्न करते हैं। वहीं बृजभान मरावी एवं साथी (उ.प्र) द्वारा सैला नृत्य की प्रस्तुति दी। सैला नृत्य मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश में गोंड जनजातीय द्वारा दशहरा उत्सव के बाद शरद ऋतु की चांदनी रात में सैला नृत्य किया जाता है। नृत्य में सवा हाथ की छड़ी लेकर किया जाता है, इसलिए इसका नाम सैला पड़ा। मांदल,टिमकी,गुदुम,शहनाई की मधुर ध्वनि और बांसुरी के सुरीले स्वर नृत्य की सुंदरता को और बढ़ा देती है। पुरुष एक हाथ में सवा हाथ की छड़ी, दूसरे हाथ में मोर का पंख लेकर नृत्य करते हैं, जबकि महिलाएं हाथ में रुमाल लेकर नृत्य करती हैं। वहीं सुजुलियट लालियंटलुआंगी एवं साथी-मिजोरम द्वारा चैराव बैम्बू नृत्य की प्रस्तुति दी। चैराव बैम्बू नृत्य में मुख्य रूप से 6 से 8 नर्तक (पुरुष और महिला दोनों) शामिल होते हैं। पुरुष नर्तक ज़मीन पर समानांतर रखे बांसों पर बांस की छड़ियों को पकड़कर एक निश्चित लय में उन्हें आपस में टकराते हैं। महिला नर्तक (डांसर) बांस के इन डंडों के खुलने और बंद होने के बीच बड़ी ही फुर्ती, खूबसूरती और जटिल मुद्राओं के साथ लयबद्ध कदम (स्टेप्स) मिलाती हैं। पारंपरिक रंग-बिरंगे परिधान (जैसे- पुआनचेई और कावरचेई) पहनती हैं और सिर पर बांस और पंखों से बना मुकुट का भी प्रयोग करती हैं। वहीं पुरुष पारंपरिक मिज़ो शॉल और बांस की टोपी (खुम्बेउ) पहनते हैं। पहले यह नृत्य दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए पारंपरिक अनुष्ठानों के दौरान किया जाता था, लेकिन आज के समय में इसे मिजोरम के सभी प्रमुख त्योहारों और खुशियों के अवसर पर किया जाता है। निरंजन साहू एवं साथी-उड़ीसा द्वारा रणपा नृत्य की प्रस्तुति दी। रणपा नृत्य उड़ीसा का पारंपरिक लोक और मार्शल नृत्य है। इसमें नर्तक लगभग छह फीट ऊंचे बांस के डंडों पर संतुलन बनाते हुए, ढोल और महूरी की ताल पर कलाबाजी और नृत्य करते हैं। यह नृत्य मुख्य रूप से भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित है, जिसमें नर्तक उनके बचपन की लीलाओं का प्रदर्शन करते हैं। यह साहसिक कला, चपलता और गहरी भक्ति का एक अनूठा मिश्रण है। यह नृत्य मुख्य रूप से चरवाहा समुदाय के लोगों द्वारा स्थानीय उत्सवों और सामुदायिक समारोहों में किया जाता है। बृजभान मरावी एवं साथी, (उ.प्र) द्वारा झूमर नृत्य की प्रस्तुति दी। झूमर नृत्य एक अत्यंत लोकप्रिय और पारंपरिक लोक नृत्य है, जो भारत के कई राज्यों जैसे उत्तरप्रदेश, हरियाणा, बिहार, झारखंड, और असम में अपनी अलग-अलग क्षेत्रीय शैलियों में किया जाता है। यह नृत्य खुशी, फसल कटाई के मौसम और त्योहारों का प्रतीक है। नर्तक एक घेरा बनाकर पारंपरिक आभूषणों और चमकदार चमकीले परिधानों में नृत्य करती हैं। इसमें ढोल, मंजीरा और थाली का प्रयोग मुख्य रूप से किया जाता है। यह नृत्य फसल कटाई के मौसम, वसंत ऋतु और तीज-त्योहारों पर किया जाता है। मुरारी लाल भार्वे एवं साथी, डिंडोरी (म.प्र) द्वारा गुदुमबाजा नृत्य प्रस्तुत किया। गुदुमबाजा नृत्य गोण्ड जनजाति की उपजाति ढुलिया का पारम्परिक नृत्य है। ढुलिया जनजाति के कलाकारों द्वारा गुदुम, ढफ, मंजीरा, शहनाई, टिमकी आदि वाद्यों के साथ जनजातियों के पारम्परिक गीतों की धुनों पर वादन एवं नर्तन किया जाता हैं। विशेषकर विवाह के अवसर पर इस जाति के कलाकारों को मांगलिक वादन के लिए अनिवार्य रूप से आमंत्रित करते हैं एवं अन्य आनुष्ठानिक अवसरों पर भी इन्हें वादन के लिए आमंत्रित किया जाता है। उदय कुमार एवं साथी, तेलंगाना द्वारा माथुरी नृत्य प्रस्तुत किया। माथुरी दक्षिण भारत के तेलंगाना राज्य का नृत्य है। यह नृत्य स्थानीय गोंड जनजाति और कोप्पू लम्बाडिस द्वारा किया जाने वाला एक पारंपरिक और अत्यंत आकर्षक नृत्य है। यह नृत्य मुख्य रूप से वर्षा ऋतु या श्रावण माह में और दशहरे जैसे महत्वपूर्ण त्योहारों के दौरान किया जाता है। पुरुष और महिलाएं दोनों भाग लेते हैं, लेकिन वे अलग-अलग समूह बनाते हैं। पुरुष अपने हाथों में छोटी छड़ी पकड़ते हैं और उन्हें आपस में टकराते हुए लय बनाते हैं, जबकि महिलाएं तालियां बजाकर उनका साथ देती हैं। एम महादेव मुरथी एवं साथी, कर्नाटक द्वारा कमसाले नृत्य की प्रस्तुति दी। कमसाले नृत्य कर्नाटक के मैसूर और चामराजनगर क्षेत्रों का एक प्रमुख और ऊर्जावान लोक नृत्य है। यह मुख्य रूप से हालुमथा कुरुबा समुदाय के पुरुषों द्वारा भगवान शिव की स्तुति में किया जाता है। नर्तक हाथों में पीतल की बनी झांझ (कमसाले) बजाते हुए लयबद्ध और कलात्मक प्रदर्शन करते हैं। नर्तक आमतौर पर पीले और लाल रंग के पारंपरिक परिधान पहनते हैं। यह लयबद्ध गायन, नृत्य और कलाबाजी का मिश्रण है। इस नृत्य को मुख्य रूप से धार्मिक मेलों, त्योहारों और दशहरा अवसर पर किया जाता है। जे अरविंद एवं साथी, आंध्रप्रदेश द्वारा तपेटगुल्लू नृत्य की प्रस्तुति दी । तप्पेट गुल्लू आंध्रप्रदेश के तटीय और उत्तरी जिलों का एक अत्यंत प्रसिद्ध और ऊर्जावान लोक नृत्य है। यह नृत्य मुख्य रूप से ढोल की थाप और भक्ति गीतों के माध्यम से वर्षा देवी गंगम्मा को प्रसन्न करने और अच्छी बारिश की कामना करने के लिए किया जाता है। यह नृत्य यादव समुदाय के द्वारा किया जाता था, लेकिन अब यह आम लोगों के बीच भी बहुत लोकप्रिय है। नर्तक अपने पैरों में घुंघरुओं के साथ ताल मिलाते हुए तपेट के साथ नृत्य करते हैं। नृत्य में हिंदू महाकाव्यों, विशेषकर रामायण और महाभारत की कहानियों को गीतों और अभिनय के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। हरि प्रसाद पाल /10 जून, 2026