उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में गत 9 दिसंबर को कुछ स्थानीय युवकों द्वारा अगरतला (त्रिपुरा) के निवासी 24 वर्षीय अंजेल चकमा नामक एक छात्र पर जानलेवा हमला किया गया। हमले के बाद 17 दिनों तक अस्पताल में इलाजरत रहने के बाद गत 26 दिसंबर को आख़िरकार उसकी मृत्यु हो गई। चकमा, देहरादून स्थित एक निजी विश्वविद्यालय में एमबीए अंतिम वर्ष के छात्र थे। ख़बरों के अनुसार देहरादून में अंजेल चकमा की मौत एक कथित नस्लीय हमले के कारण हुई। बताया जाता है कि 9 दिसंबर को जब अंजेल और उनके 21 वर्षीय छोटे भाई माइकल चकमा पास के सेलाकुई इलाक़े में किराने का सामान ख़रीदने गए थे उसी समय उनके चेहरों को देखकर हमलावरों ने उन्हें नस्ली गालियां दीं। बताया जाता है कि घटनास्थल पर क़रीब छह लोगों का एक समूह, जो पास में ही पहले से किसी के जन्मदिन का जश्न मना रहा था, ने उन्हें रोक लिया। हमलावरों ने उनपर नस्ली टिप्पणियां करते हुये उनपर चिंकी, चीनी और मोमो जैसी टिप्पणी की। जबकि एक आरोपी ने कहा कि ओये चीनी, क्या सूअर का मांस ख़रीदने आए हो ? माइकल ने इसका विरोध किया, तो एक आरोपी ने उन्हें ब्रेसलेट से सिर पर मारा। अंजेल ने अपने भाई की रक्षा करने की कोशिश की और शांतिपूर्वक कहा, हम चीनी नहीं हैं... हम भारतीय हैं। क्या प्रमाण-पत्र दिखाएं कि हम भारतीय हैं? लेकिन नफ़रती संस्कारों में डूबे गुंडों के इस समूह ने हिंसक रूप से उनपर हमला कर दिया। यज्ञ अवस्थी नामक मुख्य आरोपी ने अंजेल की गर्दन और पीठ पर तेज़ हथियार से वार किया, जिससे वे गिर पड़े। माइकल भी घायल हुए, लेकिन उन्होंने अंजेल को पास के अस्पताल पहुंचाया। अंजेल की हालत गंभीर थी—उनकी गर्दन और स्पाइन में गहरी चोटें थीं—आख़िरकार वे कभी पूर्ण चेतना में वापस नहीं आए और नफ़रत के सौदागरों ने एक होनहार भारतीय छात्र की हत्या कर उसके परिवार को अंधकार में धकेल दिया। निश्चित रूप से इस घटना ने उत्तर-पूर्वी राज्यों के छात्रों के ख़िलाफ़ उपजी नस्लवाद की समस्या को फिर से उजागर कर दिया है। इस घटना को लेकर त्रिपुरा सहित देश के विभिन्न राज्यों व शहरों में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए हैं। हालाँकि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी राज्य के विकास को लेकर तरह तरह की बातें करते रहते हैं, परन्तु हक़ीक़त यही है कि गत कुछ वर्षों में इसी देव् भूमि में सत्ता संरक्षित धर्म जाति आधारित नफ़रती घटनाओं में भी काफ़ी बढ़ोतरी हुई है। उदाहरण के तौर पर अक्टूबर 2023 में उत्तराखंड के पुरोला क़स्बे में एक 14 वर्षीय लड़की के अपहरण के बाद लव जिहाद का आरोप लगाकर हिंदू-मुस्लिम दंगे भड़काये गये। मुस्लिम मकानों व दुकानों पर लक्षित हमले किये गये, कई परिवार शहर छोड़कर भागने को मजबूर हुये। इसी तरह हल्द्वानी में 2024 की बनभूलपुरा में अवैध मदरसे और मस्जिद के विध्वंस पर पथराव, आगज़नी और पेट्रोल बम फेंके जाने की घटना सबसे प्रमुख रही, जहां 6 लोगों की मौतें हुईं। 2025 में भी कश्मीरपुर और हल्द्वानी में साम्प्रदायिक तनाव देखा गया। राज्य में दलितों के विरुद्ध भी अनेक घटनायें होती रहती हैं। परन्तु समाज में धर्म जाति व क्षेत्र के नाम पर बढ़ती नफ़रतों के बीच इस राज्य को देव् भूमि के रूप में भी प्रचारित किया जाता है। सवाल यह है कि उत्तराखंड जैसे शांतिप्रिय राज्य सहित देश के अन्य विभिन्न राज्यों में इस तरह के नफ़रत व हिंसा पैदा करने वाले हालात क्या अचानक पैदा हुए हैं या सत्ता के संरक्षण में इन नफ़रती संस्कारों को पोषित किया जा रहा है? उत्तराखंड की घटना के बाद केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू द्वारा दिये गये बयान से यह काफ़ी कुछ स्पष्ट हो जाता है। केंद्रीय मंत्री रिजिजू ने त्रिपुरा के छात्र अंजेल चकमा की हत्या पर दुख व्यक्त करते हुये कहा कि पूर्वोत्तर के लोगों के ख़िलाफ़ ऐसी घटनाएं अलग-थलग नहीं हैं और समाज को भेदभाव रोकने के लिए एकजुट होना चाहिए। हम लोगों को इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठानी होगी। हमें मिलकर भेदभाव को रोकना होगा। भारत के किसी भी हिस्से के लोगों को हर जगह सुरक्षित महसूस करना चाहिए। उनकी मृत्यु बेहद दुखद है। किरेन रिजिजू ने यह भी कहा कि देहरादून में एंजेल चकमा और उनके भाई माइकल के साथ जो हुआ, वह एक भयावह घृणा अपराध है। उन्होंने आगे यह भी कहा कि ऐसी नफ़रत रातों रात पैदा नहीं होती। वर्षों से इसे रोज़ाना, ख़ासकर हमारे युवाओं को, ज़हरीली सामग्री और ग़ैर -ज़िम्मेदाराना ख़बरों के माध्यम से बढ़ावा दिया जा रहा है। किसी का भी मज़ाक़ नहीं उड़ाया जाना चाहिए। कोई भी घटना देश के लिए दुखद घटना होती है। अगर देश में ऐसी कोई भी घटना होती है तो पूरे समाज को मिलकर उसके ख़िलाफ़ लड़ना चाहिए। वहीं, राहुल गांधी ने भी इस मुद्दे पर अपनी टिप्पणी में कहा कि हम प्रेम और विविधता का देश हैं। हमें ऐसा समाज नहीं बनना चाहिए जो साथी भारतीयों को निशाना बनाए जाने पर अनदेखी करे। हमें यह सोचने और सामना करने की ज़रूरत है कि हम अपने देश को क्या बनने दे रहे हैं? अफ़सोस की बात तो यह कि केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू द्वारा उत्तराखंड की घटना के बाद व्यक्त किये गये विचार उस समय सामने आये जब उनके अपने पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा के छात्र अंजेल चकमा की नस्लवादी नफ़रती लोगों द्वारा हत्या कर दी गयी ? जबकि लगभग एक दशक से देश में जगह जगह अल्पसंख्यकों,दलितों व पिछड़े वर्ग के लोगों को निशाना बनाया जाता रहा है। लिंचिंग की घटनायें घटित हो रही हैं। जगह जगह उन्मादी भीड़ पुलिस की शह पर वर्ग विशेष के लोगों को निशाना बनाती रही है। जगह जगह उकसाऊ भाषण हो रहे हैं। कहीं हथियार बांटे जा रहे हैं। तो कहीं संवैधानिक पदों पर बैठे लोग स्वयं अपने ज़हरीले बोलों से समाज में हिंसा व नफरत बढ़ा रहे हैं। निःसंदेह गोदी मीडिया भी इस नफ़रती वातावरण को और भी ज़हरीला बना रहा है। ऐसे में रिजिजू की चिंताओं के अनुसार भारत के किसी भी हिस्से के लोगों का स्वयं को हर जगह सुरक्षित महसूस करना कहां संभव हो पा रहा है? इस समय देश के समक्ष सबसे बड़ी चिंता इस बात की है कि आख़िर देश को कहाँ ले जायेंगे ये नफ़रती संस्कार? ईएमएस / 01 जनवरी 26