-नागरिकों की सुरक्षा और सामरिक हितों की रक्षा के लिए तीन मंत्रियों की उच्च स्तरीय संकटकालीन समिति गठितएक्शन शुरू मिडिल ईस्ट संकट,स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ और भारत की ऊर्जा सुरक्षा-वैश्विक भू-राजनीति के बीच रणनीतिक संतुलन की चुनौती मिडिल ईस्ट की भू-राजनीति चाहे जिस दिशा में जाए, ऊर्जा सुरक्षा आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय राजनीति और अर्थव्यवस्था की सबसे निर्णायक शक्ति बनी रहेगी वैश्विक स्तरपर 21वीं सदी की वैश्विक राजनीति में ऊर्जा संसाधन केवल आर्थिक विकास का आधार नहीं रहे, बल्कि वे रणनीतिक शक्ति, कूटनीति और भू- राजनीतिक संघर्षों का केंद्र बन चुके हैं। विशेष रूप से पश्चिम एशिया यानें मिडिल ईस्ट क्षेत्र विश्व की ऊर्जा राजनीति का धुरी रहा है। वर्तमान में ईरान, अमेरिका और इज़राइल के बीच बढ़ता सैन्य तनाव एक ऐसे मोड़ पर पहुंच चुका है जहां इसका प्रभाव केवल क्षेत्रीय सीमाओं तक सीमित नहीं है बल्कि पूरी दुनियाँ की ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और आर्थिक स्थिरता पर पड़ रहा है।इसी पृष्ठभूमि में दुनियाँ का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री ऊर्जा मार्ग स्ट्राइट ऑफ़ होर्मूज़ वैश्विक चर्चा के केंद्र में आ गया है।यह जलडमरूमध्य विश्व के तेल व्यापार कीजीवनरेखा माना जाता है। यहां होने वाली किसी भी अस्थिरता का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर तुरंत दिखाई देता है। हाल के दिनों में इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों पर हमलों,ड्रोन हमलों औरसंभावित खदान बिछाने की खबरों ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों को अस्थिर कर दिया है।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि इसी कारण भारत सहित कई देशों ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर सतर्कता बढ़ा दी है।मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव को भारत सरकार ने अत्यंत गंभीरता से लिया है। भारत दुनियाँ का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है और उसकी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है। ऐसे में किसी भी प्रकार की आपूर्ति बाधा सीधे भारत की अर्थव्यवस्था और आम लोगों के जीवन को प्रभावित कर सकती है।इसी संभावित खतरे को देखते हुए भारत सरकार ने उच्च स्तर पर तैयारी शुरू कर दी है। केंद्र सरकार ने स्थिति की निगरानी और संभावित संकट से निपटने के लिए तीन सदस्यीय मंत्री समूह का गठन किया है जिसकीअध्यक्षता देश के गृहमंत्री कर रहे हैं। इस समिति में विदेश मंत्री और पेट्रोलियम मंत्री भी शामिल हैं।यह समिति विभिन्न मंत्रालयों और ऊर्जा कंपनियों के साथ मिलकर लगातार स्थिति की समीक्षा कर रही है। सरकार का उद्देश्य स्पष्ट है देश में पेट्रोल, डीज़ल, गैस और एलपीजी की आपूर्ति किसी भी परिस्थिति में बाधित न हो।पीएम कार्यालय ने भी इस विषय पर सभी संबंधित विभागों से समन्वय स्थापित करने और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत बनाए रखने के निर्देश दिए हैं। साथियों बात अगर हम ऊर्जा सुरक्षा और घरेलू आपूर्ति : सरकार की प्राथमिकता को समझने की करें तो भारत की ऊर्जा जरूरतें तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के साथ लगातार बढ़ रही हैं।औद्योगिक उत्पादन, परिवहन, कृषि और घरेलू उपयोग सभी क्षेत्रों में पेट्रोलियम उत्पादों की मांग अत्यधिक है। इस कारण सरकार यह सुनिश्चित करने का प्रयास कर रही है कि अंतरराष्ट्रीय संकट का असर भारतीय उपभोक्ताओं पर न्यूनतम हो।तेल कंपनियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे पर्याप्त भंडारण बनाए रखें और वितरण व्यवस्था को सुचारु रखें। इसके अलावा घरेलू एलपीजी सिलेंडर की आपूर्ति को प्राथमिकता देने के लिए विशेष व्यवस्थाएं की जा रही हैं। कुछ क्षेत्रों में एलपीजी की अस्थायी कमी की खबरें जरूर सामने आई हैं, जिससे लोगों में चिंता बढ़ी है, लेकिन सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह व्यापक संकट नहीं है बल्कि वितरण व्यवस्था से जुड़ी स्थानीय समस्या हो सकती है।सरकार ने इस स्थिति को नियंत्रित करने के लिए विशेष कंट्रोल रूम भी स्थापित किया है ताकि देशभर में एलपीजी की उपलब्धता पर लगातार निगरानी रखी जा सके। यह कदम इस बात का संकेत है कि भारत सरकार संभावित संकट से पहले ही तैयारी करना चाहती है। साथियों बात अगर हम स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ वैश्विक ऊर्जा व्यापार की धुरी को समझने की करें तो,दुनियाँ के ऊर्जा मानचित्र में यदि किसी एक समुद्री मार्ग को सबसे अधिक रणनीतिक महत्व प्राप्त है तो वह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ है। यह जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है और यही मार्ग खाड़ी देशों से निकलने वाले तेल और गैस को दुनिया के विभिन्न हिस्सों तक पहुंचाता है।भौगोलिक दृष्टि से यह जलडमरूमध्य उत्तर में ईरान और दक्षिण में ओमान तथा संयुक्त अरब अमीरात के बीच स्थित है।इसकी चौड़ाई प्रवेश और निकास पर लगभग 50 किलोमीटर है जबकि सबसे संकरे हिस्से में यह लगभग 33 किलोमीटर रह जाती है। इसके बावजूद यह इतना गहरा है कि दुनिया के सबसे बड़े तेल टैंकर भी यहां से गुजर सकते हैं।हर महीने लगभग 3000 से अधिक जहाज इस मार्ग से गुजरते हैं और विश्व के लगभग 30 प्रतिशत तेल की आपूर्ति इसी रास्ते से होती है। यही कारण है कि इसे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का “चोकपॉइंट” कहा जाता है। यदि इस मार्ग में थोड़ी भी बाधा आती है तो तेल की कीमतें तुरंत प्रभावित हो जाती हैं। साथियों बात अगर हम समुद्री हमले और वैश्विक चिंता को समझने की करें तो हाल के दिनों में इस समुद्री मार्ग में कई संदिग्ध घटनाएं सामने आई हैं। कुछ जहाजों पर अज्ञात प्रोजेक्टाइल से हमले की खबरें आईं, जबकि एक जहाज में आग लगने के बाद उसे खाली कराना पड़ा। इन घटनाओं ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार और ऊर्जा बाजारों को चिंतित कर दिया है।अमेरिकी सैन्य सूत्रों ने दावा किया है कि उन्होंने इस मार्ग में ईरान से जुड़े 16 माइन बिछाने वाले जहाजों को नष्ट कर दिया है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इससे यह स्पष्ट हो गया है कि यह क्षेत्र अब एकसंभावित सैन्य संघर्ष का केंद्र बन चुका है।समुद्री मार्गों पर इस तरह की अस्थिरता वैश्विक व्यापार के लिए गंभीर खतरा है क्योंकि तेल टैंकरों और मालवाहक जहाजों की सुरक्षा सीधे अंतरराष्ट्रीय बाजारों की स्थिरता से जुड़ी होती है। साथियों बात अगर हम तेल की कीमतें और वैश्विक अर्थव्यवस्था को समझने की करें तो,ऊर्जा बाजार में अस्थिरता का सबसे बड़ा प्रभाव तेल की कीमतों पर पड़ता है। जब भी पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ता है तो वैश्विक बाजारों में तेल की कीमतें तेजी से ऊपर जाती हैं। हाल के दिनों में भी ऐसा ही देखने को मिला है।ईरान ने चेतावनी दी है कि यदि क्षेत्रीय संघर्ष जारी रहा और ऊर्जा मार्ग अस्थिर बने रहे तो कच्चे तेल की कीमत 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है। विशेष रूप से ईरान के सैन्य अधिकारियों का कहना है कि लगातार बमबारी और सैन्य गतिविधियों से क्षेत्रीय सुरक्षा कमजोर हो रही है और इसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर पड़ना तय है।यदि तेल की कीमतें वास्तव में 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचती हैं तो इसका असर केवल ऊर्जा बाजार तक सीमित नहीं रहेगा। इससे परिवहन, खाद्य उत्पादन, औद्योगिक लागत और वैश्विक व्यापार सभी प्रभावित होंगे। परिणामस्वरूप दुनिया भर में महंगाई बढ़ सकती है। साथियों बात अगर हम क्या ईरान बंद कर सकता हैस्ट्रेट ऑफ होर्मुज़? इसको समझने की करें तो, यह प्रश्न आज वैश्विक रणनीतिक चर्चा का प्रमुख विषय बन चुका है कि क्या ईरान वास्तव में इस जलडमरूमध्य को बंद कर सकता है। अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों के अनुसार किसी भी देश को अपनी तटरेखा से लगभग12 नॉटिकल मील तक समुद्री क्षेत्र पर नियंत्रण का अधिकार होता है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ के सबसे संकरे हिस्से में यह मार्ग ईरान और ओमान के समुद्री क्षेत्र के भीतर आता है। इस कारण यहां से गुजरने वाले जहाजों को इन दोनों देशों के क्षेत्रीय जल से होकर गुजरना पड़ता है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत उन्हें ट्रांजिट पैसेज का अधिकार प्राप्त होता है, जिसका अर्थ है कि वे इस मार्ग से गुजर सकते हैं।यदि ईरान इस मार्ग को बाधित करना चाहे तो वह समुद्र में माइंस बिछाकर, नौसैनिक गश्त बढ़ाकर या ड्रोन हमलों के जरिए जहाजों को निशाना बना सकता है। हालांकि ऐसा करने पर उसे अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया और सैन्य जवाबी कार्रवाई का भी सामना करना पड़ सकता है। साथियों बात कर हम भारत पर संभावित प्रभाव को समझने की करें तो,यदि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ में गंभीर बाधा उत्पन्न होती है तो इसका सबसे बड़ा असर एशिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं भारत, चीन और जापान पर पड़ेगा। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आयात करता है और इसमें पश्चिम एशिया का महत्वपूर्ण योगदान है।यदि इस मार्ग से तेल की आपूर्ति बाधित होती है तो भारत को न केवल अधिक कीमत पर तेल खरीदना पड़ेगा बल्कि वैकल्पिक स्रोतों की तलाश भी करनी होगी। इससे भारत की ऊर्जा लागत बढ़ सकती है और महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है।एलपीजी, पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि का सीधा असर आम जनता की जेब पर पड़ेगा। परिवहन महंगा होगा, उद्योगों की लागत बढ़ेगी और इससे आर्थिक गतिविधियों पर भी प्रभाव पड़ सकता है।विशेषज्ञों की सलाह और भारत की रणनीतिक दिशाऊर्जा संकट की संभावनाओं को देखते हुए कई विशेषज्ञों और संस्थानों ने भारत सरकार को कुछ महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं।ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव ने सुझाव दिया है कि भारत को घरेलू आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए अस्थायी रूप से पेट्रोल और डीजल के निर्यात पर रोक लगाने पर विचार करना चाहिए।इसके अलावा रूस जैसे देशों के साथ दीर्घकालिक तेल आपूर्ति समझौते करने की सलाह दी गई है ताकि वैश्विक संकट के समय भी भारत को स्थिर आपूर्ति मिल सके। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अपनी ऊर्जा नीति में अधिक रणनीतिक स्वायत्तता अपनानी चाहिए और राष्ट्रीय हितों के आधार पर निर्णय लेने चाहिए। अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि ऊर्जा सुरक्षा और भू-राजनीति का नया युग शुरू मिडिल ईस्ट में चल रहा संकट केवल एकक्षेत्रीय संघर्ष नहीं है बल्कि यह वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था की नाजुकता को उजागर करता है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ जैसे रणनीतिक मार्गों पर निर्भरता ने दुनिया को यह एहसास दिलाया है कि ऊर्जा सुरक्षा केवल आर्थिक मुद्दा नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।भारत जैसे तेजी से विकसित हो रहे देश के लिए यह चुनौती और भी बड़ी है क्योंकि उसकी ऊर्जा जरूरतें लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे में सरकार द्वारा पहले से तैयारी करना, भंडारण बढ़ाना, वैकल्पिक स्रोत तलाशना और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को मजबूत करना अत्यंत आवश्यक है।वर्तमान संकट यह भी संकेत देता है कि भविष्य की ऊर्जा नीति केवल आयात पर निर्भर नहीं रह सकती। नवीकरणीय ऊर्जा, सामरिक भंडारण और बहु-स्रोत आपूर्ति जैसे उपाय ही भारत को वैश्विक ऊर्जा अस्थिरता से सुरक्षित रख सकते हैं।मिडिल ईस्ट की भू-राजनीति चाहे जिस दिशा में जाए, एक बात स्पष्ट है ऊर्जा सुरक्षा आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय राजनीति और अर्थव्यवस्था की सबसे निर्णायक शक्ति बनी रहेगी। और इसी चुनौती के बीच भारत को अपनी रणनीतिक दूरदृष्टि और संतुलित कूटनीति के साथ आगे बढ़ना होगा। -संकलनकर्ता लेखक - क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी)