राज्य
08-Aug-2025
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- केंद्रीय भूजल बोर्ड की रिपोट्र्स में भूजल दोहन की स्थिति चिंताजनक - मप्र के 60 प्रतिशत भूजल खत्म भोपाल (ईएमएस)। मप्र मानसूनी बारिश से नदियां और बांध लबालब हैं। कई जिलों में बाढ़ आ चुकी है। इन सबके बावजुद प्रदेश में भूजल तेजी से खत्म हो रहा है। दरसल केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय के तहत केंद्रीय भूजल बोर्ड की रिपोट्र्स के अनुसार मप्र में भूजल दोहन की स्थिति चिंताजनक है। आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में 2023 तक 58.75 प्रतिशत भूजल का दोहन हो चुका था। रिपोट्र्स के अनुसार, इंदौर और भोपाल में भूजल स्तर क्रिटिकल स्थिति में है। केंद्रीय भूजल बोर्ड के अनुसार मप्र में 90 प्रतिशत भूजल का उपयोग कृषि के लिए, 9 प्रतिशत घरेलू उपयोग और 1 प्रतिशत औद्योगिक उपयोग के लिए होता है। अनियंत्रित बोरवेल, बढ़ती आबादी, और जल संचय की कमी को भूजल स्तर में गिरावट का प्रमुख कारण बताया गया है। जल शक्ति मंत्रालय भी अनियंत्रित दोहन को भूजल संकट का मुख्य कारण मानता है। मप्र में भूजल स्तर में आ रही गिरावट पर पूर्व सीएम कमलनाथ ने सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा राज्यसभा में पेश किए गए आंकड़ों के आधार पर कहा कि मप्र ने अपने भूजल का 60 प्रतिशत दोहन कर लिया है। पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि भूजल के मामले में मप्र खतरनाक स्थिति की तरफ बढ़ रहा है और समय रहते इस तरफ ध्यान नहीं दिया गया तो हम अपनी आने वाली पीढिय़ों को गंभीर जल संकट में धकेल देंगे। कमलनाथ ने कहा कि पानी का अनियंत्रित दोहन, निरंतर खोदे जा रहे बोरवेल, बढ़ती आबादी और जल संचय की कमी भूजल स्तर में गिरावट के बड़े कारण हैं। इंदौर और रतलाम जिले पानी के अत्यधिक दोहन की श्रेणी में पहुंच चुके हैं। प्रदेश का पश्चिमी हिस्सा विशेष रूप से भूजल दोहन के मामले में अलार्मिंग स्तर पर है। प्रदेश भर में 317 असेसमेंट यूनिट जल संसाधन विभाग और केंद्रीय भूजल बोर्ड ने प्रदेश की 317 असेसमेंट यूनिट पर यह अध्ययन किया है। इन्हें अलग-अलग श्रेणियों में बांटा गया है। प्रदेश में अब भी 71 फीसदी यूनिट सुरक्षित श्रेणी में है। प्रदेश में भूजल दोहन की कुल औसत दर 58.40 प्रतिशत है। भोपाल में भूजल तेजी से खत्म हो रहा है। भोपाल के तीनों ब्लॉक सेमीक्रिटिकल कंडीशन में पहुंच गए हैं। जल संसाधन विभाग की मप्र के डायनामिक भूजल संसाधन रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है। जिले की कुल भौगोलिक सीमा 2,77,237 हेक्टेयर है। इसमें से 2,64,800 हेक्टेयर यानी 96 प्रतिशत में भूजल रिचार्ज की जरूरत जताई गई है। जबकि शेष 12,437 हेक्टेयर क्षेत्र पहाड़ी है। जिले में वार्षिक निकासी योग्य भूजल संसाधन 37,553 हेक्टेयर मीटर है, जिसमें से 29,776 हेक्टेयर मीटर भूजल पहले से ही उपयोग में लाया जा रहा है। इसका मतलब है कि जिले में भूजल दोहन की औसत दर 79.29 फीसदी पहुंच चुकी है, जो कि खतरे की घंटी है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर तत्काल जल संरक्षण और पुनर्भरण के उपाय नहीं अपनाए गए, तो आने वाले वर्षों में स्थिति बिगड़ सकती है। इस संकट के लिए असंतुलित जल उपयोग जिम्मेदार कमलनाथ ने कहा कि हमारे राज्य ने अब तक अपने भूजल संसाधनों का साठ प्रतिशत दोहन कर लिया है और उन्होंने यह भी बताया कि भोपाल, इंदौर, रतलाम जैसे शहर ‘क्रिटिकल’ या ‘ओवर-एक्सप्लॉइटेड’ श्रेणियों में आ चुके हैं। उन्होंने इस संकट के लिए असंतुलित जल उपयोग को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि हम जितना पानी जमीन से निकाल रहे हैं, उतना पानी जमीन को वापस नहीं दे रहे। इस स्थिति से निपटने के लिए उन्होंने पारंपरिक जल स्रोतों जैसे कुओं और तालाबों को पुनर्जनन करने और आधुनिक भूजल रिचार्ज तकनीकों को बड़े पैमाने पर लागू करने की वकालत की। कमलनाथ ने चेतावनी दी कि यदि समय रहते इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली पीढिय़ों को गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ सकता है। विनोद / 08 अगस्त 25