लेख
31-Dec-2025
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वैश्विक स्तरपर पिछले कुछ वर्षों में भारतीय समाज ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में यह स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि आध्यात्मिकता का स्वरूप तीव्र गति से बदल रहा है। एक समय था जब आध्यात्मिकता तप, त्याग, मौन और दीर्घ साधना से जुड़ी मानी जाती थी, वहीं आज आध्यात्मिकता मंच, माइक , कैमरा, सोशल मीडिया और विशाल जनसमूहों के बीच दिखाई देती है। कथावाचक क़े रूप में बाबाजी कहलाने का चलन केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिवर्तन का संकेत भी है। यह परिवर्तन न तो पूर्णतः सकारात्मक है और न ही पूर्णतः नकारात्मक,यह आधुनिक समाज की जटिलताओं का प्रतिबिंब है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं की गोंदिया महाराष्ट्र मानता हूं कि यह किसी व्यक्ति,संप्रदाय या कथावाचक पर टिप्पणी या व्यंग्य नहीं है,बल्कि समकालीन आध्यात्मिक प्रवृत्तियों की गहरी पड़ताल है।भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को धर्म मानने,आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है। इसी संवैधानिक अधिकार के अंतर्गत कथावाचक,बाबा और आध्यात्मिक नेतृत्व का उभार संभव है। कोई भी व्यक्ति आध्यात्मिक मार्ग अपनाए, कथा कहे या अनुयायी बनाए,संविधान उसे रोकता नहीं।लेकिन लोकतंत्र केवल अधिकारों का नहीं, बल्कि विवेक,उत्तरदायित्व और जागरूक नागरिकता का भी नाम है।तेज़ी से बदलती अर्थव्यवस्था, प्रतिस्पर्धी जीवनशैली और सामाजिक असुरक्षा के बीच भारतीय नागरिक मानसिक शांति और जीवन अर्थ की तलाश में है। यह तलाश लोकतंत्र के भीतर हो रही है,जहाँ राज्य भौतिक आवश्यकताओं पर केंद्रित है,वहीं नागरिक आध्यात्मिक संतुलन खोज रहा है।यही कारण है कि आध्यात्मिक मंच आज भीड़ खींचते हैं। यह स्थिति लोकतंत्र की विफलता नहीं,बल्कि उसकी मानवीय सीमा को भी दर्शाती है।पारंपरिक भारतीय संस्कृति में कथावाचक समाज का नैतिक शिक्षक होता था,जो रामायण, भागवत और लोककथाओं के माध्यम से मूल्यों का संचार करता था। आज कथावाचक की भूमिका बदल रही है। वह अब केवल संस्कृति का वाहक नहीं,बल्कि एक सार्वजनिक व्यक्तित्व, प्रभावशाली वक्ता और कभी-कभी सामाजिक नेता भी बन जाता है। यह परिवर्तन संस्कृति के स्थिर न रहने, बल्कि समय के साथ रूप बदलने का प्रमाण है।संवैधानिक दृष्टि से आधुनिक युग में यह स्पष्ट दिखता है कि कुछ लोग आध्यात्मिकता को जीवन- समर्पण मानते हैं,जबकि कुछ स्पष्ट रूप से नहीं परंतु कहीं ना कहीं संभवतःछिपे रूप से इसे पेशे और करियर के रूप में अपनाते हैं। संविधान इस अंतर पर निर्णय नहीं देता।लोकतंत्र में यह नागरिक कीस्वतंत्रता है। लेकिन लोकतांत्रिक समाज यह अपेक्षा करता है कि आस्था का उपयोग भय,अंधविश्वास या विभाजन के लिए न हो, बल्कि नैतिकता और सामाजिक सद्भाव के लिए हो। साथियों बात अगर हम आध्यात्मिकता की ओर बढ़ता आकर्षण:एक वैश्विक सामाजिक प्रवृत्ति इसको समझने की करें तो,आधुनिक युग में व्यक्ति भौतिक प्रगति के शिखर पर पहुँचने के बावजूद मानसिक अस्थिरता, अकेलापन अवसाद और अस्तित्वगत संकट से जूझ रहा है।भारत ही नहीं, अमेरिका, यूरोप, जापान और दक्षिण- पूर्व एशिया जैसे क्षेत्रों में भी योग, ध्यान, माइंडफुलनेस और आध्यात्मिक प्रवचनों की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी है। यह आकर्षण बताता है कि आधुनिक जीवनशैली मनुष्य की आंतरिक आवश्यकताओं को पूर्ण रूप सेसंतुष्ट नहीं कर पा रही। ऐसे में आध्यात्मिकता एक मानसिक शरणस्थली के रूप में उभरती है। साथियों बात अगर हम कथावाचक से बाबाजी तक: पहचान निर्माण की नई प्रक्रिया इसको समझने की करें तो, पारंपरिक भारतीय समाज में कथावाचक होना एक विद्या- साध्य कार्य था, जिसमें शास्त्रों का गहन अध्ययन,गुरु-शिष्य परंपरा और वर्षों की तपस्या आवश्यक मानी जाती थी। किंतु आज कथावाचन कई बार व्यक्तिगत ब्रांडिंग का माध्यम बनता दिख रहा है। कथा कहना अब केवल धार्मिक कर्म नहीं, बल्कि पहचान निर्माण का साधन भी है। आधुनिक संचार माध्यमों ने इस प्रक्रिया को और तीव्र कर दिया है,जहाँ कुछ ही वर्षों में कोई व्यक्ति लाखों अनुयायियों तक पहुँच सकता है।आध्यात्मिक समर्पण या करियर विकल्प:रेखा कहाँ खिंचती है?-वर्तमान समय की एक बड़ी सच्चाई यह है कि आध्यात्मिकता में प्रवेश करने वालों के उद्देश्य समान नहीं हैं।कुछ लोग वास्तव में जीवन को ईश्वर-समर्पित करना चाहते हैं,तो कुछ इसे एक सुरक्षित सम्मानजनक और आर्थिक रूप से स्थिर करियर विकल्प के रूप में देखते हैं। यह द्वंद्व केवल भारत तक सीमित नहीं है; पश्चिमी देशों में भी स्पिरिचुअल कोच, लाइफ गुरु और हीलिंग एक्सपर्ट जैसे पेशे उभर चुके हैं। प्रश्न यह नहीं कि आध्यात्मिकता में करियर गलत है या सही, बल्कि यह है कि क्या इसका मूल उद्देश्य आत्मोन्नति से हटकर बाह्य सफलता बनता जा रहा है? साथियों बात अगर हम अनसुने नाम, जानी- पहचानी कथाएँ: आस्था का बदलता भूगोल इसको समझने की करें तो, आज अनेक ऐसे कथावाचकों और बाबाओं के नाम सामने आ रहे हैं, जिनका उल्लेख न तो पारंपरिक धर्मग्रंथों में मिलता है और न ही ऐतिहासिक धार्मिक परंपराओं में। फिर भी उनकी कथाओं में श्रोता उमड़ रहे हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि आधुनिक समाज में आस्था का आधार केवल शास्त्र या परंपरा नहीं,बल्कि प्रस्तुति, भाषा, भावनात्मक जुड़ाव और व्यक्तिगत करिश्मा भी बन गया है।यह एक नई प्रकारकी भावनात्मक आध्यात्मिकता का उदय है।यह विचार उद्देश्यहीन आलोचना नहीं, समकालीन यथार्थ की स्वीकृति-यह आवश्यक है कि इस विषय पर चर्चा करते समय हम किसी भी कथावाचक या बाबाजी के चरित्र पर प्रश्नचिह्न न लगाएँ। समाज में हर व्यक्ति अपने अनुभव, परिस्थिति और समझ के अनुसार मार्ग चुनता है। यह लेख किसी पर व्यंग्य या टिप्पणी नहीं करता,बल्कि उस यथार्थ को स्वीकार करता है जिसे हम रोज़ देख रहे हैं। आलोचना से अधिक आवश्यक है आत्ममंथन,कि हम किस प्रकार की आध्यात्मिकता की ओर बढ़ रहे हैं।पचास वर्ष पहले और आज: आस्था का केंद्र कैसे बदला-लगभग पाँच दशक पहले तक भारतीय घरों में भगवान की पूजा का केंद्र मूर्तियाँ, ग्रंथ और परंपरागत रीति-रिवाज हुआ करते थे। राम, कृष्ण, शिव, दुर्गा और हनुमान जैसे देवता जीवन के नैतिक मार्गदर्शक माने जाते थे। आज भी उनकी पूजा होती है, किंतु उनके साथ-साथ जीवित बाबाओं की भूमिका कहीं अधिक प्रत्यक्ष और प्रभावशाली हो गई है। देवता अब चित्रों और मंदिरों तक सीमित होते जा रहे हैं, जबकि बाबाजी मंच पर संवाद करते हैं।जीवित बाबाजी का आकर्षण:संवाद, समाधान और तात्कालिकता-आधुनिक मनुष्य तत्काल समाधान चाहता है। जीवित बाबाजी प्रश्नों का उत्तर देते हैं, समस्याओं पर टिप्पणी करते हैं और व्यक्तिगत संबंध का अनुभव कराते हैं। यह अनुभव चित्रों या ग्रंथों से संभव नहीं हो पाता। यही कारण है कि वर्तमान बाबाओं के प्रति आकर्षण बढ़ा है। यह केवल आस्था नहीं, बल्कि संवाद की आवश्यकता भी है। साथियों बात अगर हम मीडिया और सोशल मीडिया: आध्यात्मिकता का नया मंच इसको समझने की करें तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया टेलीविजन चैनल यूट्यूब, इंस्टाग्राम और फेसबुक ने आध्यात्मिकता को वैश्विक मंच प्रदान किया है। अब कथा सीमित श्रोताओं तक नहीं, बल्कि करोड़ों दर्शकों तक पहुँचती है। यह विस्तार आध्यात्मिक संदेश को लोकतांत्रिक बनाता है, लेकिन साथ ही सतहीकरण का खतरा भी पैदा करता है। गहन साधना की जगह कभी- कभी वायरल कंटेंट प्राथमिकता बन जाता है।आस्था और बाज़ार एक जटिल संबंध- आधुनिक आध्यात्मिकता पूरी तरह बाज़ार से अलग नहीं रह गई है। आश्रम, प्रवचन, कार्यक्रम, पुस्तकें और डिजिटल सब्सक्रिप्शन, ये सभी आर्थिक संरचना का हिस्सा बन चुके हैं।यह न तो पूर्णतः अनुचित है और न ही पूर्णतःउचित;यह समय की मांग का परिणाम है। किंतु प्रश्न यह है कि क्या बाज़ार आस्था को नियंत्रित कर रहा है, या आस्था बाज़ार को दिशा दे रही है? साथियों बात अगर हम इस विषय कोअंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य: भारत अकेला नहीं इस रूप में समझने की करें तो,यह परिवर्तन केवल भारतीय समाज तक सीमित नहीं है। अमेरिका में टेली-एवेंजेलिस्ट, यूरोप में स्पिरिचुअल मोटिवेशनल स्पीकर्स और एशिया में ध्यान गुरु,हर जगह आध्यात्मिकता आधुनिक रूप में प्रकट हो रही है। भारत इस वैश्विक प्रवृत्ति का एक प्रमुख केंद्र है, क्योंकि यहाँ आध्यात्मिक विरासत अत्यंत गहरी है। अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि विवेकपूर्ण आस्था की आवश्यकता -आधुनिक युग की आध्यात्मिकता न तो पूरी तरह खोखली है और न ही पूरी तरह शुद्ध। यह हमारे समय की उपज है,जहाँ आस्था,पहचान, करियर और बाज़ार एक-दूसरे में गुंथे हुए हैं। आवश्यकता इस बात की है कि समाज विवेकपूर्ण दृष्टि अपनाए, प्रश्न पूछे, पर श्रद्धा का अपमान न करे। आध्यात्मिकता का उद्देश्य अंततः आत्मबोध, करुणा और नैतिक जीवन होना चाहिए,चाहे वह मंदिर में मिले या मंच पर। (-संकलनकर्ता लेखक - क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र) ईएमएस / 31 दिसम्बर 25