हाल ही में अटलजी की 101 वीं जयंती पूरे देश में मनाई गई जिसमें मुझे उनकी कविता दिल को छू ली,अटल बिहारी वाजपेयी की कविता में वैचारिकता रही है देश प्रेम व आजादी व राजनीति संस्कार व लोकतंत्र पर जो कविता लिखी है वो दिनकर,निराला जैसे श्रेष्ठ कवियों के श्रेणी में अवश्य है जो उनके राजनीती करियर में भी देश को एक जुट करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है भारत के महान कवियों में रवींद्रनाथ टैगोर, कालिदास, कबीर, तुलसीदास, मिर्जा गालिब, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह दिनकर, सुमित्रानंदन पंत, निराला, और हरिवंशराय बच्चनरवींद्रनाथ टैगोर, कालिदास, कबीर, तुलसीदास, मिर्जा गालिब, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह दिनकर, सुमित्रानंदन पंत, निराला, और हरिवंशराय बच्चन जैसे अनेक दिग्गज शामिल हैं, जिन्होंने अपनी कालजयी रचनाओं से भारतीय साहित्य को समृद्ध किया और विभिन्न कालों (आदिकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल, आधुनिक काल) में अपनी अमिट छाप छोड़ी है।लेकिन वाजपेयी जी भी इसी श्रेणी में हैँ क्योंकि उनकी कविता में हमेशा देश प्रेम की भावना व सौहार्द पूर्ण माहौल रहा, मुझे ऐसा लगता है जितनी भी कविता लिखी है वह प्रैक्टिकल भी कर कर दिखाया है वो सिर्फ हवाहवाई नहीँ है जैसे कारगिल युद्ध के बाद जीत पर पाकिस्तान व अमेरिका को खुली चेतावनी इस कविता से दि है : ॥चिनगारी से मत खेलों का चिनगारी का खेल बुरा होता है औरों के घर आग लगाने का जो सपना वो अपने ही घर में सदा खरा होता है ॥“ यानी पाकिस्तान को सीधे चेतावनी दी की आतंकी गतिविधियों से बाज़ आओ नहीँ तो आतंकी चिंगारी लगाई तो इसका भारत मुँहतोड़ जबाब दिया है और अमेरिका से क़ोई भी समझौता से भारत माँ का शीश नहीँ झुकेगा दरासल ‘अटल बिहारी वाजपेयी जी’ का पहचान ‘एक अच्छे राजनीतिक नेता के रूप में है। उन्होंने पढ़े-लिखे नेताओं में गिने जाते हैं। कहा जाता है कि जब वे अपनी पढ़ाई करते थे तो, तब वे ‘एआईएसएफ’ के सदस्य थे। वे इस ‘एआईएसएफ’ छात्र संगठन में सक्रिय भूमिका निभाया करते थे। बाद में किसी कारणवश इस रास्ते को छोड़कर, ‘आरएसएस’ के सदस्य बन गए। और अपना पूरा जीवन उसही विचार धारा के साथ बिताए थे। राजनीति में अपना योगदान दिया और पहचान बनाया। देश के प्रधानमंत्री के रूप में अपना योगदान दिया। वे न केवल राजनीतिक नेता थे, बल्कि एक महान् कवि भी थे। ‘मेरी इक्यावन कविताएं’, नाम से उनकी अपनी कविताओं का संग्रह है। जिस में से एक कविता को लेकर ‘कविता में वाजपेयी का अमूल्य योगदान रहा है । कविवर अटल बिहारी वाजपेयी जी कहते हैं कि जिस दिन-15 अगस्त को आज़ादी मिली थी तो, आज वही दिन यह कहता है कि एक तरफ़ पूरे भारत में आजादी का आनंद उठा रहे हैं तो, दूसरी तरफ़ 80 प्रतिशत जनता, गरीब, जनजाति , आदिवासी, पिछड़ा वर्ग, दलित, अल्पसंख्यक लोगों तक उस आज़ादी का फल अब तक नहीं मिला है। इस लिए आज़ादी अभी अधूरी है। जिन सपनों को साकार करने के लिए लड़े थे, वो आज तक पूरे नहीं हुए हैं। जो शपथ लिए थें, जो क़समें खाई थीं, वो भी पूरी नहीं हुई हैं। इस कथन को कवि अटल बिहारी वाजपेयी जी ने अपनी कविता में निम्नप्रकार दर्शाया है। “पंद्रह अगस्त का दिन कहता: आज़ादी अभी अधूरी है। सपने सच होने बाकी है, रावी की शपथ न पूरी है॥“ यहाँ कवि कहते हैं कि आजादी की जंग में कई भारतियों ने अपना बलिदान दिये हैं। जिनके लाशों पर पग धर कर स्वतंत्रता भारत को मिली है, वो अबतक ख़ानाबदोश हैं। भारत में जो गरीबी, भूखमरी, गुलामी, दुःख, दर्द.. आदि अपना रूप बदलकर, काले बादल की भांति, पूरे देश में छाई है। इन भावनाओं को कवि अटल बिहारी वाजपेयी जी ने अपनी निम्नांकित पंक्तियों में दर्शाया है। “जिनकी लाशों पर पग धर कर आज़ादी भारत में आई, वे अब तक हैं खानाबदोश ग़म की काली बदली छाई॥“ यहाँ, कवि अटल बिहारी वाजपेयी जी कहते हैं कि कलकत्ते के फुटपाथों पर आँधियों में-बारिशों में, भीगते हुए-सूखते हुए, इन समस्याओं को झेलते हुए, अपना जीवन गुजारते हैं, उनको पूछिए कि पंद्रह अगस्त के बारे में क्या कहते हैं। इन ज्वलंत समस्याओं को कवि ने अपनी कविता में दर्शाया है, जो निम्नप्रकार है। “कलकत्ते के फुटपाथों पर जो आँधी-पानी सहते हैं। उनसे पूछो, पंद्रह अगस्त के बारे में क्या कहते हैं॥“ उक्त समस्याओं से घिरे हुए लोग अपने भारतीय होते हैं, हिंदू होते हैं। हिंदू होने के नाते उनका दुःख, दर्द.. सुनते हुए यदि आप को लाज लगती है तो, सीमा के उस पार जा कर देखो, जहाँ सभ्यता कुचली जाती है। इन सभी समस्याओं को कवि अटल बिहारी वाजपेई जी ने अपनी कविता में अंकित किया है। “हिंदू के नाते उनका दु:ख सुनते यदि तुम्हें लाज आती। तो सीमा के उस पार चलो सभ्यता जहाँ कुचली जाती॥“ यहाँ, कवि कहता है कि सीमा के उस पार, अपना पड़ोस देश पाकिस्तान है। वे अपने को इस्लाम कहते हैं। लेकिन इस्लाम के मार्ग पर कोई नहीं चलते हैं। वहाँ इंसान बेचा जाता है। ईमान ख़रीदा जाता है। सिर्फ डालर से खुश होते हैं। वहाँ जो भी हो रहा है वह कुरान या इस्लाम के विरोध में हो रहा है। और अपने आप को इस्लाम कहते हैं। इन आदि भावों को कवि ने अपनी कविता में दर्शाया गया है। “ इंसान जहाँ बेचा जाता, ईमान ख़रीदा जाता है। इस्लाम सिसकियाँ भरता है, डालर मन में मुस्काता है॥“ कविवर अटल बिहारी वाजपेयी जी का कहना है कि जहाँ शिक्षा नहीं है, जहाँ भूखमरी है अर्थात जिन लोगों के पास मौलिक सुविधाएं नहीं हैं, उनको कुछ लालच दिखाकर मजबूरी से गलत रास्ते पर चलने को कहते हैं। इन भावनाओं को निम्नलिखित पंक्ति में दर्शाया गया है। “भूखों को गोली नंगों को हथियार पिन्हाए जाते हैं। सूखे कंठों से जेहादी नारे लगवाए जाते हैं॥“ कवि कहता है कि लाहौर, कराची, ढाका के लोग दुख से रो रहे हैं। इन सब पर दुख, दर्द छाया हुआ है। पख्त़ून जाति के लोगों पर, गिलगित पर्वतीय क्षेत्र के लोगों पर दुख, दर्द से भरी हुई गुलामी छायी है। इन भावनाओं को निम्नलिखित पंक्तियों में दर्शाया गया है। “लाहौर, कराची, ढाका पर मातम की है काली छाया। पख्तूनों पर, गिलगित पर है ग़मगीन गुलामी का साया।।” इस लिए कविवर अटल बिहारी वाजपेयी जी कहते हैं कि उपर्युक्त कई समस्याओं से भारत देश जूझ रहा है। तो यहाँ कहने का तात्पर्य है कि यदि भारत को पूर्ण आजादी मिली होती तो, ये समस्याएं नहीं होते। अतः इतने समस्याओं के सामना करते हुए स्वतंत्रता दिवस कैसे मनाएं!?, फिर से कवि कहते हैं कि थोड़े दिन बाकी हैं। अर्थात थोड़े दिनों के बाद पूर्ण रूप से आज़ादी मिल जाएगी, उल्लास मनाएंगे। इन भावनाओं को निम्नलिखित कविता की पंक्तियों में दर्शाया गया है। “बस इसीलिए तो कहता हूँ आज़ादी अभी अधूरी है। कैसे उल्लास मनाऊँ मैं? थोड़े दिन की मजबूरी है॥“ यहाँ कविवर अटल बिहारी वाजपेयी जी कहते हैं कि ये दिन दूर नहीं हैं कि जिस खंडित भारत को फिर से अखंड भारत बनाएंगे। जिस गिलगित पर्वतीय श्रेणियों से लेकर मेघालय के गारो पर्वतों तक स्वतंत्रता दिवस उल्लास से मनाएँगे। इस भावना को निम्नलिखित पंक्तियों में अंकित किया गया है, जो निम्नप्रकार है। “दिन दूर नहीं खंडित भारत को पुन: अखंड बनाएँगे। गिलगित से गारो पर्वत तक आज़ादी पर्व मनाएँगे॥“ आगे आनेवाले स्वर्णिम दिन के लिए हम सबको आज से ही कठिन मेहनत करना होगा। जरूरत पड़ने पर अपना बलिदान देना होगा। सतर्क रहना होगा कि जो पाया उसमें खो न जाए। और हमने जो खोया है, उसका ध्यान रखना होगा। इन आदि भावनाओं को निम्नलिखित कविता की पंक्तियों में अंकित किया गया है। जो इस प्रकार है। “उस स्वर्ण दिवस के लिए आज से कमर कसें बलिदान करें। जो पाया उसमें खो न जाएँ, जो खोया उसका ध्यान करें॥“ निष्कर्ष: यहाँ कविवर अटल बिहारी वाजपेयी जी कहते हैं कि ‘पंद्रह अगस्त का दिन कहता है कि आजादी अभी भी अधूरी है। क्योंकि जिन आशाओं, आकांक्षाओं के साथ हमने आजादी के लिए लड़े थें, वो आज तक पूरे नहीं हुए हैं। हमारे देश में जो मौलिक समस्याएं; गरीबी, भूखमरी, शिक्षा विहीन, बेरोजगार ,बेघर, अर्थात ‘रोटी-कपड़ा-मकान’.. आदि का भी पूर्ति नहीं हुई है। जिस के परिणामस्वरूप इस देश में दुःख, दर्द..की ग़म। ईएमएस / 02 जनवरी 26