लेख
12-Jun-2026
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स्वतंत्र भारत के इतिहास में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लगातार तीन बार जनता का विश्वास प्राप्त 12 वर्ष से अधिक समय तक प्रधानमंत्री पद पर बने रहकर एक नया असाधारण राजनीतिक अध्याय रच दिया। कुछ असफलताओं के बावजूद अधिकांशतः सफलतापूर्वक ठोस कार्य करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी निश्चित रूप से बधाई के पात्र हैं। राजनीति में उपलब्धियों का मूल्यांकन केवल दीर्घ अवधि से ही नहीं, बल्कि उस अवधि में किए गए कार्यों के प्रभावों से भी होता है। इसलिए यह अवसर उपलब्धियों और शेष चुनौतियों दोनों का निष्पक्ष मूल्यांकन करने का है। ‘‘ संघ के एजेंडे की पूर्ति ।’’ ‘‘स्वयंसेवक’’ प्रधानमंत्री मोदी की सबसे बड़ी राजनीतिक सफलता उन मुद्दों को मूर्त रूप देना रही है, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और जनसंघ से लेकर भारतीय जनता पार्टी के वैचारिक एजेंडे में दशकों से शामिल रहे हैं। अयोध्या में भगवान श्रीराम मंदिर निर्माण, जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 की समाप्ति तथा तीन तलाक पर कानून के साथ कॉमन सिविल कोड की दिशा में आगे कदम बढ़ाना ये ऐसे निर्णय हैं, जिन्होंने भाजपा के वैचारिक आधार और उसके समर्थक वर्ग को गहरा संतोष दिया है। इन निर्णयों ने प्रधानमंत्री मोदी और संघ परिवार के बीच विश्वास के रिश्ते को और मजबूत किया है। एक तरह से मोदी ने अपने समर्थक वर्ग की ‘‘बरसों की अधूरी प्यास’’ बुझाने का कार्य किया है। परिणाम स्वरूप (मुख्य रूप से) ‘‘संघ’’ की मेहनत के ही बदौलत वे सत्ता पर बने हुए हैं। ‘‘ मौजूदा चुनौतियां ’’ दूसरी ओर, हर लंबे शासनकाल की तरह मोदी सरकार के सामने भी कुछ ‘‘अनुत्तरित प्रश्न’’ व चुनौतियां हैंै। प्रधानमंत्री के खाते में कुछ असफलताएं खासकर विदेश नीति के क्षेत्र में जरूर दर्ज हैं विशेष रूप से पड़ोसी देशों के साथ संबंध, वैश्विक शक्ति संतुलन, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बदलते समीकरण, चीन के साथ सीमा विवाद, पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद, वैश्विक मंच पर पाकिस्तान अलग-थलग न कर पाना, निर्मम ‘‘पहलगाम हत्याकांड’’ का ‘‘ऑपरेशन सिंदूर’’ के द्वारा त्वरित सफल जवाब देने के बावजूद अंतरराष्ट्रीय जगत पर पाकिस्तान को उसके लिए जिम्मेदार ठहरा न पाना चुनौती बनी हुई है। साथ वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता विदेशी मुद्रा भंडार तथा मेक इन इंडिया व आत्मनिर्भरता के दावों को जमीनी हकीकत में बदलना भी शेष है। निश्चित रूप से मोदी की उपलब्धियों जितनी ही बड़ी भविष्य की चुनौतियां भी हैं। ‘‘ नेहरू को पैमाना बनाना कितना उचित ?’’ यहीं से एक दिलचस्प राजनीतिक प्रश्न खड़ा होता है। भारतीय जनता पार्टी और उसका वैचारिक परिवार वर्षों से पंडित जवाहरलाल नेहरू की नीतियों की किसी भी अवसर पर किसी भी फोरम पर संसद से लेकर सड़क तक, चुनावी मंचों से लेकर टीवी बहसों तक, कोई अवसर गवाएं बिना कड़ी आलोचना करती रही है। ऐसी स्थिति में दशकों से राजनीतिक असफलताओं का प्रतीक, बदनाम, देश हित के विरुद्ध कार्य करने वाला नेहरू,को लक्ष्य मानकर, बताकर उसे ‘‘उपलब्धि मापने’’ का पैमाना बनाना समझ से परे है? क्या भाजपा का यह कदम ‘‘विरोधाभासी’’ नहीं माना जाना चाहिए? क्योंकि उपलब्धियां और आलोचनाएं दोनों स्तर पर ‘‘नेहरू’’ का सहारा लेना पड़ रहा है। राजनीति में कहा जाता है कि ‘‘दूसरे की लकीर छोटी करने से बेहतर है, अपनी लकीर बड़ी करना।’’ वास्तव में भाजपा के पास पिछले बारह वर्षों की उपलब्धियों की लंबी सूची है। ऐसे में उसे अपनी सफलता सिद्ध करने के लिए किसी प्रतिद्वंद्वी नेता के रिकॉर्ड का सहारा लेने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। ‘‘ क्या भाजपा अपनी ही उपलब्धियों को ’छोटा कर रही है? ’’ प्रधानमंत्री मोदी का राजनीतिक कद व व्यक्तित्व देश में ही नहीं वैश्विक स्तर पर भी आज सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिना जाता है। वर्ष 1984 के लोकसभा चुनाव में मात्र 2 सीटों पर सिमटने वाली भाजपा, आज विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बन चुकी है। ऐसे में ‘‘अति उत्साह’’ में नेहरू को नीचा दिखाने के चक्कर में नेहरू के कार्यकाल की अवधि का सहारा लेकर अपने कार्य की लंबी अवधि को उपलब्धि बतलाना तथा ‘‘विश्व गुरु’’ की उपलब्धियों को बार-बार नेहरू की कसौटी पर रखकर मापना; कहीं न कहीं स्वयं मोदी के व्यक्तित्व को ‘‘कमतर’’करना तो नहीं? यदि कोई पर्वत ‘‘एवरेस्ट’’ बन चुका हो, तो उसे किसी पहाड़ी से ऊंचा सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं रहती। ‘‘स्वयं की लकीर बड़ी कीजिए ।’’ राजनीति का एक दिलचस्प सिद्धांत है कि जिस व्यक्ति का जितना अधिक उल्लेख (आलोचनात्मक, प्रश्नात्मक) आप करते हैं, उसकी ‘‘राजनीतिक प्रासंगिकता’’ उतनी ही बनी रहती है। दुर्भाग्यवश भाजपा की एक स्थायी रणनीति, विपक्ष खासकर कांग्रेस और विशेष रूप से नेहरू-गांधी खानदान को हर मुद्दे पर घसीटकर लाने की प्रवृतिका ने गांधी परिवार के ‘‘वृक्ष’’ को हरा भरा कर सींचने का ही काम किया है। ‘‘जिस पेड़ को काटना हो, उसे हर दिन पानी नहीं दिया जाता।’’ भाजपा कम से कम इस ‘‘आत्मघाती कदम’’ से आगे तो बचे? भाजपा नेतृत्व चाहता तो 21 मई 2014 को जब मोदी ने पहली बार शपथ ली थी, तब 21 मई 2026 को 12 साल पूरे होने पर देशभर में भव्य आयोजन कर अपनी उपलब्धियां को सामने रख कर विपक्ष की ‘‘12 बजा देता?’’ तब ‘‘नेहरू के नाम की लाठी’’ का सहारा लेने की जरूरत ही नहीं पड़ती। यह भी एक राजनीतिक वास्तविकता है कि जब तक कांग्रेस का नेतृत्व राहुल गांधी के हाथों में है, तब तक भाजपा स्वयं को अपेक्षाकृत सुरक्षित महसूस करती है। फिर भी, यदि हर मुद्दे पर राहुल गांधी को केंद्र में रखा जाता है, तो उन्हें ‘‘राजनीतिक ऑक्सीजन’’ मिलती रहेगी। राहुल गांधी को हर कहीं खारिज कर ‘‘कमजोर दुश्मन’’ की जगह मजबूत विपक्ष उदाहरणार्थ कॉकरोच जनता पार्टी जैसों को आने का अवसर क्यों दिया जा रहा है? इस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है ‘‘ निष्कर्ष ।’’ अपनी उपलब्धियां को स्थापित प्रसारित करने के लिए बार-बार नेहरू के कार्यकाल का सहारा लेना, भाजपा के राजनीतिक आत्मविश्वास पर भी प्रश्नचिह्न खड़े करता है। भाजपा को ‘‘नेहरू फोबिया’’ से बाहर आकर 12 वर्ष की यात्रा का स्वतंत्र वृतांत प्रस्तुत करना चाहिए। मूल्यांकन अपनी कसौटी पर होना चाहिए ना कि नेहरू की छाया में। आखिरकार, इतिहास में बड़ी लकीरें तुलना से नहीं, उपलब्धियों से बनती हैं। (लेखक, कर सलाहकार एवं पूर्व अध्यक्ष, बैतूल सुधार न्यास) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) ईएमएस / 12 जून 26