लेख
01-Jan-2026
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पांच जनवरी से देशभर में शुरू होने जा रहे कांग्रेस के अभियान का केंद्र महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम है, लेकिन इसका दायरा केवल एक योजना तक सीमित नहीं है। दिल्ली में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने जिस आक्रामक और स्पष्ट भाषा में सरकार को घेरा, उससे यह साफ हो गया कि कांग्रेस इस मुद्दे को ग्रामीण भारत, लोकतांत्रिक अधिकारों और संघीय ढांचे की रक्षा से जोड़कर देख रही है। मनरेगा केवल सौ दिन के रोजगार की गारंटी नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़, सामाजिक सुरक्षा का आधार और लोकतांत्रिक शासन की जवाबदेही का प्रतीक रही है। खड़गे ने कहा कि मनरेगा को निरस्त किए जाने के खिलाफ देशव्यापी अभियान समय की मांग है। उनका तर्क था कि यह कानून यूपीए सरकार की दूरदर्शी सोच का परिणाम था, जिसकी सराहना अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी हुई। ग्रामीण मजदूरों को काम का अधिकार देकर इस योजना ने न केवल भूख और बेरोजगारी से लड़ाई लड़ी, बल्कि पलायन को भी रोका। इसी प्रभाव के कारण इसका नाम महात्मा गांधी के नाम पर रखा गया, ताकि आत्मनिर्भरता, श्रम की गरिमा और सामाजिक न्याय की गांधीवादी अवधारणा को साकार किया जा सके। कांग्रेस अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार ने बिना किसी व्यापक अध्ययन, मूल्यांकन और राज्यों से परामर्श के इस कानून को खत्म करने का फैसला किया। उन्होंने याद दिलाया कि तीन कृषि कानूनों को भी सरकार ने इसी तरह बिना संवाद के लागू किया था और जब देशभर में विरोध हुआ तो अंततः उन्हें वापस लेना पड़ा। खड़गे का कहना था कि मनरेगा को समाप्त करना भी वैसा ही एक एकतरफा और अहंकारी निर्णय है, जिसके परिणाम सरकार को भुगतने होंगे। इससे राज्यों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ेगा और ग्रामीण गरीबों के सामने जीवनयापन का संकट गहरा जाएगा। बैठक में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर भी गंभीर चिंता जताई गई। खड़गे ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों को सीमित करने की सुनियोजित साजिश बताया। उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं से आह्वान किया कि वे घर-घर जाकर यह सुनिश्चित करें कि गरीब, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक समुदाय के मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से न हटें। कांग्रेस का मानना है कि रोजगार की गारंटी छीनने और मताधिकार को कमजोर करने की ये कोशिशें एक ही राजनीतिक सोच का हिस्सा हैं, जिसका उद्देश्य हाशिए के समाज को सत्ता की प्रक्रिया से बाहर करना है। इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम के बीच श्रमिक आंदोलनों की गूंज भी सुनाई दी। शिमला में सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन से जुड़े 108 और 102 एम्बुलेंस वर्कर्स ने राज्यव्यापी हड़ताल के दौरान प्रदर्शन किया। उनका आरोप था कि कर्मचारियों का शोषण बढ़ता जा रहा है और सरकार श्रम कानूनों को कमजोर कर रही है। कांग्रेस नेताओं ने इन आंदोलनों का हवाला देते हुए कहा कि मनरेगा का खत्म होना केवल ग्रामीण मजदूरों तक सीमित प्रभाव नहीं डालेगा, बल्कि संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों में श्रमिकों की सौदेबाजी की ताकत को कमजोर करेगा। कांग्रेस ने बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों की निंदा करते हुए कहा कि पूरा देश इसे लेकर चिंतित है। साथ ही भाजपा और आरएसएस से जुड़े संगठनों द्वारा क्रिसमस समारोहों पर किए गए हमलों को सांप्रदायिक सौहार्द के लिए खतरनाक बताया गया। खड़गे ने कहा कि इस तरह की घटनाएं वैश्विक स्तर पर भारत की छवि को नुकसान पहुंचाती हैं और देश की बहुलतावादी परंपरा पर आघात करती हैं। कांग्रेस के अनुसार जब सरकार सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को खत्म करती है और साथ ही सामाजिक तनाव को अनदेखा करती है, तो लोकतंत्र की नींव कमजोर होती है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने मनरेगा को निरस्त किए जाने को गरीबों और वंचितों पर सीधा हमला बताया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने अपने मंत्रिमंडल से बिना पूछे और बिना किसी अध्ययन के अकेले ही यह फैसला लिया। राहुल ने इसकी तुलना नोटबंदी से की, जिसे उन्होंने आम जनता के लिए विनाशकारी करार दिया। उनका कहना था कि मनरेगा को खत्म करना संघीय ढांचे पर भी हमला है, क्योंकि यह योजना केंद्र और राज्यों की साझेदारी पर आधारित थी और इससे स्थानीय स्वशासन को मजबूती मिली थी। कांग्रेस नेताओं ने संकल्प लिया कि वे ग्रामीण मजदूरों के सम्मान, रोजगार, मजदूरी और समय पर भुगतान के अधिकार के लिए एकजुट होकर संघर्ष करेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि मनरेगा से महात्मा गांधी का नाम मिटाने और मजदूर के अधिकार को खैरात में बदलने की हर साजिश का लोकतांत्रिक तरीके से विरोध किया जाएगा। पार्टी का मानना है कि यह केवल एक योजना को बचाने की लड़ाई नहीं है, बल्कि श्रम की गरिमा और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा का प्रश्न है। इस पूरे विरोध के पीछे कांग्रेस का एक बड़ा कारण ऐसा भी है, जिस पर सार्वजनिक रूप से कम चर्चा हुई है। पार्टी के भीतर यह आशंका गहराई से मौजूद है कि मनरेगा को खत्म करने के साथ-साथ सरकार धीरे-धीरे ग्राम पंचायतों और स्थानीय निकायों की वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियों को भी सीमित करना चाहती है। मनरेगा के माध्यम से पंचायतों को योजना बनाने, काम आवंटित करने और निगरानी का अधिकार मिलता था। इससे ग्रामीण स्तर पर लोकतांत्रिक भागीदारी मजबूत होती थी। कांग्रेस को डर है कि इस कानून के हटने से पंचायतें केवल नाम मात्र की संस्थाएं बन जाएंगी और निर्णय लेने की शक्ति पूरी तरह केंद्रीकृत हो जाएगी। यह चिंता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि संविधान के 73वें संशोधन का मूल उद्देश्य सत्ता का विकेंद्रीकरण था, जिसे मनरेगा ने व्यवहार में उतारा था। कांग्रेस के रणनीतिकार मानते हैं कि यदि मनरेगा जैसी योजनाएं समाप्त होती रहीं तो ग्रामीण भारत में सामाजिक असंतोष बढ़ेगा, जिसका असर केवल आर्थिक नहीं बल्कि राजनीतिक स्थिरता पर भी पड़ेगा। बेरोजगारी और असुरक्षा की भावना युवाओं को हताशा की ओर धकेलेगी और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भरोसा कमजोर होगा। इसी संभावित संकट को देखते हुए कांग्रेस इस मुद्दे को सड़क से संसद तक ले जाने की तैयारी कर रही है। अंततः मनरेगा पर छिड़ी यह बहस भारत के विकास मॉडल को लेकर एक बुनियादी सवाल खड़ा करती है। क्या विकास का अर्थ केवल आंकड़ों और परियोजनाओं से तय होगा, या फिर उसमें गरीब, मजदूर और ग्रामीण नागरिक की सुरक्षा और सम्मान भी शामिल होंगे। कांग्रेस का कहना है कि मनरेगा को खत्म करना विकास नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा की रीढ़ तोड़ना है। इसलिए पांच जनवरी से शुरू होने वाला यह अभियान केवल राजनीतिक विरोध नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चेतना को जगाने की कोशिश है, जिसमें कांग्रेस खुद को ग्रामीण भारत की आवाज के रूप में स्थापित करना चाहती है। ईएमएस / 01 जनवरी 26