उत्तरकाशी,(ईएमएस)। उत्तराखंड प्राकृतिक आपदाओं का केंद्र बनता जा रहा है। यहां की पहाड़ियां दरक रही हैं, नदियां उफन रहीं हैं और मौसम के अचानक बदलते मिजाज ने हालात को और भयावह बना दिया है। उत्तरकाशी के धराली क्षेत्र में हाल ही में बादल फटने से मची तबाही ने सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हिमालय की गोद में बसी यह भूमि अब सुरक्षित है? वैज्ञानिकों की मानें तो उत्तराखंड के ज्यादातर ऊंचाई वाले इलाके अब डिजास्टर प्रोन एरिया बन गए हैं, जहां कभी भी आपदा आ सकती है। कई संस्थाओं की रिपोर्ट्स इस खतरे को बार-बार रेखांकित कर चुकी हैं। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक उत्तरकाशी, चमोली, पिथौरागढ़, धारचूला, रुद्रप्रयाग, टिहरी, पौड़ी और नैनीताल जैसे जिले अब लगातार प्राकृतिक आपदाओं की चपेट में हैं। उत्तरकाशी में भूस्खलन, बादल फटना और जमीन दरकने की घटनाएं बढ़ी हैं। धराली, गंगोत्री और यमुनोत्री जैसे क्षेत्रों में ग्लेशियर के पिघलने की चिंता बढ़ गई है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यहां ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड का खतरा मंडरा रहा है, क्योंकि कई झीलें अब अनियंत्रित रूप से बन और फूट रही हैं। जोशीमठ का उदाहरण हमारे सामने है, जहां जमीन के अंदर हलचल इतनी बढ़ गई है कि घरों में दरारें पड़ने लगी हैं और पूरा शहर भू-धंसाव की चपेट में आ गया है। फरवरी 2021 में चमोली के रैणी गांव में ग्लेशियर टूटने से हुई तबाही ने सैकड़ों लोगों की जान ली और बड़े प्रोजेक्ट तबाह हो गए। पिथौरागढ़ और धारचूला, जो भारत-नेपाल-चीन सीमा से सटे क्षेत्र हैं, अब हर मानसून में त्रासदी की मार झेल रहे हैं। भूस्खलन, सड़कों का कटाव और बादल फटना यहां आम बात हो गई हैं, जिससे कनेक्टिविटी और सुरक्षा दोनों प्रभावित हो रही हैं। वहीं रुद्रप्रयाग जिले में मंदाकिनी और अलकनंदा नदियों का संगम क्षेत्र अत्यंत संवेदनशील बना हुआ है, जहां हर साल बाढ़ और भूस्खलन से गांव उजड़ जाते हैं। 2013 की केदारनाथ त्रासदी इसका सबसे भयावह उदाहरण है। टिहरी और पौड़ी जिलों में सुरंगें, सड़कें और बिजली परियोजनाओं ने भू-संरचना को नुकसान पहुंचाया है, जिससे गांवों में दरारें और जमीन खिसकने की घटनाएं बढ़ रही हैं। नैनीताल व कुमाऊं क्षेत्र भी अब भूस्खलन व जल रिसाव की वजह से संकट का सामना कर रहे हैं। वैज्ञानिक चेतावनी दे चुके हैं कि उत्तराखंड भारत के सबसे संवेदनशील भूकंपीय जोन-5 में है और यहां थोड़ी सी भी बारिश या हल्की भूकंपीय हलचल बड़ी आपदा का कारण बन सकती है। यदि इन आपदाओं को रोकने के लिए समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो प्रकृति का यह स्वर्ग भविष्य में मानव जनित त्रासदियों की भूमि बन सकता है। सिराज/ईएमएस 09 अगस्त 2025