लेख
12-Jun-2026
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भारत में एक दौर वह भी था जब चुनाव आयोग का नाम सुनते ही बड़े से बड़े राजनेताओं के पसीने छूट जाते थे, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन के ज़माने में जनता को यह अटूट भरोसा था कि व्यवस्था चाहे जितनी भी रसूखदार हो, लोकतंत्र का यह पहरेदार किसी के आगे नहीं झुकेगा। लेकिन आज वह भरोसा इतिहास की धूल में मिल चुका है। हालिया मध्य प्रदेश और झारखंड के राज्यसभा चुनाव के दौरान जो कुछ भी हुआ, उसने यह साफ कर दिया है कि चुनाव आयोग अब अपनी निष्पक्षता और विश्वसनीयता को पूरी तरह खो चुका है। यह संस्था अब लोकतंत्र की रक्षक नहीं, बल्कि सत्ता की सहूलियत के हिसाब से पर्चियां काटने वाला एक सरकारी महकमा बनकर रह गई है। इस संस्था की साख खत्म होने का सबसे ताजा और पुख्ता सबूत मध्य प्रदेश में कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन के नामांकन का रद्द होना है, एक ऐसे मामले में, जो कानूनी तौर पर पूरी तरह से एक सामान्य नोटिस था और जिस पर अदालत ने संज्ञान तक नहीं लिया था, आयोग के रिटर्निंग ऑफिसर ने महज़ 15 मिनट के भीतर उनका पर्चा खारिज कर दिया। विपक्ष के किसी उम्मीदवार की ज़रा सी तकनीकी चूक या तथाकथित खामी पर आयोग का यह सुपरफास्ट एक्शन उसकी नीयत को जगजाहिर कर देता है। लोकतंत्र का तकाजा कहता है कि हर उम्मीदवार को अपनी बात रखने और गलती सुधारने का मौका मिलना चाहिए, लेकिन यहाँ विपक्ष के लिए नियम पत्थर की लकीर बना दिए गए। असली खेल तब समझ में आता है, जब हम इसी आयोग का दूसरा चेहरा ठीक उसी समय झारखंड में देखते हैं। झारखंड में एनडीए और भाजपा समर्थित एक बड़े कॉरपोरेट उम्मीदवार परिमल नाथवानी के नामांकन पत्र में जब विपक्ष ने पाँच से अधिक गंभीर खामियों और अधूरी जानकारियों की लिखित शिकायत दर्ज कराई, तब आयोग के नियम अचानक मोम की तरह पिघल गए। जहां मध्य प्रदेश में विपक्ष के उम्मीदवार को 15 मिनट की मोहलत नहीं मिली, वहीं झारखंड में सत्ता समर्थित रसूखदार उम्मीदवार को अपनी गलतियां सुधारने और नया हलफनामा दाखिल करने के लिए बकायदा 24 घंटे से अधिक का समय दे दिया गया। एक ही देश में, एक ही राज्यसभा चुनाव के लिए, एक ही चुनाव आयोग के दो अलग-अलग राज्यों में ये दो अलग-अलग कानून इस बात की गवाही हैं कि आयोग का दोहरा मापदंड अब अपनी चरम सीमा पर पहुंच चुका है। एक तरफ बिना किसी ठोस कानूनी आधार के पर्चा तुरंत खारिज कर दिया जाता है ताकि सत्ता पक्ष को वॉकओवर मिल सके, और दूसरी तरफ रसूखदारों की कमियों को छुपाने और सुधारने के लिए पूरी व्यवस्था पलकें बिछाए खड़ी रहती है। इसे आप क्या कहेंगे? क्या यह निष्पक्षता है? या फिर सत्ता की हुज़ूरी में लोकतंत्र का खुला चीरहरण? एक आम वोटर के नजरिए से देखें तो यह स्थिति बेहद डरावनी है। कोई भी नागरिक इस उम्मीद के साथ वोट देता है कि वह देश की व्यवस्था को तय कर रहा है। लेकिन जब मीनाक्षी नटराजन जैसे उदाहरण सामने आते हैं, जहां नियमों का इस्तेमाल केवल एकतरफा कार्रवाई के लिए किया जाता है, तो जनता के भीतर की उम्मीद पूरी तरह दम तोड़ देती है। लोगों के मन में यह बात पत्थर की तरह बैठ चुकी है कि वे चाहे जिसे भी चुनें, चुनाव आयोग और पूरी मशीनरी अंत में वही करेगी जो सत्ता में बैठे लोग चाहेंगे। जनता का यह घोर अविश्वास ही इस बात की आखिरी मुहर है कि आयोग अपनी बची-कुची साख भी पूरी तरह गंवा चुका है। अब यह सवाल पूछने का वक्त खत्म हो चुका है कि चुनाव आयोग अपनी साख कैसे बचाएगा। हकीकत यह है कि वह साख अब बची ही नहीं है। नियम अब सबके लिए बराबर नहीं रहे; वे इस बात से तय होते हैं कि उम्मीदवार सत्ता के करीब है या विपक्ष में। इतिहास जब भी भारत के लोकतंत्र के इस दौर को दर्ज करेगा, तो चुनाव आयोग को एक निष्पक्ष पहरेदार के रूप में नहीं, बल्कि सत्ता के इशारों पर लोकतंत्र की रीढ़ तोड़ने वाले एक मूकदर्शक के रूप में याद रखेगा। (लेखक पत्रकार हैं ) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) ईएमएस / 12 जून 26