राष्ट्रीय
16-Jun-2026


नई दिल्ली,(ईएमएस)। भू-राजनीतिक विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने दावा किया है कि चीन की बढ़ती सैन्य शक्ति का मुकाबला करने के लिए भारत को जापान की रक्षा सुधारों से बहुत कुछ सीखना चाहिए। जापान ने पिछले एक दशक में अपनी रक्षा व्यवस्था को भारत की तुलना में कहीं अधिक प्रभावशाली और आधुनिक किया है। भू-राजनीतिक विशेषज्ञ चेलानी ने बताया कि शांतिवादी जापान ने, जिसने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सैन्यवाद की वापसी रोकने के लिए रक्षा मंत्रालय में नौकरशाहों को प्रमुख भूमिका दी थी, अब चीन व उत्तर कोरिया से बढ़ते खतरों के मद्देनजर 2015 में बड़े रक्षा सुधार लागू कर रहा है। इन सुधारों में रक्षा मंत्रालय में नौकरशाहों और सैन्य अधिकारियों को समान दर्जा मिला, सैन्य नेतृत्व को अधिक अधिकार दिए गए, और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (एनएससी) के माध्यम से रक्षा, खुफिया व राजनीतिक निर्णयों का बेहतर समन्वय स्थापित हुआ। जापान ने समझा है कि प्रभावी नागरिक नियंत्रण विशेषज्ञता-आधारित निगरानी है, नौकरशाही का वर्चस्व नहीं। वहीं, परमाणु शक्ति संपन्न भारत अभी भी ऐसी नौकरशाही व्यवस्था पर निर्भर है जहाँ सैन्य विशेषज्ञों की भूमिका सीमित है और निर्णय प्रशासनिक अधिकारियों के हाथ में हैं। आजादी के बाद सैन्य तख्तापलट की आशंकाओं के चलते भारत ने सेना की संस्थागत भूमिका सीमित रखी। भारत में सुधारों की गति धीमी है। 2019 में सीडीएस पद बना, पर 2021 में जनरल बिपिन रावत की मृत्यु के बाद पात्रता नियमों में बदलाव कर सेवानिवृत्त अधिकारियों के लिए सीडीएस बनने का रास्ता खोल दिया गया। इससे सीडीएस पद की संस्थागत स्वतंत्रता और प्रभाव कमजोर हुआ है, जिसे कूप-प्रूफिंग कहा जाता है। हालांकि, चेलानी का तर्क है कि भारत में सेना का लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति समर्पण निर्विवाद है, इसलिए ऐसी आशंकाओं का कोई आधार नहीं। चेलानी चेतावनी देकर कहा हैं कि भविष्य में चीन के साथ युद्ध केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भूमि, समुद्र, वायु, साइबर और अंतरिक्ष सहित कई मोर्चों पर एक साथ लड़ा जाएगा। इसतरह के युद्ध में तीव्र निर्णय क्षमता, केंद्रीय कमान और सैन्य विशेषज्ञता अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। भारत को अपनी रक्षा व्यवस्था को 1940 के दशक की सोच से बाहर निकालकर आधुनिक चुनौतियों के अनुरूप ढालना होगा। रक्षा संस्थानों के आधुनिकीकरण और भविष्य के युद्धों की तैयारी के लिए भारत को जापान के अनुभवों से सीखना चाहिए, क्योंकि लोकतांत्रिक नियंत्रण और सैन्य पेशेवरता एक-दूसरे के पूरक हैं। आशीष दुबे / 16 जून 2026