शैतान ने जो सबसे बड़ी चाल चली, वह दुनिया को यह विश्वास दिलाना था कि उसका कोई अस्तित्व नहीं है। द यूजुअल सस्पेक्ट्स। यह उद्धरण स्त्री- 2 के लिए एक उपयुक्त प्रस्तावना के रूप में कार्य करता है। एक हॉरर कॉमेडी जिसने न केवल बॉक्स ऑफिस पर अपना दबदबा बनाया बल्कि दर्शकों को सोचने के लिए बहुत कुछ दिया है। अपनी रोमांचक सतह के नीचे, स्त्री-2 फिल्म पितृसत्तात्मक उत्पीडऩ पर एक गहन टिप्पणी प्रस्तुत करते हुए महिलाओं की स्वायत्तता को कमजोर करने वाली गहरी सामाजिक संरचनाओं को चजागर करती है। फिल्म शहर के एक शांतिपूर्ण इलाके में पुरुष होती है, लेकिन जैसे ही आगे बढ़ती है जल्द ही एक डरावनी वास्तविकता को उजागर करती हुई आगे बढ़ती है। एक रहस्यमय राक्षस पूरे शहर को परेशान करता दिखता है। जो खुली सोच वाली तरक्की पसंद तन युवा महिलाओं को अपना शिकार बनाता है जो पारंपरिक लैंगिक भूमिकाओं को चुनौती देने की हिम्मत करती हैं। रक्रस दमनकारी सामाजिक ताकतों का एक प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व करता दिखता है। जो उन महिलाओं को निशाना बनाते है जो सपने देखने, स्वतंत्र रूप से सोचने और परंपरा के दायरे से बाहर कदम रखने की हिन्नत विखाती है। यह विचलित करने वाला रूपक तन तमाग विमाओं को विकसित करता चलता है कि कैरो पितृसत्तात्मक समाज महिलाओं के व्यक्तित्व और उनकी इच्छाओं की निगल जाता है। समाज उनके अस्तित्व को नियंत्रित करने के लिए किस तरह भय का वातावरण तैयार करता है। फिल्म महत्वपूर्ण किरदार राजकुमार राव को इर्द-गिर्द घुमती हैं। जो फिल्म में एक महिला दर्जी की भूमिका में है। पारंपरिक सोच वाले पितृसत्तात्मक समाज में यह पुरुशों के लिए एक अपरंपरागत पेशा है। फिल्म की भूमिकाएं परम्परागत लैंगिक भूमिकाओं को मरोड़ती दिखती है। सामाजिक रूढय़िों को चुनौती देती है और संबंधों के आधुनिक कैनवास पर नयी गतिशीलता दर्ज करती दिखाती है। श्रद्धा कपूर का किरदार एक भूत से प्यार अलग ही तरह की डायनेनिक्स है। एक ऐसी दुनियां जहां प्यार समानता और हिस्सेदापी जैसे मुददों पर खुलकर बात होती है। जहाँ पुरुष-महिला के सह-अस्लिल्या, सहयोग और समानता के नए शैतिजों का विस्तार करती हुई फिल्म आगे बढ़ती है। बश्रद्धा कपूर का किरदार परम्पराओं के पहाड़ पर प्रहार तो प्रभावी ढंग से करता है पर फिर भी महिलाओं के इंद्र में चंसी स्त्री-2 की कहानी महिला पीला को बार-बार याद दिलाती है। फिल्म कैसे पितृसत्तात्मक रौटिंग में नेविगेट करते हुए यह अनुग्रह और शक्ति को संतुलन के साथ आगे बढ़ती है। यह दर्शकों को राजग, राजीव और सचेत बनाए सबता है। जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है कहानी गायब होने की एक श्रृंखला के साथ घनी होती जाती है। गैर-अनुरूपता को हिंसक परिणामों पर यह टिप्पणी इस बात की कड़ी पाद दिलाती है कि पितृसतात्मक व्यवस्था नियंत्रण बनाए रखने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। फिल्म के पुरुष पात्री काা चित्रण जो दिखने में साधारण पुरुष से लेकर क्रूर हमलावर तक है, दर्शाता है कि पितृरसता कैसे भ्रष्ट और विचलित व्यवहार को सामान्य मानती है। समाजशास्त्रीय लेस में स्वी-2 समाज के भयावह पक्षों को परत-दर-परत उड़ती हुई आगे बढ़ती है। पुरुष पात्र पशुवत और विश्वलित व्यवहार के वाहक हैं। जो पग-पग पर वास्तविक दुनिया के हमलों, हिंसा, छेडछाड और कुरताओं में प्रकट होती है। फिल्म स्मार्टली सम्झाती है कि कैसे पितृसत्तात्मक समाज व्यवस्था इन कूर भयावहताओं को महिलाओं को नियंवित करने के तरीकों के रूप में संचित लहराती है जो स्थापित रुढय़िों को मानने से इनकार करती है। यह विलित व्यवहार महिला स्वतंत्रता पर प्रहार है उनके आमाजिक दमन का हथियार है। खासकर उन लोगों के लिए जो प्रतिबंधात्मक जैनिक भूमिकाओं से मुक्त हो जाते हैं। फिल्म को अतिरिक्त सम्मान इस बात के लिए भी मिलना चाहिए कि केवल समस्या को उठाने तक सीमित नहीं दिखती है। जैसे-जैसे कथानक आगे बढ़ता है. फिल्म की रील उस रियल सामाजिक व्यवस्था का चित्रण पेश करती है जिसमें महिलाएं रिस-रिस कर रिक्त होने को अभिशप्त है। फिल्म का चरमोत्कर्ष अर्धनारीश्वर की अवधारणा को आयाजित करता है। जो स्त्री-पुरुष ऊर्जा के अजय स्रोत का एक मूल केन्द्रीय आख्यान है। जो इस सामाजिक वैचारिकी में रूपक के रूप में प्रयुक्त होता है कि सच्चा सामंजस्य और समानता पुरुषों महिलाओं के बीच परस्पर सम्मान और रागानता में निहित है। लैंगिक भूमिकाए कठोर होने के बजाय गतिशील होनी साहिए। प्रत्येक व्यक्ति के भीतर पुरुषत्व और स्त्रीला दोनों के अक्यव है। सम्यक सामाजिक दृष्टि पितृसतात्मक परंपराओं को चुनौती देते हुए एक ऐसे समाज की आकांक्षा करती है जहां लैंगिक समानताएं सम्मानपुर्वक प्रश्रय पाती हो। स्त्री-2 न सिर्फ पितृसत्तात्मक हिंसा की आलोचना करती है बल्कि सामाजिक पाखंडों पर प्रहार करती है। शहर जो बाहरी रूप से एक शांतिपूर्ण और स्वागत करने वाला समुदाय विखता है। मूलत वहां पूर्वाग्रहों और कतरनाक रुढय़िों का केरा है। पूरी फिल्म में छिडक़ा हुआ हास्य और व्यंग्य इन पाखंडी समाज व्यवस्था का पोस्टमार्टम करता है। कई किरदार हमें याद दिलाते चलते है, आगे बढ़ते है कि पितृसता का जहरीला अभियान कितना भी प्राचीन क्यों न हो. फिर भी उसे चुनौती दी जा सकती है। हास्य, हॉरर और सामाजिक आहवाहन को अंतर्गुम्फित कर फिल्म सत्कृष्ट मानकों के साथ नए सामाजिक मूल्यों को मान्याता की पैरवी की प्रस्तुती है। अमर कौशिक का निर्देशन, नीरेन नह की पटकथा एक नयी स्त्री के अवतार को स्त्री-2 की कहानी में प्रस्तुत करते है, जहां न केवल मनोरंजन है बल्कि बौद्धिक बहसों की बेहद प्रेरणाएं प्रस्तुत है। फिल्म का हर दृश्य दर्शकों को दिखाता है कि कैसे समाज में छिपे रहास अदृश्य अभियानों की अगुवाई कर रहे है। लैंगिक वर्जनाओं के कठोर मानदंड कैसे पितृसत्तात्मक उत्पीडऩ करने वाले राक्षस के लिए राह बनाते है। साथ ही स्त्री-2 पूरे आम्वासन के साथ एक अहिंसक समाज व्यवस्था की वकालत करती है कि इन राक्षसों को सहानुभूति, समानता और आपसी सम्मान के माध्यम से हराया जा सकता है। अंत में फिल्म एक हॉरर-कॉमेडी से आगे बढक़र पितृसत्ता की बेडय़िों से मुक्ति का आहवाहन कर महिलाओं की वास्तविक दुनिया के संघर्षों का एक मार्गिक प्रतिबिंब पेश करती है। उल्लेखनीय यह है कि फिल्ग बराबर बदलावों की मांग करती है। पुरुषों और महिलाओं दोनों को एक ऐसे भविष्य को अपनाने का आग्रह करती है जहीं लैंगिक समानता कोई लक्ष्य मात्र नहीं है बल्कि एक आवश्यक सामाजिक वास्तविकता है। जब तक हम दमनकारी सामाजिक व्यवस्था के वंश को सहते रहेंगे यानि इसमें अकेत भागीदार बने रहेंगे, तब तक समाज में राक्षस राज करते रहेंगे। फिल्म सामाजिक बदलावों की पगबंत्रियों की पहचान कराते हुए पूरी होती है। ईएमएस / 23 सितम्बर 24