लेख
28-Nov-2025
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भारतीय राजनीति में चुनाव सुधार, मतदाता सूची की शुद्धता और पारदर्शी प्रक्रिया हमेशा से चर्चा का विषय रहे हैं। हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा लागू की गई एसआईआर प्रक्रिया को लेकर कई विपक्षी दलों ने आपत्ति जताई है, जिनमें सबसे मुखर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी रही हैं।उन्होंने न केवल एसआईआर को भेदभावपूर्ण और निष्पक्ष न होने वाला तंत्र” बताया, बल्कि यह भी आरोप लगाया कि बीजेपी ही चुनाव आयोग बन गई है। साथ ही उन्होंने चेतावनी दी।मुझे चुनौती दी तो नींव हिला दूंगी। एसआईआर पर यह राजनीतिक घमासान केवल सुधार या व्यवस्था तक सीमित नहीं है। इसके पीछे वोट बैंक, ध्रुवीकरण, संघ-राज्य संबंध और आने वाले चुनावों की रणनीति छिपी है। इसी के समानांतर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल भी रैलियों के जरिए केंद्र सरकार का विरोध कर रहे हैं।ममता बनर्जी एसआईआर का विरोध क्यों कर रही हैं? और विपक्ष की राजनीति का मकसद क्या है?बीजेपी और विपक्ष के बीच बढ़ती खींचतान का प्रभाव क्या पड़ेगा? एसआईआर क्या है? और विवाद कहां से शुरू होता है?एसआईआर एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें फर्जी वोटरों की पहचान डुप्लीकेट वोटरों को हटानामृत या स्थानांतरित मतदाताओं का रिकॉर्ड अपडेट करनाऔरसीमा क्षेत्रों में सत्यापन जैसे कार्य शामिल हैं।सरकार का दावा है कि इससे मतदाता सूची का शुद्धिकरण होगा,मतदान अधिक पारदर्शी होगा,और चुनावी धोखाधड़ी कम होगी। लेकिन विपक्ष का आरोप है कि यह सिर्फ विपक्षी राज्यों को निशाना बनाने का तरीका है। इससे गरीब, प्रवासी, अल्पसंख्यक और सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वालों के नाम बड़ी संख्या में हटाए जा सकते हैं। और बीजेपी इसे राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल कर सकती है।इसी बिंदु पर राजनीति सबसे ज्यादा गर्म हो गई है।ममता बनर्जी का विरोध राजनीतिक और सामाजिक पहलू है।ममता का आरोप है कि बीजेपी चुनाव आयोग बन गई है। ममता बनर्जी का मानना है किएसआईआर प्रक्रिया केंद्र के दबाव में संचालित होगी।चुनाव आयोग स्वतंत्र रूप से निर्णय नहीं ले पाएगा।और बीजेपी अपनी रणनीति के अनुसार मतदाता सूची को प्रभावित कर सकती है। उनका यह बयान कि बीजेपी चुनाव आयोग बन गई है। सीधा आरोप है कि चुनाव सुधारों की आड़ में बीजेपी अपने राजनीतिक फायदे के लिए व्यवस्था को मोड़ रही है। लेकिन यह उनकी सोच है।ममता बंग्लादेशी मुद्दा और वोट बैंक राजनीति कर रही है। बंगाल की राजनीति में “घुसपैठ” और “बांग्लादेशी वोटरों” का मुद्दा हमेशा संवेदनशील रहा है। बीजेपी इसे “राष्ट्रीय सुरक्षा” और “घुसपैठ रोकने” का विषय मानती है, जबकि ममता बनर्जी इसेविपक्ष द्वारा फैलाया गया “प्रोपेगेंडा” मानती है।और अल्पसंख्यक व सीमावर्ती समुदायों को डराने की रणनीति बताती हैं। बीजेपी बार–बार ममता पर बांग्लादेशियों को संरक्षण देने का आरोप लगाती है। इसलिए एसआईआर जैसी प्रक्रिया सीधे ममता के पारंपरिक वोट बैंक को प्रभावित कर सकती है। यही कारण है कि वह इसे राजनीतिक हमले के तौर पर देखती हैं।ममता का बयान “मुझे चुनौती दी तो नींव हिला दूंगी”यह बयान बताता है कि ममता एसआईआर के खिलाफ बड़ा आंदोलन खड़ा करने की तैयारी में हैं।उनकी राजनीतिक शैली सदैव आक्रामक और जन-आधारित रही है। वे यह संदेश देना चाहती हैं कि केंद्र सरकारी प्रक्रियाएँ राज्य पर थोपे या तुष्टीकरण के नाम पर उन्हें निशाना बनाएतो वे पीछे हटने वाली नहीं हैं। कांग्रेस का साथ और विपक्ष का व्यापक विरोध कांग्रेस ने भी एसआईआर प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं।उनका विरोध तीन प्रमुख कारणों से है। राजनीतिक धरातल पर गठबंधन की मजबूरीहै औरविपक्ष चाहता है किसभी विरोधी दल एक मंच पर आएं।बीजेपी की अधिनायकवादी राजनीति को चुनौती दी जाएऔर एसआईआर जैसे मुद्दों को लोकतांत्रिक अधिकारों से जोड़कर जनता में संदेश दिया जाए।और निकाली जाने वाली रैलियाँ इसी रणनीति का हिस्सा हैं।राज्यों में चुनावी समीकरण का असरआने वाले चुनावों में पश्चिम बंगाल,केरल, तमिलनाडु,असम,और कुछ केंद्रशासित प्रदेशों में एसआईआर का सीधा असर पड़ सकता है।विपक्ष को डर है कि अगर मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर नाम काटे गए,तो उसका नुकसान गैर-बीजेपी दलों को ही ज्यादा होगा। विपक्ष के लिए यह ‘राजनीतिक नैरेटिव’ का हथियार मुद्दा सिर्फ एसआईआर का नहीं है।विपक्ष इसे ऐसे प्रस्तुत कर रहा है कि यह जनता के अधिकारों पर हमला है।यह लोकतंत्र को कमजोर करने का प्रयास है।और केंद्र सरकार राज्यों की स्वायत्तता खत्म करना चाहती है।इससे विपक्ष को राजनीतिक जमीन मिलती है। केंद्र बनाम राज्य: टकराव और सत्ता संतुलन एसआईआर विवाद को केवल चुनावी प्रक्रिया के संदर्भ में देखने से इसकी गहराई समझ में नहीं आती।असल टकराव है केन्द्र की शक्तियों बनाम राज्यों की स्वायत्तताऔर ममता बनर्जी को लगता है किकेंद्र अपने निर्णय राज्यों पर थोप रहा है। और यह संघीय ढांचे की मूल भावना के खिलाफ है। राजनीतिक ध्रुवीकरण का बढ़नाऔरयह मुद्दा आने वाले महीनों में हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण राष्ट्रीय सुरक्षा बनाम अल्पसंख्यक अधिकारजैसे मुद्दे पर हावी होगा।केंद्र बनाम राज्य जैसे विभाजक विमर्शों को और तीखा करेगा। एसआईआर का प्रशासनिक बोझ बढ़ रहा है।ममता का कहना है कि राज्य में पहले से ही कई परियोजनाएँ चल रही हैं, और एसआईआर का अचानक दबाव वास्तविक कार्य को प्रभावित करेगा।वे तैयार हैं कि 2–3 वर्षों में यह प्रक्रिया धीरे-धीरे लागू हो, लेकिन तत्काल आदेश का विरोध कर रही है भाजपा इसको ज़रूरी मानती है।बीजेपी और केंद्र सरकार एसआईआर को चुनाव शुद्धिकरण की सबसे बड़ी पहल बता रहे हैं।उनके अनुसार फर्जी वोटर हटेंगे।खासकर सीमावर्ती राज्यों मेंऔर राजनीतिक लाभ के लिए “घुसपैठ” का उपयोग करने वाली पार्टियों पर रोक लगेगी। पारदर्शिता बढ़ेगी।मतदाता सूची की विश्वसनीयता बढ़ेगी। और चुनावी प्रक्रिया अधिक निष्पक्ष बनेगी।विपक्ष इसलिए विरोध कर रहा क्योंकि उनका वोट बैंक प्रभावित होगा। बीजेपी का तर्क है कि जो पार्टियाँ फर्जी वोटरों पर निर्भर हैं, वही इसका विरोध कर रही हैं। क्या एसआईआर वास्तव में निष्पक्ष है या राजनीतिक उपकरण? यह बहुत बड़ा और जटिल सवाल है।तकनीकी पहलू अगर एसआईआर पारदर्शी, निष्पक्ष और मानक प्रक्रिया के साथ लागू हो तो इससे चुनावी सुधार मजबूत होंगे।फर्जी वोटरों को हटाना किसी भी लोकतंत्र की मजबूरी है।लेकिन भारत जैसे विविध और राजनीतिक रूप से संवेदनशील देश में किसी भी प्रक्रिया का असरवोट बैंक चुनाव और ध्रुवीकरण पर सीधे पड़ता है।इसलिए एसआईआर को पूरी तरह निष्पक्ष या राजनीतिक कहना मुश्किल है। सच्चाई बीच में है कि सिस्टम आवश्यक है, लेकिन पारदर्शिता और राज्यों की सहमति के बिना इसे लागू करना विवाद पैदा करेगा।आगे की राजनीति का क्या होगा असर?बंगाल में राजनीति और गरमाएगी।ममता बनर्जी इस मुद्दे को बंगाल की स्वायत्तता अल्पसंख्यकों के अधिकार और केंद्र के दमनके रूप में पेश करेंगी।बीजेपी इसे घुसपैठ रोकने और फर्जी वोटरों की सफाई के रूप में प्रचारित करेगी। राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष को मुद्दा मिल गया है। सीडब्लूसी और आईएनडीआईए गठबंधन के लिए यह मुद्दा अनुपयोगी ही होगा। केंद्र सरकार पर हमला करने, जनता को मो‎बिलाईज करने और चुनावी माहौल तैयार करने का हथियार है।चुनाव आयोग की साख पर सवाल खड़ा करना गलत है।सबसे नुकसान चुनाव आयोग को हो रहा है। सत्ता–विपक्ष की खींचतान में आयोग की निष्पक्षता सवालों के घेरे में आ रही है।कानूनी लड़ाइयाँ बढ़ सकती हैंऔरराज्य सरकारें सुप्रीम कोर्ट जा सकती हैं।यह मामला संवैधानिक संघर्ष का रूप ले सकता है। एसआईआर का विवाद राजनीति से ज्यादा सत्ता संघर्ष है।एसआईआर को लेकर ममता बनर्जी और केंद्र के बीच संघर्ष सिर्फ प्रक्रिया का विवाद नहीं है। यह चार स्तरों पर लड़ाई है। वोट बैंक का संघर्ष, केंद्र-राज्य शक्तियों की खींचतान चुनावी ध्रुवीकरण और राजनीतिक खेल,विपक्ष का एकजुट होकर केंद्र के खिलाफ नैरेटिव तैयार करनाआदि। ममता बनर्जी का एसआईआर विरोध उनके पारंपरिक वोट बैंक की सुरक्षा,बंगाल की राजनीतिक स्वायत्तताऔर केंद्र की नीतियों के खिलाफ उनकी संप्रभुता की लड़ाईका हिस्सा है।वहीं कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल लोकतांत्रिक अधिकारों और चुनावी पारदर्शिताके नाम पर केंद्र सरकार पर हमला तेज कर रहे हैं।आने वाले समय में एसआईआर सिर्फ चुनावी प्रक्रिया का मुद्दा नहीं,बल्कि राष्ट्रीय राजनीति का सबसे बड़ा विमर्श बन सकता है। ईएमएस / 28 नवम्बर 2025