लेख
28-Nov-2025
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भारत में आवास-किराये का बाजार पिछले दो दशकों में तीव्र रूप से बदल चुका हैअधिक जनसंख्या-शिफ्ट,अस्थायी रोजगार, शहरों में युवा-प्रवासन औररेंटल एन्टरप्रेन्योरशिप के कारण पारंपरिक अनौपचारिक समझौतों (11-महीने के लिखित /अनलिखित समझौते आदि) की सीमाएँ उजागर हुईं। इन चुनौतियों अनियमित रजिस्ट्रेशन सुरक्षा-जमानत पर अनिर्धारित बोझ,अचानक निष्कासन, और डिस्प्यूट्स को रोके रखने की धीमी न्यायिक प्रक्रियाओं, को हल करने के लिए 2025 में केंद्र/नीतिगत निकायों ने एक नया समेकित रेंट-रूल/रजिस्ट्रेशन ढाँचा प्रस्तावित/प्रचारित किया जिसे सामान्यत, न्यू रेंट एग्रीमेंट रूल्स 2025 के रूप में जाना जा रहा है। यह नया फ्रेमवर्क मूल रूप से 2021 के मॉडल टेंनैंसी एक्ट के सिद्धांतों पर आधारित है,जिसका उद्देश्य किरायेदार और मकान-मालिक दोनों के हितों का संतुलन और शीघ्र विवाद निपटान सुनिश्चित करना था। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि भारत में न्यू रेंट एग्रीमेंट 2025 का परिचय उसी समय परिपक्वता की दिशा में एक बड़े सुधार के रूप में देखा जा सकता है, क्योंकि देश में किराए पर रहने वालों (टेनेंट्स) और किराया- देनदार मकान मालिकों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, जिससे संपत्ति- बाजार में पारदर्शिता, विवाद और कानूनी जटिलताओं की समस्या भी बढ़ती जा रही थी। इस पृष्ठभूमि में, सरकार ने इस नए ढांचे को लागू किया है, जो मुख्य रूप से मॉडल टेनेंसी एक्ट (एमटीए) और हालिया बजट प्रावधानों पर आधारित है, ताकि रेंटिंग सिस्टम को एक तय,सुरक्षित और सुव्यवस्थित प्रणाली में बदला जा सके। साथियों बात अगर हम नए रेंट एग्रीमेंट रूल्स 2025 क़े कानूनी उद्गम और आधार (मॉडल टेंनैंसी एक्ट का स्थान और महत्ता) इसको समझने की करें तो,मॉडल टेंनैंसी एक्ट 2021 को केंद्र- सरकार की ओर से एक मॉडल अधिनियम के रूप में जारी किया गया था ताकि राज्यों को किराये संबंधी सुव्यवस्थित कानून अपनाने में मार्गदर्शन मिले। इसका उद्देश्य सुस्पष्ट रजिस्ट्रेशन, किराए की वृद्धि के नियम,सुरक्षा जमा- सीमाएँ, और रेण्ट अथॉरिटी/ट्रिब्यूनल जैसे फास्ट-ट्रैक मैकेनिज़्म को स्थापित करना था। 2025 के नए रूल्स ने इन सिद्धांतों को डिजिटल रजिस्ट्रेशन ई-स्टैम्पिंग,और डिफ़ाइंड पेनल्टीज़ /प्रोसीजर के साथ व्यावहारिक रूप दिया है यानी एमटीए पर आधारित संरचना को व्यवहारिक रूप में लागू करने का प्रयास। साथियों बात अगर हम नए रेंट एग्रीमेंट रूल्स 2025 क़ेप्रमुख प्रावधानों को समझने की करें तो,सबसे पहला और बुनियादी परिवर्तन रेंट एग्रीमेंट का पंजीकरण है। पुराने असमर्थित या अनौपचारिक एग्रीमेंट (जैसे केवल लिखित, हस्तलिखित या मौखिक) की स्वीकार्यता को सीमित करते हुए,नए नियमों के तहत हर किराया अनुबंध को दो महीने के भीतर पंजीकृत करना अनिवार्य है। यदि यह समय सीमा पूरी न हो, तो जुर्माना 5,000 रूपए तक लगाया जा सकता है। यह रजिस्ट्रेशन या तो राज्य की ऑनलाइन प्रॉपर्टी रजिस्ट्रेशन वेबसाइट के माध्यम से या नजदीकी रजिस्टार कार्यालय में किया जा सकता है। इसके साथ ही,डिजिटल ई- स्टांपिंग अनिवार्य कर दी गई है,1 जुलाई 2025 से सभी नए रेंट एग्रीमेंट्स को अधिकृत डिजिटल प्लेटफार्मों पर ई-स्टाम्प करना होगा; यदि ऐसा नहीं किया गया, तो भी जुर्माना 5,000 रूपए तक हो सकता है। इससे पहले के पारंपरिक स्टैंप पेपर पर निर्भर दस्तावेजों की असुरक्षा और जाली दस्तावेजों की समस्या को काफी कम करने की कोशिश की गई है।दूसरा, किरायेदारों की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए सिक्योरिटी डिपॉज़िट (एडवांस किराया) की सीमा तय की गई है। रिहायशी प्रॉपर्टी के मामले में, अधिकतम दो महीने का एडवांस किराया (सिक्योरिटी) लिया जा सकता है। यह महत्वपूर्ण राहत है क्योंकि पुरानी प्रैक्टिस में कई स्थानों पर मकान मालिक छह महीने या उससे अधिक का एडवांस मांगते थे, जिससे किरायेदारों पर वित्तीय बोझ बहुत बढ़ जाता था। वहीं, कमर्शियल प्रॉपर्टियों के लिए एडवांस की अधिकतम सीमा छह महीने निर्धारित की गई है। इस सीमा निर्धारण से किराएदारों को शुरू में अधिक नकदी जमा करना कम करना होगा, जिससे उनकी आर्थिक योजना बेहतर हो सकेगी और नए किरायेदारी झंझटों में उनकी पहुँच आसान हो जाएगी।तीसरा,मकान मालिकों (लैंडलॉर्ड) और किरायेदारों के बीच विवादों और मनमानी से उत्पन्न समस्याओं को नियंत्रित औरन्यायसंगत बनाने के लिए नए कानूनी संरक्षण और प्रक्रिया निर्धारित की गई है। सबसे पहले, मकान मालिक अब बिना पूर्व सूचना (नोटिस) अचानक किरायेदार को घर खाली करने का आदेश नहीं दे सकता, नए नियमों के अंतर्गत उचित नोटिस पीरियड देना अनिवार्य होगा।यह नियम टेनेंट्स को अचानक बेदखली या मनमानी निकासी के जोखिम से बचाता है और उन्हें कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त, किराया बढ़ोतरी (रेंट हाइक) को नियंत्रित करने के लिए मकान मालिक को पूर्व सूचना देना होगा और वृद्धि किसी भी समय मनमानी रूप से नहीं की जा सकेगी। समय पर विवादों के समाधान के लिए स्पेशल रेंट कोर्ट्स और ट्रिब्यूनल्स की स्थापना की गई है, जिनका लक्ष्य है कि किरायेदारी से जुड़े मामले 60 दिनों के अंदर निपटाए जाएँ।इस व्यवस्था से पारंपरिक कोर्ट प्रणाली में होने वाली देरी और खर्च कम होंगे, और दोनों पक्षों,मकान मालिक और किरायेदार,को जल्दी न्याय मिलेगा। इसके अलावा, यदि किराया तीन महीने या उससे अधिक समय तक न दिया जाए, तो मकान मालिक रेंट ट्रिब्यूनल के माध्यम से त्वरित कार्रवाई कर सकता है। यह प्रावधान टेनेंट को भी जवाबदेह बनाए रखता है और मकान मालिक की सुरक्षा को सुनिश्चित करता है कि गैर- भुगतान की स्थितिमें कानूनी रास्ता उपलब्ध है।चौथा, टैक्स और वित्तीय पक्षों में मकान मालिकों को बढ़ी हुई छूट और प्रोत्साहन दिए गए हैं। टैक्स डिडक्शन एट सोर्स की सीमा को बढ़ाकर 6 लाख रूपए सालाना कर दिया गया है, पहले यह सीमा 2.40 रूपए लाख थी। यह वृद्धि मकान मालिकों को कर बोझ से राहत देती है, विशेष रूप से उन मालिकों को जिन्होंने किराए की कमाई से बड़ी आय दर्ज की है। साथ ही, किराए से होने वाली आय को अब इन्कम फ्रॉम हाउसिंग प्रॉपर्टी के तहत सीधे गिनना होगा,जिससे टैक्स रिपोर्टिंग प्रक्रिया सरल हो जाएगी और मालिकों के लिए पारदर्शिता बढ़ेगी।इसके अतिरिक्त, मकान मालिकों को यह भी लाभ हो सकता है कि अगर वे घर की मरम्मत (रिपेयर) करते हैं या किराया कम रखते हैं, तो राज्य- योजनाओं के तहत टैक्स छूट जैसी छूटें मिल सकें। इसके अलावा, मकान मालिकों को उनका न्याय सुनिश्चित करने का अधिकार भी दिया गया है जब विवाद हो।नए ट्रिब्यूनल्स उन्हें कानूनी उपाय देते हैं, और वे दुबारा किराया प्राप्ति, बेदखली,जैसी समस्याओं में त्वरित कार्रवाई कर सकते हैं। इस प्रकार,लैंडलॉर्ड अपने अधिकारों के संरक्षण में सक्षम होंगे,जबकि त्वरित न्याय प्रणाली उन्हें लंबे कानूनी झमेले से बचाएगी 2025 के नए रूल्स का प्राविधिक रूप से कुछ भाग (जैसे ई-स्टैम्पिंग प्लेटफार्म नियम) केंद्र/केंन्द्रप्राय निकायों द्वारा निर्देशित किए गए और 1 जुलाई 2025 जैसी तारिखों का जिक्र मिलता है;पर राज्य-स्तरीय कानूनी स्वीकृति/मालिकाना नियमों के लिए अलग-अलग क्रियान्वयन तिथियाँ हो सकती हैं। साथियों बात अगर हम केन्द्रा और राज्य सरकारों के अधिकार, संवैधानिक दृष्टि को समझने की करें तो संवैधानिक रूप से भारत की सातवीं अनुसूची में भूमि/भूमि-सम्बन्धी अधिकार, भूमि संपत्ति,भूमि-टेन्यूर्स और मकान-मालिक-किरायेदार सम्बन्धी विषय’ राज्यों के विषय माने गए हैं। इसका अर्थ यह है कि रैंट/टेनेंसी पर कानून बनाना परंपरागत रूप से राज्य विधानसभाओं का अधिकार है। इसलिए केंद्र सीधे तौर पर संपूर्ण देश-व्यापी किराये का कानून पारित नहीं कर सकता (जब तक वह किसी अन्य संवैधानिक आधार का उपयोग न करे) इसलिए केंद्र ने मॉडल टेंनैंसी एक्ट जैसे मॉडल कानूनी ढाँचे बनाए और राज्यों से अनुरोध किया कि वे उसे अपनाएं/संशोधित करें,यही कारण है कि 2025 का नया फ्रेमवर्क अधिकतर एमटीए के सिद्धांतों पर आधारित है पर ऐक्ट्यूअल क्रियान्वयन में राज्यों द्वारा बदलाव, विलम्ब या स्थानीय समायोजन सामान्य रूप से होता देखा गया।संक्षेप में: केंद्र नीति-निर्देश और तकनीकी/डिजिटल गाइड लाइन दे सकता है; राज्यों के पास अंतिम विधायी/नियामक अधिकार होता है। अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विशेषण करें तो हम पाएंगे कि यह सकारात्मक क्रांतिकारी कदम है?नए रेंट एग्रीमेंट रूल्स 2025, यदि ठीक-ठीक और समरसता से लागू किए जाएँ, तो भारतीय किराये बाज़ार को पारदर्शिता, न्यायसंगतता और मोबिलिटी की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा सकता है।डिजिटल रजिस्ट्रेशन व ई - स्टामपिंग धोखाधड़ी कम करेंगे; सुरक्षा-जमानत की सीमाएँ टेनेंट्स को राहत देंगी; और रेंट अथॉरिटी/ट्रिब्यूनल से विवादों का त्वरित निपटारा संभव होगा। (-संकलनकर्ता लेखक - क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र) ईएमएस / 28 नवम्बर 25