ट्रंप की मुराद हुई पूरी वाशिंगटन,(ईएमएस)। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की दो प्रमुख महत्वाकांक्षाएं आखिरकार पूरी हुई हैं, जो अमेरिका की वैश्विक शक्ति में अभूतपूर्व वृद्धि का सूचक है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने वाले दो सबसे बड़े कारकों डॉलर को वैश्विक व्यापार का बादशाह बनाना और कच्चे तेल के निर्यात पर नियंत्रण हासिल करना दोनों ही मोर्चों पर अमेरिका को बड़ी कामयाबी मिली है। इन सफलताओं के साथ, दुनिया में जारी संघर्ष के शांत होने की उम्मीद जगी है। अमेरिका अब कच्चे तेल का सबसे बड़ा निर्यातक बन चुका है, जिसने दशकों से शीर्ष पर रहे रूस और सऊदी अरब को पीछे छोड़ दिया है। 2010 से अपने तटीय क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर तेल और गैस उत्पादन शुरू करने के बाद, अमेरिका ने वैश्विक बाजार में अपना तेल बेचने के लिए दो युद्धों का लाभ उठाया। फरवरी 2022 में शुरू हुए रूस-यूक्रेन युद्ध ने रूसी तेल निर्यात को बाधित किया, जबकि फरवरी 2026 में ईरान के साथ शुरू हुए संघर्ष और होर्मुज जलसंधि पर लगाए गए ब्लॉकेज ने पश्चिम एशिया से आपूर्ति को कम कर दिया। इससे अमेरिका के लिए अपने तेल को वैश्विक स्तर पर बेचने का रास्ता खुल गया। शिप पर नजर रखने वाली एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, मई में अमेरिका का निर्यात 1.05 करोड़ बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया है, और यह लगातार तीसरा महीना है जब वह सबसे बड़ा कच्चा तेल निर्यातक बना हुआ है। रूस ने मई में प्रतिदिन 70 लाख बैरल और सऊदी अरब ने 59 लाख बैरल का निर्यात किया। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की दूसरी सबसे बड़ी इच्छा डॉलर को वापस दुनिया की प्रमुख मुद्रा बनाने की थी। भारत, चीन और रूस जैसे बड़े देशों की डी-डॉलरराइजेशन की मंशा को विफल कर ट्रंप ने रूस पर प्रतिबंध लगाकर और ईरान संघर्ष के माध्यम से होर्मुज को बंद करके वैश्विक क्रूड आपूर्ति को बाधित किया। इसका सीधा असर डॉलर पर दिखा और उसमें मजबूती आने लगी। आज डॉलर दुनिया की 6 सबसे मजबूत करेंसी के मुकाबले बेहतर स्थिति में है। ब्रिक्स देशों सहित कई ने अब डी-डॉलरराइजेशन की अपनी महत्वाकांक्षाओं को ठंडे बस्ते में डाल दिया है, जो अमेरिका की आर्थिक और रणनीतिक जीत को दर्शाता है। आशीष दुबे / 13 जून 2026