लेख
01-Jan-2026
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अख़बारों की सुर्ख़ियाँ जब किसी शहर पर बंदरों के “आतंक” की बात करती हैं या किसी गाँव को हाथियों और भालुओं की दहशत में दिखाती हैं, तब समाज सहज रूप से एक निष्कर्ष पर पहुँच जाता है, कि वन्यजीव समस्या हैं। यह निष्कर्ष सुविधाजनक है, भावनात्मक भी और सत्ता-तंत्र के लिए उपयोगी भी। इसी सुविधा के बीच कहीं अधिक भयावह सच अदृश्य बना रहता है और वह है जंगलों पर संगठित, सुनियोजित और वैध ठहराया गया वह आतंक, जो उद्योग, परियोजना और निवेश के नाम पर फैलाया जा रहा है। यह आतंक शोर नहीं करता, खून नहीं दिखाता, फिर भी इसका प्रभाव पीढ़ियों तक महसूस किया जाएगा। दरअसल ग्लोबल वॉर्मिंग आज केवल वैज्ञानिक शब्द नहीं रह गया है। यह हर सूखते जलस्रोत, हर बढ़ती लू, हर अनियमित बारिश और हर जहरीली हवा में दर्ज हो चुका है। पृथ्वी का तापमान लगातार ऊपर जा रहा है और इस बढ़ोतरी के पीछे सबसे बड़ा कारण वही है, जिसे हम विकास का उत्सव कहकर नजरअंदाज करते आए हैं। जंगलों का विनाश इस पूरी प्रक्रिया की धुरी है। जब वृक्ष कटते हैं, तब केवल लकड़ी नहीं हटती, बल्कि कार्बन को रोकने वाली प्राकृतिक ढाल भी खत्म होती है। धरती की त्वचा नंगी होती जाती है और सूरज की तपिश सीधे उसके भीतर उतरने लगती है। भारत जैसे देश में यह अपराध और अधिक गंभीर है, जहाँ जंगल केवल पर्यावरणीय इकाई नहीं, सांस्कृतिक स्मृति, जीवन पद्धति और सामाजिक संतुलन का आधार रहे हैं। इसके बाद भी बीते चार वर्षों में देशभर में 78,000 हेक्टेयर से अधिक वन भूमि को गैर-वनीय उपयोग के लिए स्वीकृति दी गई। यह आँकड़ा अपने आप में एक आरोप-पत्र है। मध्य प्रदेश में 17,393 हेक्टेयर, ओडिशा में 11,033 हेक्टेयर, अरुणाचल प्रदेश में 6,561 हेक्टेयर, उत्तर प्रदेश में 5,480 हेक्टेयर और छत्तीसगढ़ में 4,092 हेक्टेयर वन क्षेत्र विकास परियोजनाओं के हवाले किया गया। इन संख्याओं के पीछे उजड़े जंगल, विस्थापित आदिवासी, सूखती नदियाँ और टूटता जैव-विविधता का ताना-बाना छिपा है और इसी बीच अरावली पहाड़ी को लेकर गढ़ी गई नई परिभाषा इस पूरे श्रृंखला के अधिकतर हिस्से के विनाश का प्रतीक बन सकती है। गौर करने वाली बात है कि यह पहाड़ियाँ उत्तर भारत के लिए प्राकृतिक सुरक्षा कवच रही हैं। रेगिस्तान के फैलाव को रोकना, भूजल को संजोना, प्रदूषण को थामना, ये सभी जिम्मेदारियाँ अरावली सदियों से निभाती आई हैं। खनन, रियल एस्टेट और तथाकथित विकास के नाम पर इन्हें खोखला किया जा रहा है। अरावली को नुकसान पहुँचाने का अर्थ दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान के भविष्य को दाँव पर लगाना है। यह केवल पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि नीति-निर्माण की संवेदनहीनता का प्रमाण है। इसके अलावा वनों को अक्सर पेड़ों की गिनती में समेट दिया जाता है। यह दृष्टि खतरनाक है। जंगल एक जीवित व्यवस्था हैं, जहाँ मिट्टी, पानी, हवा, कीट, पक्षी, जानवर और मनुष्य एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं। एक पेड़ कटता है तो उसके साथ सैकड़ों जीवन-श्रृंखलाएँ टूटती हैं। पक्षियों के घोंसले उजड़ते हैं, मिट्टी की पकड़ कमजोर होती है, वर्षा का चक्र असंतुलित होता है। यही असंतुलन धीरे-धीरे बाढ़, सूखा और हीटवेव का रूप ले लेता है। वृक्षारोपण के अभियानों को समाधान के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। कैमरों के सामने पौधे लगाए जाते हैं, आँकड़े जारी होते हैं, तस्वीरें वायरल होती हैं। एक पेड़ माँ के नाम जैसे अभियान भावनाओं को छूते हैं, लेकिन वास्तविकता कहीं अधिक कठोर है। जब एक ओर प्रतीकात्मक पौधारोपण होता है, दूसरी ओर लाखों पेड़ परियोजनाओं की भेंट चढ़ते हैं। यह संतुलन नहीं, एक छल है। पौधा लगाना तब सार्थक होता है, जब वह जीवित रहकर जंगल बने। संरक्षण के बिना रोपण केवल आत्मसंतोष की कवायद बनकर रह जाता है। विकास की मौजूदा परिभाषा सबसे बड़ा संकट है। सड़क, फैक्ट्री और मॉल को प्रगति का पैमाना मान लिया गया है। हवा, पानी और हरियाली को विकास की राह में बाधा समझा जाने लगा है। दिल्ली इसका सबसे भयावह उदाहरण है, जहाँ सांस लेना स्वास्थ्य जोखिम बन चुका है। तापमान हर साल नए रिकॉर्ड तोड़ता है, जल संकट स्थायी सच्चाई बन चुका है। यह स्थिति किसी प्राकृतिक दुर्घटना का परिणाम नहीं, बल्कि वर्षों की नीतिगत लापरवाही का नतीजा है। ऐसे में यह समझना आवश्यक है कि जंगलों का विनाश केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, यह सामाजिक और नैतिक प्रश्न भी है। जंगल कटते हैं तो सबसे पहले हाशिए पर खड़े समुदाय उजड़ते हैं। आदिवासी अपनी जमीन, संस्कृति और पहचान से वंचित होते हैं। विकास का लाभ कुछ गिने-चुने हाथों में सिमटता है और उसकी कीमत समाज का बड़ा हिस्सा चुकाता है। यह असमानता भविष्य के सामाजिक संघर्षों की जमीन तैयार करती है। समाधान की दिशा स्पष्ट है। विकास परियोजनाओं की स्वीकृति में वास्तविक पर्यावरणीय मूल्यांकन होना चाहिए। स्थानीय समुदायों की सहमति केवल कागज़ी औपचारिकता न बने। हर कटे पेड़ के बदले केवल पौधा नहीं, पूरा पारिस्थितिक तंत्र पुनर्स्थापित किया जाए। उद्योगों की जवाबदेही तय हो और पर्यावरण कानूनों को कमजोर करने की प्रवृत्ति पर रोक लगे। विकास और प्रकृति के बीच टकराव का विचार ही गलत है। दीर्घकालिक सोच के साथ दोनों का सहअस्तित्व संभव है। आज आवश्यकता है सजग नागरिक चेतना की। उस समाज की, जो अख़बार की सुर्ख़ियों से आगे देखकर असली खतरे को पहचान सके। बंदरों, हाथियों और भालुओं से डरना आसान है। उस आतंक का सामना करना कठिन है, जो फाइलों में छिपा रहता है और विकास का मुखौटा पहनकर जंगलों को निगलता है। जंगलों की खामोशी दरअसल एक चेतावनी है। यह खामोशी चीख बनकर उभरने से पहले सुनी जानी चाहिए। यदि आज दिशा नहीं बदली गई, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें उस समय के रूप में याद रखेंगी, जब मनुष्य ने अपने ही घर की नींव काट दी। ऐसे में उपर्युक्त तथ्य और बातें केवल सूचना नहीं, एक आग्रह है सजग होने का, सचेत होने का और उस विकास को रोकने का, जो जीवन के विरुद्ध खड़ा दिखाई देता है। (स्वतंत्र लेखिका एवं शोधार्थी) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 1 जनवरी /2026