राष्ट्रीय
11-Jun-2026


मुंबई,(ईएमएस)। भारत में प्लास्टिक के नोटों को लेकर चर्चा इन दिनों जोरों पर है, हालांकि तकनीक वैश्विक स्तर पर करीब चार दशकों से चलन में है। आज दुनिया के 60 से अधिक देशों में प्लास्टिक यानी पॉलिमर करेंसी का सफलतापूर्वक इस्तेमाल हो रहा है। सबसे पहले ऑस्ट्रेलिया ने 1988 में इन नोटों को जारी कर एक नई शुरुआत की थी, जिसका उद्देश्य इन्हें अधिक सुरक्षित और टिकाऊ बनाना था। बाद में कनाडा, ब्रिटेन और कई अन्य देशों ने भी इसी मॉडल को अपनाया। इन देशों में प्लास्टिक नोटों को लंबी उम्र और बेहतर सुरक्षा के लिए सराहा जाता है। अब भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) भी विकल्प पर गंभीरता से विचार कर रहा है। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बताया कि केंद्रीय बैंक प्लास्टिक नोटों की संभावनाओं को खंगाल रहा है, हालांकि फिलहाल इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। यह योजना अभी शुरुआती चरण में है और विशेषज्ञ इसकी उपयोगिता, उत्पादन लागत और व्यवहार्यता सहित सभी महत्वपूर्ण पहलुओं का गहन अध्ययन कर रहे हैं। पॉलिमर नोटों की लोकप्रियता के कई कारण हैं। सामान्य कागजी नोटों की तुलना में ये कहीं अधिक मज़बूत और टिकाऊ होते हैं। ये आसानी से फटते नहीं, पानी से खराब नहीं होते और इनका जीवनकाल भी लंबा होता है। साथ ही, इसमें बेहतर सुरक्षा फीचर्स होने के कारण नकली नोटों की पहचान करना या उनका निर्माण करना भी बेहद मुश्किल हो जाता है। हालांकि, हर तकनीक की तरह इसके भी कुछ नुकसान हैं। प्लास्टिक नोटों की छपाई कागज़ी नोटों के मुकाबले अधिक महंगी होती है। इसके अलावा, इन्हें रीसायकल करना भी जटिल प्रक्रिया है। इन्हीं सब कारणों से आरबीआई किसी भी बड़े निर्णय से पहले सभी आर्थिक और पर्यावरणीय पहलुओं का बारीकी से मूल्यांकन कर रहा है। गवर्नर ने यह भी स्पष्ट किया कि देश में नकदी की कोई कमी नहीं है और बैंकिंग सिस्टम में पर्याप्त करेंसी उपलब्ध है। दुनिया के कई देशों में सफलतापूर्वक इस्तेमाल हो रहे प्लास्टिक नोट भारत में कब और कैसे आएंगे, यह फैसला अभी बाकी है। आरबीआई का कहना है कि सभी जांच-पड़ताल के बाद ही कोई अंतिम निर्णय लिया जाएगा, इसके बाद में लोगों को आधिकारिक घोषणा का इंतज़ार करना होगा। आशीष दुबे / 11 जून 2026