वाशिंगटन (ईएमएस)। मध्य पूर्व में तनाव चरम पर है, और यदि ईरान और अमेरिका के बीच पूर्ण पैमाने पर युद्ध छिड़ता है, तब दुनिया का सबसे खतरनाक सैन्य टकराव हो सकता है। दशकों के प्रतिबंधों और हालिया सैन्य कार्रवाइयों ने ईरानी पारंपरिक युद्ध क्षमताओं को काफी हद तक कम कर दिया है। रणनीतिक विश्लेषकों और खुफिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उसके पास अब मूल क्षमता का करीब 22 प्रतिशत ही बचा है। इसके बाद यह सवाल उठना लाजिमी है कि अपने सीमित हथियारों के साथ ईरान दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति अमेरिका का सामना कैसे करेगा, और इस जंग में कौन-कौन से आधुनिक हथियार देखने को मिल सकते है। ईरान अच्छी तरह जानता है कि वह आमने-सामने की पारंपरिक लड़ाई में अमेरिकी वायुसेना और नौसेना का मुकाबला नहीं कर सकता। इसलिए, वह एसिमैट्रिक वॉरफेयर (विषम युद्ध) की रणनीति अपनाएगा, जिसका उद्देश्य अमेरिका को हजारों घाव देकर कमजोर करना होगा। ईरान अपने बचे हुए हथियारों का बेहद सोच-समझकर और रणनीतिक ठिकानों पर इस्तेमाल करेगा। वह अपने एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस यानी प्रॉक्सी संगठनों जैसे हिजबुल्लाह और हूती को सक्रिय करेगा, जिससे अमेरिका और उसके सहयोगियों पर चौतरफा हमले कर सकें। ईरान का मकसद अमेरिका को एक लंबी और थका देने वाली गुरिल्ला जंग में उलझाना होगा। भले ही ईरान के पास हथियारों की संख्या कम हो गई हो, लेकिन उसके पास मौजूद बचे हुए हथियार बेहद घातक हैं। वह खैबर और हज कासिम जैसी बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों के अपने बड़े नेटवर्क का इस्तेमाल करेगा, जो इजरायल और खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डों को निशाना बनाने में सक्षम हैं। इसके शाहेद-136 जैसे आत्मघाती ड्रोन सस्ते और प्रभावी हैं, जिनका उपयोग स्वार्म अटैक के लिए करेगा, ताकि अमेरिकी एयर डिफेंस सिस्टम को चकमा दे सके। फारस की खाड़ी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में, ईरान अपनी छोटी लेकिन बेहद तेज़ फास्ट अटैक बोट्स और पनडुब्बियों से अमेरिकी युद्धपोतों पर आत्मघाती हमले कर सकता है, और समुद्री बारूदी सुरंगें बिछाकर वैश्विक तेल आपूर्ति को रोक सकता है। दूसरी ओर, अमेरिका की युद्ध नीति हमेशा से शॉक एंड ऑव की रही है, यानी युद्ध की शुरुआत में ही दुश्मन पर इतनी भीषण बमबारी करना कि उसकी रीढ़ की हड्डी टूट जाए। अमेरिका का मुख्य उद्देश्य ईरान के बचे-खुचे हथियारों के कमांड सेंटर्स, मिसाइल लॉन्च पैड्स, रडार सिस्टम और परमाणु ठिकानों को नष्ट करना होगा। अमेरिका जमीनी सेना को ईरान के अंदर भेजने से बचेगा, क्योंकि वह वियतनाम या अफगानिस्तान जैसी स्थिति दोबारा नहीं चाहता। अमेरिकी रणनीति पूरी तरह से लंबी दूरी के सटीक हमलों, साइबर हमलों और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर पर टिकी होगी, जिससे ईरान का कम्युनिकेशन सिस्टम ठप किया जा सके। अमेरिका इस युद्ध में अपनी पूरी तकनीकी ताकत झोंक देगा। अमेरिकी वायुसेना अपने एफ-35 लाइटनिंग टू और बी-2 स्पिरिट जैसे स्टील्थ फाइटर जेट्स और बॉम्बर्स का उपयोग करेगी, जो ईरान के रडार की पकड़ में आए बिना उसके बंकरों और मिसाइल डिपो पर लेजर-गाइडेड बम गिरा सकते हैं। अमेरिकी नौसेना खाड़ी में तैनात अपनी पनडुब्बियों और विध्वंसक जहाजों से सैकड़ों टोमाहॉक क्रूज मिसाइलें दागेगी, जो सैकड़ों किलोमीटर दूर बैठे दुश्मन के ठिकानों को अचूक सटीकता से नष्ट कर सकती हैं। इसके अलावा, अमेरिका ईरान के पावर ग्रिड, मिलिट्री कम्युनिकेशन और मिसाइल कंट्रोल सिस्टम को हैक करने के लिए स्टक्सनेट जैसे खतरनाक साइबर हथियारों का इस्तेमाल कर सकता है, जिससे बिना गोली चलाए भी ईरान के हथियार बेकार हो सकते हैं। यदि यह युद्ध होता है, संख्या बल और तकनीक के मामले में अमेरिका बेहद मजबूत स्थिति में होगा। ईरान के पास हथियारों की कमी लंबे समय तक सीधे युद्ध में टिकने नहीं देगी। हालांकि, ईरान की असिमेट्रिक रणनीति, आत्मघाती ड्रोन और होर्मुज को बंद करने की क्षमता पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख सकती है। यह जंग केवल दो देशों के बीच नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर तेल संकट और तीसरे विश्व युद्ध जैसी स्थिति पैदा कर सकती है। आशीष/ईएमएस 12 जून 2026