राज्य
05-Aug-2025
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मुंबई, (ईएमएस)। बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक वैवाहिक विवाद के संबंध में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा, तलाक की कार्यवाही के दौरान पत्नी द्वारा अपने अलग रह रहे पति पर नपुंसकता का आरोप लगाना मानहानि नहीं है। हाईकोर्ट ने अलग रह रही पत्नी और उसके परिवार के खिलाफ याचिकाकर्ता की मानहानि याचिका को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। न्यायमूर्ति श्रीराम मोडक ने फैसला सुनाते हुए यह बात कही। हिंदू विवाह अधिनियम के तहत नपुंसकता के आरोप बेहद प्रासंगिक हैं। अदालत ने कहा है कि ऐसे आरोप तलाक का कानूनी आधार हो सकते हैं। अदालत ने यह भी कहा है कि पत्नी को अपने हितों के समर्थन में ऐसे आरोप लगाने और यह साबित करने का अधिकार है कि शादी के बाद उसे क्रूरता सहनी पड़ी। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि तलाक और भरण-पोषण के आवेदनों और आपराधिक शिकायतों में पत्नी द्वारा किए गए दावे सार्वजनिक दस्तावेजों का हिस्सा हैं और इससे उसकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची है। हालाँकि, अदालत ने याचिकाकर्ता के खिलाफ फैसला सुनाया। - क्या कहा अदालत ने ? अदालत ने यह भी कहा कि तलाक के लिए नपुंसकता के आरोप लगाना गलत नहीं है। वैवाहिक संबंधों में पति-पत्नी के बीच विवाद होने पर, पत्नी द्वारा अपने हितों के समर्थन में ऐसे आरोप लगाना उचित है। न्यायालय ने इस बात पर भी ज़ोर दिया है कि इन आरोपों को मानहानिकारक नहीं माना जा सकता। - क्या है मामला ? अलग रह रही पत्नी ने अपने पति और उसके माता-पिता के खिलाफ दायर आपराधिक शिकायत में, तलाक और भरण-पोषण के आवेदनों के साथ, आरोप लगाया था कि वह नपुंसक है। चूँकि ये सभी दस्तावेज़ सार्वजनिक हैं, इसलिए याचिकाकर्ता पति ने दावा किया था कि इस तरह के आरोप लगाना मानहानि के समान है। प्रतिवादी महिला के साथ, उसके पिता और भाई ने निचली अदालत के आदेश को रद्द करने के लिए हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। सत्र न्यायालय ने मजिस्ट्रेट को पति द्वारा लगाए गए मानहानिकारक आरोपों की जाँच करने का आदेश दिया है। हालाँकि, महिला ने हाई कोर्ट के समक्ष कहा कि याचिकाकर्ता पति की नपुंसकता ही विवाह विच्छेद और तलाक का कारण है। हाई कोर्ट ने यह निर्णय दर्ज करके पत्नी को राहत दी है कि जिस कारण से तलाक दिया जा रहा है, उसका उल्लेख करना मानहानिकारक नहीं हो सकता। न्यायालय द्वारा दिया गया यह निर्णय महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस प्रकार का मानहानि प्रतिदावा कई मामलों में किया जाता है। माना जा रहा है कि इस फैसले से अब ऐसे मामलों में प्रतिदावों की संख्या में कमी आएगी। स्वेता/संतोष झा- ०५ अगस्त/२०२५/ईएमएस