राष्ट्रीय
16-Jun-2026


नई दिल्ली (ईएमएस)। अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष को समाप्त करने के लिए शांति समझौते की घोषणा के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई बहस छिड़ गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि दोनों देशों के बीच महत्वपूर्ण समझौते को अंतिम रूप दे दिया गया है और 19 जून को स्विट्जरलैंड में औपचारिक हस्ताक्षर किए जाएंगे। हालांकि समझौते की विस्तृत शर्तें अभी सार्वजनिक नहीं की गई हैं। इस बीच भारत के पूर्व सैन्य अधिकारी,पूर्व एनएसजी कमांडो और सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ लकी बिष्ट ने इस समझौते को लेकर गंभीर आशंकाएं जारी की हैं। अपने बयान में लकी बिष्ट ने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच दिखाई दे रही यह शांति स्थायी समाधान का संकेत नहीं है, बल्कि भविष्य में संभावित बड़े टकराव की भूमिका हो सकती है। उन्होंने इतिहास के उदाहरण देकर 1938 के म्यूनिख समझौते और 2003 के इराक युद्ध का उल्लेख किया। उनके अनुसार कई बार अंतरराष्ट्रीय समझौते शांति का संदेश दिखाई देते हैं, लेकिन बाद की घटनाएं अलग तस्वीर पेश करती हैं। पूर्व एनएसजी कमांडो बिष्ट ने लिखा कि मौजूदा समझौता वास्तविक शांति से अधिक संघर्षविराम जैसा प्रतीत होता है। उन्होंने इस “बंदूकों में दोबारा गोलियां भरने का री-लोडिंग टाइम” बताकर कहा कि दुनिया को आने वाले महीनों की घटनाओं पर करीबी नजर रखनी चाहिए। इस बीच पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भी संसद में दावा किया है कि अमेरिका और ईरान के बीच हुए कथित ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर समारोह 19 जून को जिनेवा में आयोजित होगा और पाकिस्तान इसकी मेजबानी में भूमिका निभाएगा। ट्रंप ने भी अपने बयान में होर्मुज जलडमरूमध्य को खुला रखने और कुछ प्रतिबंधों में राहत की संभावना का संकेत दिया है। हालांकि इस पूरे घटनाक्रम के बीच इजरायल का रुख सख्त बना हुआ है। इजरायली रक्षा मंत्री इजराइल काट्ज ने स्पष्ट किया है कि उनकी सेना दक्षिणी लेबनान सहित विभिन्न सुरक्षा क्षेत्रों से पीछे नहीं हटेगी। इसके बाद प्रस्तावित समझौते के बावजूद पश्चिम एशिया में स्थायी शांति को लेकर कई सवाल अभी भी बने हुए हैं। आशीष दुबे / 16 जून 2026