लेख
12-Jun-2026
...


पूरी दुनिया में जेन-जी की आबादी चिंता का कारण बनती चली जा रही है। यह युवा आबादी ना तो अपने परिवार के बारे में सोचती है, नाही समाज के बारे में सोचती है, यह केवल अपने बारे में सोचती है। इसके पास शिक्षा की डिग्रियां भी हैं, लेकिन डिग्री के अनुरूप ज्ञान नहीं है। जीवन जीने का कोई अनुभव नहीं है। वह कोई चीज सीखना भी नहीं चाहते हैं। किसी चीज से जुड़ते हैं और उसे जल्दी ही छोड़ देते हैं। उनका सबसे ज्यादा समय सोशल मीडिया और इंटरनेट पर बीत रहा है, जिसके कारण वह सामान्य ज्ञान से भी दूर होते चले जा रहे हैं। वर्तमान की जो युवा पीढ़ी है वह डिग्री लेकर बड़े-बड़े सपने देखती है लेकिन डिग्री के अनुरूप उसके पास ना तो कोई ज्ञान होता है नाही वह कोई काम करना चाहता है जिसके कारण यह युवा पीढ़ी एक बड़ी चिंता का कारण भी बन रही है। जेन-जी को ना तो वामपंथी विचारधारा पर विश्वास है ना ही उसे पूंजीवाद पर विश्वास है, वह पूरी तरह से सेल्फिश होकर केवल अपने बारे में सोचती है। उसे अपने परिवार और मां-बाप की कठिनाइयों से भी कोई सरोकार नहीं रहता है। वह जब भी बात करता है केवल अपने हित की बात करता है। वह अपने माता-पिता और परिवार से दूर रहकर केवल अपनी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए अपने परिवार से उतना ही जुड़ता है जो उसकी जरूरत पूरी करने के लिए जरूरी होती हैं। भारत, अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, जर्मनी, यूरोपीय देश सभी में जेन-जी के इस बर्ताव से सामाजिक और पारिवारिक व्यवस्था में अब एक तनाव देखने को मिल रहा है। हाल ही में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट आफ पॉलिटिक्स ने 2020 से 2025 के बीच जो सर्वे किया था उसमें यह बात खुलकर सामने आई कि इस युवा पीढ़ी को पूंजीवाद वामपंथ समाजवाद इत्यादि विचारधारा से कोई लेना-देना नहीं है। यह केवल अपनी जरूरत से जुड़कर ही अपनी बात रखता है। मेरा किराया कम करो, फीस माफ करो, मुफ्त बस सेवा दो, मुझे नौकरी दो, नौकरी भी सबसे अच्छी वाली चाहिए है, जिसमें बड़ा वेतन मिलता हो, कॉरपोरेट ऑफिस हो। इस तरह की मांग इस युवा पीढ़ी की होती है, लेकिन यह अनुभव प्राप्त करने के लिए अथवा जो भी नौकरी या रोजगार करना चाहता है जो उसके सपने में है उसके लिए वह अपने आपको तैयार भी नहीं कर रहा है। सोशल मीडिया के जरिए उसके सपने बड़े-बड़े हो गए हैं। सारी दुनिया में क्या हो रहा है यह उसे पता है लेकिन उसका केरियर कैसे बनेगा इसके बारे में वह जरा भी गंभीर नहीं है। सबसे बड़ी चिंता का विषय यह है कि यह अपने मां-बाप को भी अपना नहीं मानने के लिए तैयार है, क्योंकि वह उसकी जरूरतों को पूरा नहीं कर पाते हैं। ऐसी स्थिति में वह उनसे भी नाराज रहकर विद्रोह करने की स्थिति में आ जाता है। वर्तमान में यह वर्ग बढ़ती हुई महंगाई, बेरोजगारी तथा इसका रहन-सहन और खर्च करने की आदत के कारण यह सबसे ज्यादा परेशान है। हाल ही में जो सर्वे हुए हैं उनमें 36 फ़ीसदी युवा इसी स्थिति से गुजर रहा है। यह युवा वर्ग अरबपतियों पर भारी टैक्स लगाने का पक्षधर है। यह बाजारवाद का शिकार हो गया है। सारी दुनियां में जिस तरह से कॉरपोरेट लगातार सामान की कीमत बढ़ाकर मुनाफाखोरी कर रहे हैं, उससे यह युवा वर्ग के टारगेट में आते चले जा रहे हैं। हाल ही में अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर के मेयर जोहरान ममदानी निर्वाचित हुए हैं, उनकी जीत में सबसे बड़ा कारण यही बताया जा रहा है कि उन्होंने जेन-जी के इस मनोविज्ञान को समझा उन्होंने इसी वर्ग के लिए सबसे ज्यादा लोक लुभावन वायदे किए। ममदानी ने निम्न वर्ग और मध्य वर्ग को महंगाई से राहत दिलाने की बात की, उन्होंने महंगाई के खिलाफ सभी लोगों को एकजुट किया। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विरोध के बाद भी उन्होंने न्यूयॉर्क में मेयर के पद के चुनाव में जीत हासिल की। अब उनकी देखा-देखी यूरोप के अन्य देशों में भी चुनाव जीतने के लिए यही फार्मूला अपनाया जा रहा है। ब्रिटेन के ग्रीन पार्टी के नेता जैक पोलंसकी भी चुनाव जीतने के लिए लोक लुभावन वादे कर रहे हैं। भारत पर पिछले एक दशक से राजनीतिक दल चुनाव जीतने के लिए इसी तरह के वादे करके चुनाव जीत रहे हैं, लेकिन अभी तक भारत में जेन-जी की समस्याओं को हल करने की दिशा में केंद्र सरकार और राज्य सरकारों ने कोई काम नहीं किया है। इस दिशा में भी जेन-जी गंभीर नहीं नजर आता है। वैश्विक व्यापार संधि के बाद सारी दुनिया में कर्ज और बाजारवाद की जो आंधी चली है उसमें सबसे ज्यादा प्रभावित यही जेन-जी हुआ है। इसने अपने सपने पूरे करने के लिए एजुकेशन लोन भी लिया है। गाड़ी-घोड़े भी लोन से लिए हैं। मोबाइल फोन भी किस्तों पर लेकर तथा क्रेडिट कार्ड और अन्य तरीके से कर्ज लेकर अपने खर्चे पूरे करने का जो तरीका अपनाया था वह उसकी आदत में शुमार हो चुका है। जिस तरह से भारत सहित दुनिया के सभी देशों में महंगाई और बेरोजगारी बढ़ रही है, रही सही कसर ए आई तकनीकी के कारण बेरोजगारी और तेजी के साथ बढ़ रही है। महंगाई भी लगातार बढ़ती चली जा रही है। ऐसी स्थिति में एक बड़ी पारिवारिक, सामाजिक और आर्थिक समस्या एक विकट रूप में सामने आ रही है। इस समस्या का समाधान किस तरह से होगा, इसको लेकर अब दुनिया भर के विश्वविद्यालय शोध कार्यक्रम चला रहे हैं। डिग्रियों के बावजूद जब काम नहीं मिल रहा है, बेरोजगारी बढ़ रही है ऐसी स्थिति में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अब कॉलेज और विश्वविद्यालय में एडमिशन नहीं हो पा रहे हैं। हर साल बड़ी संख्या में सीट खाली रह जाती हैं। महंगाई के कारण मांग घटती चली जा रही है। कारपोरेट जगत का मुनाफा निश्चित रूप से बड़ी तेजी के साथ बढ़ रहा है लेकिन जिस तरह से अब मांग घटने लगी है इसके कारण कॉरर्पोरेट भी चिंतित नजर आने लगे हैं। बदली हुई इस व्यवस्था को लेकर सारी दुनिया में चिंता बढ़ गई है। सरकारों के खिलाफ आंदोलन हो रहे हैं। हर तरफ अफरा-तफरी का माहौल है। दुनिया में आर्थिक मंदी और महंगाई दोनों ही बढ़ रही हैं। जिस तेजी के साथ जेन-जी का गुस्सा देखने को मिलता है। बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल एवं अन्य देशों की घटनाओं को देखते हुए यह क्षणिक में बहुत बड़ा नुकसान कर देता है और उसके बाद निराशा में शांत होकर बैठ जाता है। इस वर्ग के इस आचरण को देखते हुए किसी क्रांतिकारी बदलाव की आशा भी देखने को नहीं मिल रही है। इससे सभी आश्चर्यचकित हैं। ईएमएस / 12 जून 26