अभिजीत दीपके प्लांटेड हैं या फिर युवाओं के आक्रोश को शब्द देने आये हैं, मालूम नहीं, लेकिन उन्हें शांतिपूर्ण ढंग से सभा करने या जुलूस निकालने का पूरा हक है। अभिजीत दीपके पर थप्पड़ चलाने वाला खुद को राष्ट्रवादी बता रहा था। उसकी प्रोफ़ाइल जब खँगाला गया तो वह आरएसएस से जुड़ा हुआ है। आरएसएस के राष्ट्रवाद मुसलमान और पाकिस्तान से शुरू होता है और उस पर ख़त्म हो जाता है। उनके अंदर खाने में जातिवाद की खिचड़ी पकती रहती है। यही वजह है कि उन्होंने कभी जातिवाद के ख़िलाफ़ संघर्ष नहीं किया। हिन्दू एकता की बात की, लेकिन यह एकता मुस्लिमों के खिलाफ रहेगी। अंदर ब्राह्मणों की सर्वोच्चता बनी रहेगी और दलितों की स्थिति दोयम दर्जे की रहेगी। उसमें इंसान को केंद्र में रख कर कभी संघर्ष नहीं किया। कहने को वह स्वदेशी है, लेकिन अपने संगठन को मुसोलिनी के संगठन के तर्ज़ पर बनाया। बाक़ायदा हिंदू महासभा के नेता और आरएसएस के मार्ग दर्शक डॉ बी एस मुंजे ने 1931 में मुसोलिनी से मुलाक़ात की थी। यहां तक कि गोलवलकर ने अपनी पुस्तक ‘ वी आर आवर नेशनहुड ‘ में जर्मनी और इटली के फासीवादी विचारों का समर्थन किया है। गांधी जी की हत्या गोडसे ने की। उसका संबंध आरएसएस से था, लेकिन इस संगठन ने कभी स्वीकार नहीं किया। आज एक फ़र्ज़ी राष्ट्रवादी अभिजीत दीपके पर थप्पड़ मारता है, उसका संबंध भी आरएसएस से है, लेकिन आरएसएस कभी स्वीकार नहीं करेगा। यह इसलिए संभव है कि लिखित रूप से आरएसएस का कोई सदस्य नहीं है। मोहन भागवत भी शायद ही आरएसएस के लिखित रूप से सदस्य होंगे। उसका कोई सदस्यता फ़ार्म नहीं है। लाठी पैना लेकर हज़ारों की संख्या में वे जमा होते हैं, मार्च करते हैं, लेकिन वे लिखित रूप से आरएसएस के नहीं हैं, इसलिए कोई जब आपराधिक घटना करता है, उससे पीछा छुड़ाना आसान है। यह धूर्तई कोई ईमानदार संगठन नहीं कर सकता। इसकी बुनियाद में ही बेईमानी और असत्य है, तब भला वह ईमानदार कार्यकर्ता कैसे पैदा करेगा? जिसका मक़सद झूठ हो, वह राष्ट्रवादी कैसे हो सकता है? प्रधानमंत्री पीएम केयर फ़ंड को यों ही छुपाए हुए नहीं हैं। उनका मातृ संगठन अरबों का खेल करता है, लेकिन कोई खाता- बही नहीं है। वह बीजेपी की सरकार चलाता है। सरकारी पैसे से बनी जेड सुरक्षा श्रेणी का उपभोग करता है, लेकिन आरएसएस सरकार को कोई हिसाब किताब नहीं देगा, क्योंकि वह व्यक्तियों का समूह है। शांतिपूर्ण आंदोलन करने का हक सभी को है- बीजेपी, कांग्रेस, सपा, अन्य कोई संगठन या व्यक्ति- सभी को। अभिजीत दीपके के पीछे लोग षड्यंत्र थ्योरी देखनेवाले लोगों की संख्या कम नहीं है, लेकिन उसे शांतिपूर्ण आंदोलन करने से कोई नहीं रोक सकता। दुर्भाग्य यही है जिस देश में अहिंसा के पुजारी को गोली मार कर लोग गौरवान्वित होते हैं, उस देश को बहुत कुछ सीखने की ज़रूरत है। मौजूदा परिस्थिति में सड़क पर उतरने के सिवा रास्ता क्या है? कोर्ट आप जा नहीं सकते। उससे कोई उम्मीद बची नहीं। विधायिका की लूट सरेआम हो रही है। वोट लूट से सांसद लूट तक। चुनाव आयोग बिका हुआ है। सरकार की इच्छानुसार वोटर काटे और बनाए जा रहे हैं। सेना तक का दुरुपयोग हो रहा है। कार्यपालिका तो हर वक्त सत्ता के साथ रहती ही है।आर्थिक आज़ादी की गारंटी संविधान ने दी नहीं थी। इसलिए पूँजीपतियों को देश लूटने की पूरी छूट है। एक राजनीतिक आज़ादी मिली थी, उस पर भी सरकार क़ब्ज़ा कर रही है। अमेरिका के सामने कल जोड़े प्रधानमंत्री के बारे में अख़बार लिखता है- थर थर काँप रहा है अमेरिका। ऐसे अख़बार और मीडिया जिस देश में मौजूद रहे, उस देश की दुर्गति कोई नहीं रोक सकता। अगर इस दुर्गति को रोकना है तो सड़क पर उतरो या जो उतरे हुए हैं, उसका समर्थन करो। ईएमएस / 16 जून 26