लेख
01-Jan-2026
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- वैश्विक व्यापार में स्वदेशी करंसी का महत्व बढ़ा वर्ष 2026 वैश्विक व्यापार को लेकर एक नई आधार शिला रखने की ओर आगे बढ़ रहा है। पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक राजनीति एवं अर्थव्यवस्था में बड़े बदलाव दिखाई दे रहे हैं। दुनिया के सैकड़ों मुल्क वैश्विक लेन-देन में डॉलर की एक ध्रुवीय व्यवस्था से बाहर निकलने की कोशिश कर रहे हैं। अमेरिका और इजराइल लंबे समय से सैन्य ताकत, आर्थिक प्रतिबंधों और राजनीतिक दबाव के जरिए अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को अपने हितों के अनुसार संचालित कर एक अलग तरीके का दबाव बनाकर आतंक पैदा कर रहे थे। अमेरिका के साथ नाटो के देश भी इसमें शामिल हो जाते थे। अब यही रणनीति उनके लिए चुनौती बनती जा रही है। कई देश इस “दादागिरी” के खिलाफ खुलकर खड़े होकर वैकल्पिक लेन-देन की व्यवस्था करने लगे हैं। जिसका असर अमेरिका के ऊपर स्पष्ट रूप से पड़ता हुआ दिख रहा है। डॉलर एवं यूरो मुद्रा का लेन-देन दिन-प्रतिदिन कम होता चला जा रहा है। मुद्रा का उपयोग अमेरिका और यूरोपीय समुदाय ने प्रतिबंध के लिए करना शुरू कर दिया था। यूक्रेन युद्ध और गाजा संघर्ष ने अमेरिका और इजराइल की दोहरी नीति को दुनिया के सामने स्पष्ट कर दिया है। एक ओर लोकतंत्र, मानवाधिकार और नियम-आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था की बातें की जाती हैं। वहीं दूसरी ओर अपनी सुविधा के अनुसार प्रतिबंध, एसेट फ्रीज़ और सैन्य हस्तक्षेप कर कई देशों के ऊपर दबाव बनाने की कोशिश की गई है। रूस के सेंट्रल बैंक के अरबों डॉलर के एसेट्स को फ्रीज़ करना इसी नीति का सबसे बड़ा उदाहरण है। अमेरिका और यूरोप के देशों की इस कार्रवाई से न सिर्फ अंतर्राष्ट्रीय कानूनों पर सवाल खड़े हुए, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह भी दिखा दिया गया, कि पश्चिमी वित्तीय व्यवस्था पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता किसी भी देश के लिए खतरे में डाल सकती है। इसी दादागिरी के कारण वैश्विक व्यापार में लोकल करंसी के उपयोग का महत्व तेजी से बढ़ा है। ब्रिक्स देशों के बीच आपसी व्यापार अब डॉलर के बजाय स्थानीय मुद्राओं में बढ़ता चला जा रहा है। रूस-चीन के व्यापार का बड़ा हिस्सा रूबल और युआन में हो रहा है। वहीं पश्चिम एशिया में ऊर्जा व्यापार के लिए भी डॉलर के विकल्प की तलाश हो रही हैं। यह बदलाव केवल आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक भी है। इससे अमेरिकी और यूरोपीय देशों के प्रतिबंध के असर और जोखिम को सीमित करने की कोशिश लगभग 40 देशों में शुरू हो गई है। विभिन्न देश अपनी करंसी में व्यापार को महत्व देने लगे हैं। इसका एक बड़ा लाभ यह है, विकासशील देशों पर डॉलर का दबाव कम होता जा रहा है। मुद्रा की अस्थिरता का जोखिम भी कम हो रहा है। इस नई व्यवस्था से विभिन्न देशों को अपने विदेशी मुद्रा भंडार में विविधता लाने और सोने जैसी सुरक्षित संपत्तियों पर भरोसा बढ़ाने का अवसर मिल रहा है। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में वैकल्पिक भुगतान प्रणालियो में चीन का सीआईपीएस रूस का, एसपीएफएस और भारत का यूपीआई का प्रभाव तेजी के साथ वैश्विक व्यापार में बढ़ रहा है। जो अर्थव्यवस्था के बड़े बदलाव का संकेत है। इजराइल-हमास युद्ध के दौरान अमेरिका द्वारा संयुक्त राष्ट्र में बार-बार वीटो का इस्तेमाल करने से वैश्विक असंतोष और विभिन्न देशों के बीच में असुरक्षा की भावना को बढ़ा दिया है। जिसके कारण डॉलर के स्थान पर मिश्रित मुद्राओं में वैश्विक व्यापार की नई शुरुआत हो गई है। ग्लोबल साउथ के देशों में यह धारणा बन चुकी है, कि अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं निष्पक्ष तरीके से अपना काम नहीं कर रहीं हैं। यही कारण है कि अब कई देश पश्चिमी दबदबे को चुनौती देने के लिए आर्थिक सहयोग और वैश्विक लेन-देन में मिश्रित मुद्राओं के जरिए लेन-देन करने की ओर बढ़ रहे हैं। कुल मिलाकर अमेरिका, यूरोपीय देश और इजराइल की आक्रामक नीतियों ने अनजाने में ही सही एक नई वैश्विक सोच को जन्म दे दिया है। लोकल करंसी में व्यापार का बढ़ता चलन यह दर्शाता है। दुनिया धीरे-धीरे एक अधिक संतुलित और बहुध्रुवीय आर्थिक व्यवस्था की ओर बढ़ रही है। यह बदलाव कितना प्रभावी होगा, यह आने वाला समय तय करेगा। इस परिवर्तन का स्पष्ट संकेत है। वैश्विक व्यापार में डॉलर की पुरानी व्यवस्था अब पहले जैसी मजबूत नहीं रही। दिन प्रतिदिन डॉलर को विभिन्न देशों से चुनौती मिल रही है। अमेरिका की साहूकारी में यह सबसे बड़ा झटका है। डॉलर मुद्रा के रूप में वैश्विक व्यापार होने से अमेरिका को बड़ी कमाई होती थी। अमेरिका की दादागिरी दुनिया के सभी देशों में देखने को मिलती थी, लेकिन जब से रूस और चीन जैसे देशो से चुनौती मिलना शुरू हुई है। विशेष रूप से जब रूस जैसी महाशक्ति की मुद्रा को अमेरिका और यूरोपीय देशों ने अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बता रूस की संपत्ति और मुद्रा को सीज कर प्रतिबंध लगाया, तो उसका भय सारी दुनिया के देशों में फैला। रही सही कसर इजराइल और फिलिस्तीन में गाजा युद्ध के दौरान जो दादागिरी अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के सामने अमेरिका और इजराइल की रही उसने एक नई सोच को जन्म दे दिया है। आज विभिन्न देश आपस में यह तय करने में लगे हैं कि भुगतान किस-किस मुद्रा में कितने प्रतिशत में किया जाएगा। यूपीआई आ जाने के कारण अब वैश्विक व्यापार में लेन-देन यूपीआई के जरिए तुरंत होने लगा है जिसके कारण डॉलर मुद्रा को सारे विश्व से चुनौती मिलना शुरू हो गई है। सभी दुनिया के देशों ने अपने विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर का भंडारण कम करके उसके स्थान पर सोने का भंडारण करना शुरू कर दिया है। जिन देशों के साथ उनके कारोबारी रिश्ते हैं। वह अपनी जरूरत के अनुसार विभिन्न मुद्राओं में भुगतान करके डॉलर से बच रहे हैं। इससे अमेरिका को दोहरा नुकसान हो रहा है। डॉलर में भुगतान होने के कारण अमेरिका की अर्थव्यवस्था को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जो लाभ हो रहा था। वह धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। विभिन्न देशों के सेंट्रल बैंक में विदेशी मुद्रा में डॉलर को प्राथमिकता मिलने से डॉलर मजबूत होता था। अब डॉलर के स्थान पर सभी देशों के सेंट्रल बैंक सोने को मुद्रा के विकल्प के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है, जिसके कारण अमेरिका को सारी दुनिया के देशों से एक अलग आर्थिक चुनौती मिलना शुरू हो गई है। अमेरिका का प्रभाव कम हो रहा है। यदि यही स्थिति आगे भी देखने को मिलती रही, तो अमेरिका की दादागिरी जल्द ही खत्म होने वाली है। जिस तरह से सोवियत रूस के हाल हुए थे, वही स्थितियां अब अमेरिका में बनने लगी हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप उत्तेजना में जिस तरह के निर्णय कर रहे हैं, उसके कारण वैश्विक स्तर पर अमेरिका की साख दिन प्रतिदिन कम होती चली जा रही है। वहीं अमेरिका के लिए आर्थिक चुनौतियां भी बढ़ती चली जा रही हैं। ईएमएस/01/01/2026