पाताल से गूंजने वाला भारत का स्वदेशी ब्रह्मास्त्र नई दिल्ली(ईएमएस)। के-15 सागरिका महज एक मिसाइल नहीं बल्कि समंदर की अथाह गहराइयों में छिपी भारत की वो अदृश्य प्रतिज्ञा है, जिससे दुश्मन का बचना नामुमकिन है। देश के गौरव और मिसाइल मैन डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के मार्गदर्शन में विकसित यह मिसाइल पानी के नीचे बैठी साक्षात मौत की तरह है। करीब 1 टन वजनी घातक परमाणु बम को अपनी पीठ पर लादकर, यह महाकाल समंदर की छाती फाड़कर सीधे गोली की रफ्तार से बाहर आता है। इसकी तूफानी रफ्तार और अचूक निशाना दुश्मन को संभलने का एक सेकंड का मौका भी नहीं देता। जब पाताल से यह स्वदेशी ब्रह्मास्त्र गूंजता है, तो पलक झपकते ही दुश्मन के बड़े से बड़े सैन्य ठिकाने तबाह हो सकते हैं। युद्ध का सबसे बड़ा नियम है कि दुश्मन को भनक भी न लगे और उसका विनाश हो जाए। भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से यह बात के-15 सागरिका पर बिल्कुल सटीक बैठती है। यह भारत की पहली स्वदेशी पनडुब्बी से दागी जाने वाली बैलिस्टिक मिसाइल (एसएलबीएम) है। सागरिका भारत के न्यूक्लियर ट्रायड यानी जल, थल और नभ से परमाणु हमला करने की क्षमता का सबसे महत्वपूर्ण और गुप्त हिस्सा है। जब इस मिसाइल को भारत की पहली परमाणु पनडुब्बी आईएनएस अरिहंत में तैनात किया गया, तब भारत दुनिया का छठा ऐसा शक्तिशाली देश बना जिसके पास समंदर के भीतर से परमाणु मिसाइल दागने की स्वदेशी तकनीक मौजूद है। हालांकि, के-15 सागरिका की रेंज अमेरिका या फ्रांस की मिसाइलों की तुलना में कम है, लेकिन भारत की रक्षा रणनीति नो फर्स्ट यूज यानी पहले परमाणु हमला न करने के सिद्धांत पर आधारित है। पाकिस्तान और चीन की सीमाओं को देखते हुए समंदर से इसकी 750 किलोमीटर की आधिकारिक मारक क्षमता दुश्मन के प्रमुख औद्योगिक और सैन्य केंद्रों को नेस्तनाबूद करने के लिए पर्याप्त है। रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि इसके पेलोड यानी हथियार के वजन को कम किया जाए, तो यह 1,000 किलोमीटर से अधिक दूरी पर स्थित दुश्मन के ठिकानों को भी निशाना बना सकती है। भारत अब इसकी अगली कड़ी के रूप में 3,500 किलोमीटर रेंज वाली के-4 मिसाइल को भी अपने बेड़े में शामिल कर रहा है। तकनीकी खासियतों की बात करें तो सागरिका को समंदर की गहराइयों में छिपी पनडुब्बी से वर्टिकल यानी सीधे लॉन्च किया जाता है। पानी के भीतर गैस जनरेटर मिसाइल को पानी की सतह के ऊपर धकेलता है और हवा में आते ही मिसाइल का मुख्य रॉकेट मोटर स्टार्ट हो जाता है। ठोस ईंधन से लैस होने के कारण इस मिसाइल को सालों तक पनडुब्बी के भीतर बिना किसी रखरखाव के रेडी-टू-लॉन्च स्थिति में रखा जा सकता है। संकट के समय इसे दागने में महज कुछ सेकंड का वक्त लगता है। इसमें स्वदेशी रूप से विकसित एडवांस इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम और सैटेलाइट गाइडेंस का उपयोग किया गया है, जो पानी से निकलने के बाद हवा में तेजी से रास्ता बदलते हुए दुश्मन के रडार को चकमा देकर सीधे टारगेट पर सटीक वार करती है। भारत के मिसाइल बेड़े में के-15 सागरिका का शामिल होना एक गेम-चेंजर घटना है। यदि दुश्मन देश भारत पर पहला परमाणु हमला करके भारत के सभी थल सेना और वायुसेना के मिसाइल ठिकानों को नष्ट भी कर दे, तो भी समंदर की अथाह गहराइयों में छिपी आईएनएस अरिहंत पनडुब्बी और उसमें तैनात सागरिका मिसाइलें पूरी तरह सुरक्षित बची रहेंगी। यह मिसाइल भारत को सेकंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी यानी अचूक परमाणु पलटवार की गारंटी देती है। यही वजह है कि यह मिसाइल हिंद महासागर में चीनी नौसेना की घुसपैठ और पाकिस्तान की नापाक हरकतों के खिलाफ भारत का सबसे बड़ा प्रतिरोधक हथियार साबित हुई है। वीरेंद्र/ईएमएस 13 जून 2026