राष्ट्रीय
09-Aug-2025
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नई दिल्ली (ईएमएस)। भारत की एक प्राचीन और प्रभावशाली चिकित्सा पद्धति है सिद्ध चिकित्सा, जिसकी उत्पत्ति तमिलनाडु में हुई मानी जाती है। आयुष मंत्रालय के अनुसार, सिद्ध चिकित्सा त्रिदोषों वात, पित्त और कफ के संतुलन के माध्यम से पाचन तंत्र को मजबूत करती है और शरीर को भीतर से स्वस्थ बनाती है। ‘सिद्ध’ शब्द तमिल के ‘सिद्धि’ से लिया गया है, जिसका अर्थ है पूर्णता या उपलब्धि, जो इस चिकित्सा प्रणाली के व्यापक और गहन दृष्टिकोण को दर्शाता है। सिद्ध प्रणाली की नींव अठारह सिद्धों द्वारा रखी गई थी, जिनमें अगस्त्यर को प्रमुख माना जाता है। परंपरा के अनुसार, यह ज्ञान भगवान शिव से पार्वती, फिर नंदीदेवर और अंततः सिद्धों तक मौखिक परंपरा से पहुँचा और बाद में ताड़ के पत्तों पर लिखित पांडुलिपियों में संरक्षित किया गया। यह चिकित्सा पद्धति रोगी की उम्र, जीवनशैली, पर्यावरण और दोषों के असंतुलन के अनुसार व्यक्तिगत उपचार प्रदान करती है। तमिलनाडु, केरल और श्रीलंका जैसे तमिल भाषी क्षेत्रों में यह पद्धति आज भी व्यापक रूप से प्रचलित है। सिद्ध चिकित्सा में विशेष रूप से ‘कायकार्पम’ और ‘मुप्पु’ का उल्लेखनीय महत्व है। कायकार्पम में जीवनशैली, औषधीय जड़ी-बूटियों और खनिजों का संयोजन होता है, जो अंगों के पुनरुद्धार और शरीर के डिटॉक्स में सहायक होता है। मुप्पु, एक विशेष प्रकार का नमक, शरीर के संतुलन को बनाए रखने में भूमिका निभाता है। सिद्ध चिकित्सा अपच, अल्सर, भूख की कमी, सूजन जैसी समस्याओं से राहत देती है और कोविड-19 जैसे संक्रमणों में लक्षणों को कम करने में भी उपयोगी सिद्ध हुई है। इस प्रणाली में हर्बल औषधियों के साथ योग, ध्यान, प्राणायाम और आहार संबंधी नियमों को अपनाया जाता है। उपचार शुरू करने से पहले व्यक्ति की शारीरिक स्थिति और दोषों की प्रकृति का गहन विश्लेषण किया जाता है। भारत सरकार ने इसके विकास के लिए तमिलनाडु और केरल में शैक्षणिक संस्थान स्थापित किए हैं। सुदामा/ईएमएस 09 अगस्त 2025