1950 में भारत का संविधान लागू हुआ था। संविधान के अनुसार संवैधानिक संस्थाओं का निर्माण हुआ। उनकी जिम्मेदारी तय की गई, उनके लिए कानून बनाए गए। भारत के संविधान में विधायिका कार्यपालिका और न्यायपालिका के रूप में संविधान की शक्तियों में तीनों को अधिकार दिए गए। भारत का संविधान और लोकतंत्र, सनातन की आस्था और विश्वास जिसमें ब्रह्मा-विष्णु और महेश तीन महाशक्तियों को ब्रह्मांड को संचालित करने का आधार माना गया है। ठीक उसी तरह से भारत में उक्त तीनों स्तम्भ को ताकतवर बनाते हुए, चौथा स्तंभ मीडिया और जनता को बनाया गया। भारत के संविधान में जनता का राज कायम किया गया। जनता ही चुनाव के माध्यम से अपने अधिकार निर्वाचित प्रतिनिधि को सौंपती है। जनता से चुने विधायक और सांसद के बहुमत के आधार पर मिले अधिकार से विधानसभा और संसद में कानून बनाए जाते हैं। सांसदों और विधायकों को जनता के प्रति जिम्मेदार बनाया गया। संसद और विधानसभा में जनता का पक्ष रखने के लिए पूर्ण स्वतंत्रता दी गई। यह सारी व्यवस्था समय के साथ 1990 तक देखने को मिली। उसके बाद से गठबंधन की सरकारें बनने लगीं, सरकार बनाने के लिए जोड़-तोड़ होने लगा। विचारधारा एवं राजनीतिक दलों के घोषणा पत्र का कोई महत्व नहीं रहा। उसके बाद से संवैधानिक व्यवस्था में लोकतंत्र कमजोर होना शुरू हुआ। अब इतना कमजोर हो गया है, कि इसे लोकतंत्र के स्थान पर ठोकतंत्र कहना शायद ज्यादा उपयुक्त होगा। हाल ही में पश्चिम बंगाल के चुनाव हुए हैं। एसआईआर में 90 लाख से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। 27 लाख मतदाताओं ने ट्रिब्यूनल में अपील की। फैसला हुए बिना पश्चिम बंगाल का चुनाव हो गया। 2 लाख से ज्यादा अर्धसैनिक बल पश्चिम बंगाल के चुनाव में तैनात किए गए। मतदान और मतगणना को लेकर टीएमसी ने गड़बड़ियों की शिकायत चुनाव आयोग, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में की। किंतु समय रहते कोई फैसला नहीं हुआ। फार्म 17सी में ईवीएम मशीन के जो नंबर दर्ज थे, उनके स्थान पर अन्य ईवीएम मशीन से मतगणना की गई। आपत्ति करने पर मतगणना रोक दी गई, उसके बाद चुनाव परिणाम घोषित कर दिए गए। अब 4000 ईवीएम की मशीनें जल गई हैं। 45 दिन तक चुनाव आयोग को सारे सबूत सुरक्षित रखने होते हैं। अब सबूत जलने शुरू हो गए हैं। इसी बीच टीएमसी के सांसदों और विधायकों को सड़क पर पीटा गया। पश्चिम बंगाल में दहशत का वातावरण बना हुआ है। इसी बीच चर्चा है, 20 से अधिक सांसद टीएमसी छोड़कर एक अलग गुट बनाकर ऐसी पार्टी में जा रहे हैं, जिसका ना तो एक विधायक है, ना उसके सांसद हैं। त्रिपुरा में उसने कुछ चुनाव जरूर लड़े हैं। एक फ़ीसदी वोट भी उसे हासिल नहीं हुए हैं। ऐसी गुमनाम पार्टी में राष्ट्रीय पार्टी के सांसद और विधायक विलय करने जा रहे हैं। विधानसभा और लोकसभा के अध्यक्ष इन्हें अनुमति प्रदान कर रहे हैं। आगे चलकर चुनाव आयोग से भी इन्हें मान्यता मिल जाएगी। ईडी, सीबीआई, सीआईडी और स्थानीय पुलिस बल के निशाने पर टीएमसी के सांसद और विधायक हैं। इन्हें घर में घुसकर पीटा जा रहा है। इन्हें सुरक्षा नहीं दी जा रही है। इनकी शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। पिछले एक सप्ताह में प. बंगाल की राजनीतिक घटनाओं, दल-बदल कानून, लोकसभा, राज्यसभा एवं विधानसभा की घटनाएं जिस तरह से चर्चाओं में है। टीएमसी और सरकार के बीच तुम डार-डार और हम पात-पात का खेल चल रहा है। वह सभी को आश्चर्यचकित कर रहा है। ऐसी स्थिति में अब आम जनता भी यह मानकर चलने लगी है। उसके अधिकार भी खत्म होने जा रहे हैं। अब सरकार तय करती है, मतदाता कौन होगा, चुनाव में कौन जीतेगा। वह किस पार्टी में रहेगा, यह एक ऐसा नया तंत्र विकसित हुआ है। जिसने लोकतंत्र की स्थापित परम्परा के स्थान पर अब ठोकतंत्र का राज कायम करने की नई परम्परा देखने को मिल रही है। जनता के बीच अब यह धारणा बनने लगी है। पिछले एक- डेढ़ वर्षो में चुनाव आयोग की जो भूमिका देखने को मिली है। न्यायपालिका की भी जो भूमिका देखने को मिल रही है। उसके कारण जनता के मन में यह विश्वास मजबूत हो रहा है, चुनाव के नाम पर भाजपा और चुनाव आयोग जो चाहते है, वही परिणाम आते हैं। परिणाम आने के बाद भी अब इस बात की कोई गारंटी नहीं रह गई है। दल-बदल कानून होते हुए भी राजनीतिक दल अपने आप को सुरक्षित रख पाएं। रही-सही कसर लोकसभा, राज्यसभा और राज्यों की विधानसभा में देखने को मिल रही है। सत्र बहुत कम बुलाए जाते हैं। आसंदी बोलने के पहले सेंसरशिप लगा देती है। बिना चर्चा के ध्वनिमत से विधेयक पास हो जाते हैं और कानून बन जाते हैं। विपक्ष की सुनवाई कहीं पर भी नहीं हो रही है। सुनवाई के नाम पर तारीख पर तारीख और राजनीतिक साजिश में संवैधानिक संस्थाएं शामिल होकर सरकार के पक्ष में काम कर रही हैं। इससे लोकतंत्र और संविधान के प्रति लोगों का मोह भंग हो रहा है। महंगाई, बेरोजगारी, कर्ज एवं अन्य समस्याएं लगातार बढ़ती चली जा रही हैं। देश भर में जगह-जगह आंदोलन हो रहे हैं। संवैधानिक संस्थाओं, राजनीतिक दलों, आम जनता के बीच जिस तरह से अविश्वास बढ़ता जा रहा है। वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में यह लोकतंत्र और भारतीय संविधान के लिए कोई अच्छे संकेत नहीं हैं। रामचरित मानस में तुलसीदास जी ने लिखा है, समरथ को नहीं दोष गुसाईं। जिसके पास सामर्थ है, उसका कोई दोष नहीं होता है। सत्ता-जर जोरू-जमीन और गुलाम सामर्थवान के पास सुरक्षित होते हैं। भारत के पुराणों में उल्लेख है, राक्षस समय-समय पर बलशाली हुए हैं। राक्षसों के बलशाली होने पर देवता प्राण बचाने के लिए यहां से वहां भागते थे। वर्तमान स्थिति में सभी को इस सत्य को स्वीकार करना होगा। जो स्वीकार नहीं करेगा, उसे दंड भोगना होगा। ईएमएस / 15 जून 26