- महाराणा प्रताप जयंती : संघर्ष, त्याग और स्वतंत्रता की अमर गाथा भारत के इतिहास में अनेक ऐसे महापुरुष हुए हैं जिन्होंने अपने साहस, त्याग और राष्ट्रप्रेम से आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का मार्ग प्रशस्त किया। ऐसे ही महान योद्धाओं में वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। महाराणा प्रताप केवल मेवाड़ के शासक ही नहीं थे, बल्कि वे भारतीय स्वाभिमान, स्वतंत्रता और अदम्य साहस के जीवंत प्रतीक थे। उन्होंने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण मातृभूमि, संस्कृति और सम्मान की रक्षा के लिए समर्पित कर दिया। यही कारण है कि सदियों बाद भी उनका नाम करोड़ों भारतीयों के हृदय में श्रद्धा और गौरव के साथ लिया जाता है। महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को राजस्थान के कुंभलगढ़ दुर्ग में हुआ था। वे मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश के महान शासक थे। उनके पिता महाराणा उदयसिंह द्वितीय और माता जयवंता बाई थीं। बचपन से ही प्रताप में वीरता, नेतृत्व क्षमता और स्वाभिमान के गुण दिखाई देने लगे थे। कहा जाता है कि उन्होंने अपनी माता से ही साहस, शौर्य और युद्धकला की प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की थी। आगे चलकर यही गुण उन्हें भारतीय इतिहास के सबसे महान योद्धाओं में शामिल करने वाले बने। महाराणा प्रताप की जयंती को लेकर देशभर में विशेष उत्साह रहता है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार उनका जन्म 9 मई 1540 को हुआ था, इसलिए अनेक स्थानों पर इसी दिन जयंती समारोह आयोजित किए जाते हैं। वहीं मेवाड़ क्षेत्र में सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार उनकी जयंती हिन्दू पंचांग की ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया तिथि को मनाई जाती है। वर्ष 2026 में यह तिथि 17 जून को पड़ रही है। मेवाड़ के लोगों के लिए यह केवल एक जयंती नहीं बल्कि अपनी गौरवशाली विरासत और संस्कृति का उत्सव है। महाराणा प्रताप का जीवन संघर्षों से भरा हुआ था। जब वे मेवाड़ के शासक बने, उस समय मुगल सम्राट अकबर अपनी सत्ता का विस्तार कर रहा था। अधिकांश राजपूत राजाओं ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली थी, लेकिन महाराणा प्रताप ने अपने स्वाभिमान और स्वतंत्रता से कभी समझौता नहीं किया। अकबर ने कई बार दूत भेजकर उन्हें अपनी अधीनता स्वीकार करने का प्रस्ताव दिया, किंतु प्रताप ने हर बार उसे अस्वीकार कर दिया। उनका मानना था कि मातृभूमि की स्वतंत्रता किसी भी कीमत पर नहीं बेची जा सकती। महाराणा प्रताप और अकबर के बीच संघर्ष का सबसे प्रसिद्ध अध्याय हल्दीघाटी का युद्ध है। 18 जून 1576 को राजस्थान के गोगुंदा के समीप हल्दीघाटी में यह ऐतिहासिक युद्ध लड़ा गया। महाराणा प्रताप के पास सीमित संसाधन और अपेक्षाकृत छोटी सेना थी, जबकि मुगल सेना संख्या और साधनों में कहीं अधिक शक्तिशाली थी। इसके बावजूद प्रताप और उनके सैनिकों ने अद्भुत साहस का परिचय दिया। इस युद्ध में भील समुदाय ने भी महाराणा का पूरा साथ दिया। युद्ध कई घंटों तक चला और रणभूमि वीरता की असंख्य गाथाओं की साक्षी बनी। हल्दीघाटी के युद्ध का कोई निर्णायक परिणाम नहीं निकला, लेकिन इस युद्ध ने यह सिद्ध कर दिया कि स्वतंत्रता और स्वाभिमान के लिए लड़ी जाने वाली लड़ाई केवल संख्या या संसाधनों के आधार पर नहीं जीती जाती। महाराणा प्रताप घायल होने के बावजूद जीवित बचे और संघर्ष जारी रखा। उनका प्रिय घोड़ा चेतक भी इस युद्ध में अपनी अद्भुत स्वामीभक्ति के कारण अमर हो गया। चेतक ने गंभीर रूप से घायल होने के बाद भी अपने स्वामी को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाया और फिर वीरगति को प्राप्त हुआ। आज भी चेतक का नाम निष्ठा और समर्पण के प्रतीक के रूप में लिया जाता है। हल्दीघाटी के युद्ध के बाद महाराणा प्रताप ने हार नहीं मानी। उन्होंने अरावली की पहाड़ियों, जंगलों और दुर्गम क्षेत्रों में रहकर संघर्ष जारी रखा। कई बार उन्हें और उनके परिवार को अत्यंत कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। भोजन के अभाव में घास की रोटियां तक खानी पड़ीं, लेकिन उन्होंने कभी आत्मसमर्पण नहीं किया। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि सच्चा नेतृत्व विपरीत परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करता। महाराणा प्रताप की सबसे बड़ी विशेषता उनका अटूट आत्मसम्मान था। उन्होंने जीवनभर स्वतंत्रता को सर्वोच्च महत्व दिया। वे जानते थे कि संघर्ष कठिन है, फिर भी उन्होंने अपने लोगों और अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए हर चुनौती स्वीकार की। यही कारण है कि उनका नाम भारतीय इतिहास में स्वतंत्रता के अग्रदूतों में लिया जाता है। महाराणा प्रताप का राजतिलक उदयपुर के निकट गोगुंदा में हुआ था। यह स्थान आज भी राजतिलक स्थली के रूप में प्रसिद्ध है। इतिहास और संस्कृति से जुड़े लोगों के लिए यह स्थल अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। महाराणा प्रताप जयंती के अवसर पर यहां विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। श्रद्धालु और इतिहास प्रेमी बड़ी संख्या में पहुंचकर महान योद्धा को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। हल्दीघाटी के समीप स्थित यह क्षेत्र आज भी महाराणा प्रताप की गौरवगाथा को जीवंत बनाए हुए है। उदयपुर से लगभग 35 किलोमीटर दूर स्थित राजतिलक स्थली पर हर वर्ष कवि सम्मेलन, सांस्कृतिक कार्यक्रम, वीर रस की प्रस्तुतियां और ऐतिहासिक संगोष्ठियां आयोजित की जाती हैं। इन आयोजनों का उद्देश्य नई पीढ़ी को महाराणा प्रताप के आदर्शों से परिचित कराना और राष्ट्रप्रेम की भावना को मजबूत बनाना है। वर्ष 2026 में भी महाराणा प्रताप जयंती को लेकर देशभर में अनेक आयोजन प्रस्तावित हैं। उदयपुर में सात दिवसीय कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, जिनमें भव्य शोभायात्रा, अश्व पूजन, महाआरती, वीर शहीदों का स्मरण और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां शामिल हैं। मोतीमगरी स्थित महाराणा प्रताप स्मारक पर विशेष श्रद्धांजलि कार्यक्रम होंगे। वहीं विभिन्न राज्यों और शहरों में भी प्रतिमाओं पर माल्यार्पण, संगोष्ठियां और जनजागरण कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। महाराणा प्रताप की 486वीं जयंती पर श्रद्धांजलि समारोह आयोजित किया जा रहा है। विभिन्न स्थानों पर स्थापित उनकी प्रतिमाओं पर पुष्पांजलि अर्पित कर उनके आदर्शों का स्मरण किया जाएगा। यह दर्शाता है कि महाराणा प्रताप केवल राजस्थान ही नहीं, बल्कि पूरे देश की प्रेरणा हैं। महाराणा प्रताप का जीवन हमें सिखाता है कि परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि मन में साहस, आत्मविश्वास और राष्ट्रप्रेम हो तो किसी भी चुनौती का सामना किया जा सकता है। उन्होंने दिखाया कि सच्ची विजय केवल युद्धभूमि में नहीं, बल्कि अपने सिद्धांतों और मूल्यों पर अडिग रहने में होती है। उनका संघर्ष, त्याग और राष्ट्रनिष्ठा आज भी करोड़ों लोगों को प्रेरित करती है। आज जब हम महाराणा प्रताप जयंती मनाते हैं, तब यह केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि उनके आदर्शों को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लेने का भी अवसर है। वीरता, स्वाभिमान, कर्तव्यनिष्ठा और मातृभूमि के प्रति समर्पण जैसे गुण ही महाराणा प्रताप की वास्तविक विरासत हैं। आने वाली पीढ़ियों तक इस विरासत को पहुंचाना हम सभी का दायित्व है। महाराणा प्रताप भारतीय इतिहास के उस उज्ज्वल नक्षत्र हैं जिनकी आभा कभी मंद नहीं पड़ सकती। उनका जीवन संघर्षों के बीच भी अडिग रहने, अपने सिद्धांतों के लिए जीने और राष्ट्र के सम्मान के लिए सर्वस्व न्योछावर कर देने की प्रेरणा देता है। यही कारण है कि वे आज भी जन-जन के हृदय में अमर हैं और सदैव रहेंगे। (L 103 जलवंत टाउनशिप पूणा बॉम्बे मार्केट रोड, नियर नन्दालय हवेली सूरत मो।99749 40324 वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार-स्तम्भकार) ईएमएस / 16 जून 26