राज्य
08-Jan-2026
...


* कोल इंडिया के पुरे हुए 50 साल * मशीनीकरण की चमक के पीछे बढ़ता ठेका प्रथा का बोझ और उजड़ते ग्राम एवं उनकी सिसकियाँ * प्रबंधन की संवेदनहिनता से लगातार पनप रहा आक्रोश कोरबा (ईएमएस) 1 नवंबर 1975 को जब देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए कोल इंडिया लिमिटेड की नींव रखी गई तब इसके पास 6.70 लाख स्थायी कर्मचारियों की फौज थी, आज 2024-25 में यह तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। कोयला खदानों में मशीनों का शोर बढ़ा है और उत्पादन में 3 गुना की ऐतिहासिक वृद्धि भी हुई है, लेकिन इस विकास की कीमत उन मजदूरों ने चुकाई है जिनकी नौकरियां खत्म हो गईं और उन किसानों ने जिनकी जमीनें खदानों में समा गईं। * उत्पादन का नया कीर्तिमान-रोजगार का ब्लैकआउट गूगल में संकलित आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि कोल इंडिया में पिछले तीन दशकों में स्थायी कार्यबल में 65% की भारी गिरावट आई है, वर्ष 1995 में जब कंपनी 237 मिलियन टन कोयला निकाल रही थी तब 6.40 लाख स्थायी कर्मचारी तैनात थे। आज उत्पादन बढ़कर 773 मिलियन टन (वर्ष 2024-25) पहुंच गया है, लेकिन स्थायी कर्मचारी घटकर मात्र 2.20 लाख रह गए हैं। इस खाई को भरने के लिए ठेका प्रथा का सहारा लिया गया है। अकेले एसईसीएल (साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड) में आज लगभग 44,000 स्थायी कर्मियों के मुकाबले 1,07,626 ठेका मजदूर काम कर रहे हैं यानी प्रबंधन अब स्थायी रोजगार देने के बजाय सस्ते और अस्थाई श्रम पर निर्भर है। * एसईसीएल पर आरोप-माटीपुत्रो की जमीन अधिग्रहित की लाखों एकड़ में, नौकरी मिली नगण्यो को छत्तीसगढ़ की लाइफलाइन कही जाने वाली एसईसीएल ने अब तक 1,85,575 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया है। लेकिन इस भूमि के बदले मिलने वाले रोजगार की रफ्तार सुस्त है, पिछले तीन वर्षों में जहां 1,85,000 एकड़ से अधिक जमीन अधिग्रहित हुई उसके एवज में केवल 1200 लोगों को रोजगार दिया गया, वहीं सीधी भर्ती में भी केवल 1300 लोगों को ही मौका मिला। * बड़ी विडम्बना-बढ़ता कोयला खनन उत्पादन-गेवरा-दीपका की विभिषिका एशिया की सबसे बडी कोयला परियोजनाओं में शुमार गेवरा दीपका और कुसमुंडा में खनन के परिणाम स्वरूप अंचल की रत्नगर्भा लगभग 7805 हेक्टेयर कृषि भूमि का अस्तित्व ही विलुप्त हो गया है। आने वाले समय में 5000 हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि का अर्जन प्रस्तावित है। खेती योग्य भूमि के कम होने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था चरमरा गई है। * गेवरा परियोजना में पुनर्वास-व्यवस्थापन गेवरा परियोजना में 20 से ज्यादा गांवों का अस्तित्व समेट कर विलुप्त कर चुकी है जबकि पुनर्वास-व्यवस्थापन की स्थिति यह है कि प्रभावित ग्रामो में बुनियादी सुविधाओं का नितांत अभाव है। * प्रबंधन की नाकामी, आवासों पर कब्जा और संसाधनों की बर्बादी एक ओर जहां कंपनी नए आवासों के निर्माण पर करोड़ों खर्च कर रही है वहीं दूसरी ओर पुराने संसाधनों का प्रबंधन करने में नाकाम साबित हो रही है। कोल इंडिया के पास 3.80 लाख आवास हैं जबकि कर्मचारी केवल 2.20 लाख हैं। अकेले गेवरा क्षेत्र में 3200 क्वार्टर्स में से 250 पर अवैध कब्जा है। प्रबंधन इन अवैध कब्जाधारियों को हटाने के बजाय उनके बिजली और पानी का खर्च वहन कर रहा है जो सीधे तौर पर राजस्व की हानि है। * पुनर्वास की बदहाली प्रभावित ग्रामो के लिए बनाई गई नीतियां केवल कागजों तक सीमित रह गयी हैं। विस्थापितों को मिलने वाला मुआवजा और सुविधाएं ऊंट के मुंह में जीरे के समान हैं। * सुरक्षा और वेतन विसंगति ठेका मजदूरों से काम तो स्थायी कर्मचारियों जैसा लिया जा रहा है लेकिन उन्हें मिलने वाली सुरक्षा और वेतन में जमीन-आसमान का अंतर है। * कृषि का संकट उपजाऊ भूमि के खनन क्षेत्र में तब्दील होने से भविष्य में खाद्य सुरक्षा की चुनौती पैदा हो सकती है।कोल इंडिया और उसकी सहायक कंपनियां उत्पादन के नए शिखर तो छू रही हैं लेकिन कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) और मानवीय संवेदनाओं के मोर्चे पर पीछे छूटती नजर आ रही हैं। यदि रोजगार पुनर्वास और स्थायी कार्यबल पर ध्यान नहीं दिया गया, तो यह काला सोना स्थानीय समुदायों के लिए केवल काला अंधेरा बनकर रह जाएगा। उल्लेखनीय हैं की उपरोक्त समस्त आंकड़े गूगल से प्राप्त है आधिकारिक अधिकृत आंकड़े पृथक संभावित हो सकते है। 08 जनवरी / मित्तल