लेख
28-Nov-2025
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भारत में शिक्षा को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता मिलने के बाद भी कई राज्यों में आधारभूत ढाँचे, जनसंख्या वृद्धि, वित्तीय बाधाओं और प्रशासनिक लापरवाही के कारण प्राथमिक शिक्षा की पहुँच प्रभावित होती रही है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा केरल सरकार को प्राथमिक और लोअर प्राइमरी स्कूल खोलने के स्पष्ट निर्देश देना इसी संदर्भ में एक महत्वपूर्ण कदम है। मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत ने राज्य की स्थिति पर गहरी चिंता जाहिर करते हुए कहा कि जो राज्य खुद को शिक्षाक्षेत्र में शत प्रतिशत साक्षर होने का दावा करता है, वहाँ स्कूली ढाँचे की ऐसी स्थिति बेहद चिंताजनक है। कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया कि शिक्षा में किसी भी प्रकार की कमी बर्दाश्त नहीं की जाएगी, और तीन महीने के भीतर नई नीति बनाना अनिवार्य है।यह निर्णय न केवल केरल के लिए बल्कि पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था के लिए एक दिशा-सूचक संदेश है। यह इस बात को रेखांकित करता है कि शिक्षा के अधिकार को केवल कागजों पर नहीं बल्कि जमीन पर लागू करने की आवश्यकता है। शिक्षा का अधिकार और राज्य की जिम्मेदारी पर सुप्रीम ने चिंता जताई।सीजेआई सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान कहा कि यदि शत-प्रतिशत साक्षरता का दावा करने वाला राज्य भी प्राथमिक स्कूलों की कमी से जूझ रहा है, तो यह बेहद गंभीर स्थिति है। कोर्ट ने शिक्षा को प्रत्येक बच्चे का मूलभूत अधिकार बताते हुए कहा कि शिक्षा में कोई कमी स्वीकार नहीं की जाएगी।सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी दो बड़े मुद्दों पर रोशनी डालती है।राज्य की प्राथमिक शिक्षा के प्रति ढिलाई, और स्कूलों की पहुँच का अभाव, जो राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। भारत में शिक्षा का अधिकार आरटीई स्पष्ट रूप से कहता है कि प्रत्येक बच्चे को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा दी जानी चाहिए, और इसके लिए पर्याप्त संख्या में स्कूल उपलब्ध होना अनिवार्य है।हर एक किलोमीटर के दायरे में प्राथमिक स्कूल होना आवश्यक है कोर्ट की सख्त टिप्पणी और सुनवाई के दौरान यह पाया गया कि केरल के कई क्षेत्रों में एक किलोमीटर के दायरे में प्राथमिक स्कूल उपलब्ध नहीं हैं। यह स्थिति आरटीई एक्ट 2009 के निर्देशों के सीधे उल्लंघन में आती है।आरटीई के नियम के अनुसार लोअर प्राइमरी स्कूल अधिकतम 1 किमी दूरी पर होना चाहिए।अपर प्राइमरी स्कूल अधिकतम 3 किमी के दायरे में होना चाहिए। कोर्ट ने इस अभाव को बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ बताते हुए कहा कि जब तक स्थायी स्कूल भवन उपलब्ध न हो, तब तक प्राइवेट बिल्डिंग का उपयोग कर अस्थायी रूप से स्कूल चलाए जा सकते हैं।इस तरह कोर्ट ने शिक्षा के बुनियादी अधिकार की रक्षा करते हुए व्यावहारिक समाधान भी सुझाए।बजट व्यवस्था और संसाधनों की कमी पर कोर्ट का स्पष्ट रुख है। राज्य सरकारें अक्सर शिक्षा पर बजट की कमी का हवाला देती हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि बजट का इंतजाम सरकार की जिम्मेदारी है, बच्चों की शिक्षा किसी भी स्थिति में बाधित नहीं होनी चाहिए।यह टिप्पणी महत्वपूर्ण है क्योंकिकई राज्यों में शिक्षा को लेकर बजट प्राथमिकता में नहीं होता। सरकारी योजनाएं कागजों पर रह जाती हैं।वित्तीय बाधाओं के कारण स्कूलों का निर्माण और संचालन प्रभावित होता है। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश राज्य सरकारों को शिक्षा बजट में पारदर्शिता और प्राथमिकता देने का मार्ग दिखाता है।शिक्षक की कमी के मद्देनजर रिटायर्ड शिक्षकों की अस्थायी नियुक्ति का सुझाव भी दिया गया।कोर्ट को जानकारी दी गई कि स्कूलों में शिक्षक नियुक्ति की प्रक्रिया धीमी है और कई पद खाली पड़े हैं। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया किरिटायर्ड शिक्षकों को अस्थायी रूप से नियुक्त किया जा सकता है,ताकि बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो। यह समाधान बेहद व्यावहारिक है क्योंकि रिटायर्ड शिक्षक अनुभवी होते हैं और प्रशासनिक देरी के बीच शिक्षा व्यवस्था को संभालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। केरल का शिक्षा मॉडल और मौजूदा चुनौतियाँभी मुहफाडे खड़ी है।केरल का शिक्षा मॉडल विश्व स्तर पर सराहा जाता रहा है।वहाँ की साक्षरता दर 95% से अधिक है। सार्वजनिक स्कूलों की गुणवत्ता देश में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। सरकारी स्कूलों में एडमिशन बढ़ रहा है।इसके बावजूद कुछ क्षेत्रों में स्कूलों की कमी चौंकाती है। क्योकि नई बस्तियों में स्कूलों का अभावदिखाई दे रहा हैजनसंख्या का असमान वितरण भी बड़ा कारण है।पुराने स्कूलों का विलय या बंद होना भी दूसरा बड़ा कारण है। नई स्कूल नीति का अभाव भी शिक्षा स्तर को प्रभावित करता है।सुप्रीम कोर्ट ने इन समस्याओं को गंभीरता से लेते हुए तीन महीने में व्यापक नीति बनाने का निर्देश दिया है। शिक्षा की कमी का व्यापक असर बच्चो के भविष्य पर पड़ता है।जब प्राथमिक स्तर पर स्कूल उपलब्ध नहीं होते, तो इसका असर केवल पढ़ाई पर नहीं बल्कि सामाजिक और मानसिक विकास पर भी पड़ता है।इससे प्रभावित होने वाले मुद्दे पर ध्यान देना जरूरी है।स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की संख्या बढ़ती है। लड़कियों की शिक्षा पर इससे गंभीर प्रभाव पड़ता है।क्योंकि बाल श्रम की आशंका बढ़ती है। और इतना ही नही ,समाज में असमानता गहरी होती है। ग्रामीण और गरीब परिवारों पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। इसलिए कोर्ट का यह निर्देश बच्चों के जीवन को बेहतर बनाने वाले दूरगामी परिणाम रखता है। नई शिक्षा नीति के संदर्भ में मामला राष्ट्रीय शिक्षा नीति में शिक्षा की पहुँच, गुणवत्ता और समान अवसरों पर जोर है।लेकिन यदि किसी राज्य में आधारभूत ढांचा ही उपलब्ध न हो तो नीति बेअसर हो जाती है। सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप रास्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन को मजबूती देगा,सभी राज्यों के लिए मिसाल बनेगा,प्राथमिक शिक्षा को नीति-निर्माण का मुख्य केंद्र बनाएगा। न्यायपालिका की सक्रियता शिक्षा सुधार में अहम भूमिका। निभाएगी।भारतीय न्यायपालिका ने समय-समय पर शिक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय दिए हैं।यह मामला भी उसी परंपरा का विस्तार है जहाँ अदालत बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए सामने आई है। न्यायपालिका का यह सख्त रुख महत्वपूर्ण है। इससे बच्चों की शिक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है, सरकारें किसी बहाने से पीछे नहीं हट सकतीं,शिक्षा का अधिकार केवल किताबों का विषय नहीं बल्कि व्यावहारिक सच्चाई है। आने वाले समय में संभावित सुधार औरसुप्रीम कोर्ट द्वारा केरल सरकार को तीन महीने में नीति बनाने का निर्देश दिए जाने के बाद अपेक्षित सुधार की कदमताल में सरकार बढ़ती नजर आएगी? क्योकि नई स्कूल नीति का निर्माणऔरजनसंख्या के आधार पर स्कूलों की संख्या तय होगी।दूरस्थ क्षेत्रों में नए स्कूल प्रस्तावित होंगे। अस्थायी रूप से प्राइवेट बिल्डिंग का उपयोगस्कूलों के संचालन में तुरंत सुधार दिखाई देगा। शिक्षक भर्ती प्रक्रिया में तेजीआएगी।अनुबंध आधारित और रिटायर्ड शिक्षकों की नियुक्ति से कमी दूर होगी।आधारभूत सुविधाओं में सुधार भी देखा जा रहा है।कक्षाएँ, शौचालय, पेयजल, डिजिटल उपकरणों की व्यवस्था मजबूत होगी। शिक्षा की गुणवत्ता में सुधारबढ़ेगी।केरल का मॉडल और अधिक मजबूत और आधुनिक बन सकेगा। सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश केवल केरल के लिए नहीं बल्कि पूरी भारतीय शिक्षा प्रणाली के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है। यह बताता है कि शिक्षा में किसी भी प्रकार की कमी या लापरवाही स्वीकार योग्य नहीं है। बच्चों का भविष्य देश का भविष्य है, और प्राथमिक शिक्षा वह नींव है जिस पर राष्ट्र निर्माण खड़ा होता है।केरल सरकार से अपेक्षा है कि वह सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करते हुए शिक्षा व्यवस्था को नयी मजबूती देगी और हर बच्चा अपने अधिकार, यानी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, को प्राप्त कर सकेगा। (वरिष्ठ पत्रकार, साहितकार- स्तम्भकार) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 28 नवम्बर/2025