लेख
13-Mar-2026
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भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में संसद वह स्थान है जहां जनता से जुड़े हर बड़े मुद्दे पर गंभीर और जिम्मेदार चर्चा होनी चाहिए लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि हाल के वर्षों में विपक्ष की राजनीति का एक बड़ा हिस्सा केवल हंगामा और अफवाह फैलाने तक सीमित होता जा रहा है। एलपीजी सिलेंडर को लेकर संसद के बाहर हुई नारेबाजी और आरोपों की बौछार इसी प्रवृत्ति का उदाहरण है। हाल ही में संसद परिसर में विपक्षी सांसदों ने नारे लगाए कि नरेंदर भी गायब और सिलेंडर भी गायब इस तरह के नारे सुनने में भले ही आकर्षक लगते हों लेकिन यह देश की वास्तविक समस्याओं का समाधान नहीं हैं बल्कि यह केवल राजनीतिक माहौल को गरमाने की कोशिश भर है ।जनता यह समझती है कि देश की ऊर्जा जरूरतों और वैश्विक परिस्थितियों जैसे गंभीर विषयों को केवल नारेबाजी से नहीं, बल्कि ठोस नीति और विवेकपूर्ण चर्चा से हल किया जा सकता है। नेता विपक्ष राहुल गांधी ने यह दावा किया कि आने वाले समय में ईंधन का बड़ा संकट पैदा हो सकता है और इसके लिए उन्होंने सरकार की विदेश नीति को जिम्मेदार ठहराया लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि वर्तमान समय में पूरी दुनिया ऊर्जा आपूर्ति की चुनौतियों से जूझ रही है ,पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और युद्ध जैसी स्थिति ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को अस्थिर कर दिया है। ऐसे में किसी एक देश की सरकार को पूरी तरह जिम्मेदार ठहराना वास्तविकता से दूर और राजनीतिक बयानबाजी ज्यादा प्रतीत होता है। भारत जैसे विशाल देश की ऊर्जा जरूरतें बहुत बड़ी हैं और इन्हें पूरा करने के लिए सरकार को कई स्तरों पर लगातार प्रयास करने पड़ते हैं ।पिछले कुछ वर्षों में भारत ने ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत बनाने के लिए अनेक कदम उठाए हैं। विभिन्न देशों के साथ दीर्घकालिक समझौते किए गए हैं। आपूर्ति के नए स्रोत तलाशे गए हैं और वैकल्पिक ऊर्जा पर भी बड़े पैमाने पर निवेश किया गया है। सौर ऊर्जा हरित हाइड्रोजन और हरित अमोनिया जैसे क्षेत्रों में भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है ताकि भविष्य में ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भरता बढ़ सके। इसके बावजूद विपक्ष लगातार यह माहौल बनाने की कोशिश कर रहा है कि देश किसी बड़े संकट की ओर बढ़ रहा है ।संसद में चर्चा से पहले ही सड़क और संसद परिसर में विरोध प्रदर्शन कर देना यह दिखाता है कि विपक्ष का उद्देश्य समाधान निकालना नहीं बल्कि डर का वातावरण बनाना है। लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना विपक्ष का अधिकार है लेकिन जब सवाल तथ्यों के बजाय आशंकाओं और अफवाहों पर आधारित हों तो वह राजनीति से ज्यादा भ्रम फैलाने का माध्यम बन जाते हैं। एलपीजी को लेकर भी यही स्थिति देखने को मिली। कुछ स्थानों पर लंबी कतारों की खबरें सामने आईं तो उसे तुरंत राष्ट्रीय संकट के रूप में पेश किया जाने लगा जबकि सरकार और कई जनप्रतिनिधियों ने स्पष्ट किया कि देश में एलपीजी की वास्तविक कमी नहीं है। कई जगह लोगों ने घबराहट में जरूरत से ज्यादा सिलेंडर जमा करने शुरू कर दिए जिससे अस्थायी दबाव की स्थिति बन गई। जेडीयू सांसद संजय कुमार झा ने भी यही बात कही कि कई लोग एक साथ चार चार सिलेंडर घर में जमा कर रहे हैं जिससे कृत्रिम कमी का माहौल बन रहा है यह स्थिति तब और ज्यादा गंभीर हो जाती है जब राजनीतिक बयानबाजी के कारण लोगों के मन में डर बैठ जाता है और वे जरूरत से अधिक सामान खरीदने लगते हैं। विपक्ष को यह समझना चाहिए कि देश की जनता अब पहले से अधिक जागरूक है वह केवल आरोप और नारे सुनकर निर्णय नहीं करती बल्कि यह भी देखती है कि कौन जिम्मेदारी से बात कर रहा है और कौन केवल माहौल बिगाड़ने की कोशिश कर रहा है ।जब देश अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों से जूझ रहा हो तब राजनीतिक दलों से अपेक्षा की जाती है कि वे संयम और जिम्मेदारी का परिचय दें। सरकार ने स्पष्ट कहा है कि इस मुद्दे पर संसद में विस्तृत चर्चा होगी और पेट्रोलियम मंत्री हरदेवसिंह पूरी सदन में स्थिति स्पष्ट करेंगे लोकतंत्र में यही उचित तरीका है कि गंभीर मुद्दों पर संसद के भीतर तथ्य और आंकड़ों के साथ बहस हो लेकिन विपक्ष ने पहले से ही संकट का वातावरण बनाकर यह संदेश देने की कोशिश की कि देश किसी बड़े खतरे में है। यह भी याद रखना चाहिए कि भारत ने पिछले कुछ वर्षों में कई वैश्विक संकटों का सामना सफलतापूर्वक किया है। महामारी का कठिन दौर हो या वैश्विक आर्थिक अस्थिरता हर बार देश ने धैर्य और मजबूत नेतृत्व के बल पर चुनौतियों को पार किया है ।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार ने ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में भी कई दीर्घकालिक योजनाएं शुरू की हैं ।जिनका उद्देश्य आने वाले वर्षों में देश को अधिक सुरक्षित और आत्मनिर्भर बनाना है। आज भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में तेजी से आगे बढ़ रहा है। ऐसे समय में देश को स्थिरता और विश्वास की आवश्यकता है लेकिन जब विपक्ष बार बार संकट और असफलता की कहानी गढ़ने की कोशिश करता है तो उससे देश की छवि और जनता का मनोबल दोनों प्रभावित होते हैं। संसद में स्वस्थ बहस लोकतंत्र की ताकत होती है लेकिन जब बहस के स्थान पर हंगामा और अफवाह को प्राथमिकता दी जाती है तो लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा भी प्रभावित होती है। जनता यह अपेक्षा करती है कि उसके प्रतिनिधि संसद में गंभीरता से मुद्दों पर चर्चा करें और समाधान खोजें न कि केवल नारेबाजी करके सुर्खियां बटोरें। एलपीजी को लेकर उठे इस विवाद ने एक बार फिर यह दिखा दिया है कि विपक्ष की राजनीति का बड़ा हिस्सा अब भी अफवाह और आशंका पर आधारित है जबकि देश को ऐसी राजनीति की आवश्यकता है जो समाधान और सहयोग की दिशा में आगे बढ़े। लोकतंत्र में असहमति स्वाभाविक है लेकिन असहमति जिम्मेदारी के साथ होनी चाहिए। यदि विपक्ष वास्तव में जनता की चिंता करता है तो उसे संसद के भीतर तथ्य आधारित चर्चा करनी चाहिए और सरकार से जवाब मांगना चाहिए लेकिन बिना पूरी जानकारी के संकट का माहौल बनाना और लोगों के मन में डर पैदा करना यह केवल राजनीतिक लाभ के लिए किया गया प्रयास माना जाएगा। भारत की जनता यह भली भांति समझती है कि देश की चुनौतियों का समाधान नारेबाजी से नहीं बल्कि धैर्य नीति और सहयोग से निकलता है और यही लोकतंत्र की असली ताकत भी है। ईएमएस/13/03/2026