लेख
13-Mar-2026
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12 मार्च 2026 की स्थिति के अनुसार, ईरान-इजरायल-अमेरिका के बीच फारस की खाड़ी में गंभीर तनाव और संघर्ष जारी है, जो 12वें दिन में प्रवेश कर चुका है। ईरान द्वारा समर्थित गुटों ने अमेरिकी और खाड़ी देशों के तेल टैंकरों पर हमले किए हैं, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति पर संकट खड़ा हो गया है। युद्ध की स्थिति का सीधा असर होटल मालिकों पर पड़ने वाला है। संभावना है कि कमर्शियल सिलेंडर का स्टॉक खत्म होने पर होटल को जल्द ही बंद करना पड़ सकता है। कमर्शियल सिलेंडर की कमी पूरे देश में एलपीजी का संकट है एलपीजी सप्लाई में रुकावट का असर अब इंडिया इंक पर भी पड़ रहा है, कुछ कंपनियों ने कुकिंग गैस की कमी के कारण कैफेटेरिया और फूड सर्विस पर असर पड़ने की वजह से ऑपरेशनल दिक्कतों की रिपोर्ट दी है। साथ ही, मुंबई, बेंगलुरु और कोलकाता जैसे शहरों में कमर्शियल एलपीजी सप्लाई में रुकावट की खबरें आई हैं, रेस्टोरेंट और खाने की जगहों को सिलेंडर खरीदने में मुश्किल हो रही है और कुछ मामलों में मेन्यू कम कर दिए गए हैं या ऑपरेशन कम कर दिए गए हैं। कई राज्यों में पुलिस ने भी एलपीजी सप्लाई को लेकर अफवाहों के बीच मॉनिटरिंग बढ़ा दी है, और गलत जानकारी, जमाखोरी और सिलेंडर की चोरी के खिलाफ सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी है। हालांकि, सरकार का कहना है कि पूरे देश में एलपीजी का कोई संकट नहीं है और सप्लाई को स्थिर करने के लिए रिफाइनरी का आउटपुट लगभग 10% बढ़ा दिया गया है। एलपीजी सप्लाई, सरकार की प्रतिक्रिया और भारतीय शहरों की स्थिति पर लेटेस्ट अपडेट के लिए इस लाइव ब्लॉग को फॉलो करें। एलपीजी सप्लाई की कमी से पूरे भारत में होटल, रेस्टोरेंट पर असर है युद्ध के इस दौर में, गोबर से बनी बायोगैस या गोबर के उपले एलपीजी का एक आत्मनिर्भर और किफायती विकल्प प्रदान करते हैं।चूल्हा एक ऐसा उपकरण है जो स्थानीय ताप या खाना पकाने के लिए उपकरण के अंदर या ऊपर ऊष्मा उत्पन्न करता है। चूल्हे कई प्रकार के ईंधनों से चल सकते हैं, जैसे प्राकृतिक गैस, बिजली, गैसोलीन, लकड़ी और कोयला। चूल्हे के निर्माण के लिए सबसे आम सामग्री कच्चा लोहा, इस्पात और पत्थर हैं। चूल्हे और गोबर के उपले भारतीय ग्रामीण जीवन, संस्कृति और परंपरा के अभिन्न अंग हैं। मिट्टी के चूल्हे और गोबर के उपले न केवल सस्ते और आसानी से उपलब्ध ईंधन हैं, बल्कि आत्मीयता और पवित्रता का भाव भी रखते हैं। आत्मनिर्भरता, सादगी और पर्यावरण मित्रता के प्रतीक के रूप में ग्रामीण जीवन का प्रतिनिधित्व करते हैं। स्वास्थ्य पर प्रभाव: पुराने धुंआ उत्सर्जित करने वाले चूल्हे महिलाओं और बच्चों में श्वसन संबंधी बीमारियों का कारण बन सकते हैं, इसलिए लोग अब धुआं रहित चूल्हों की ओर बढ़ रहे हैं। आत्मनिर्भरता की कहानी: कई परिवार बायोगैस के माध्यम से आत्मनिर्भर हो गए हैं, वे गोबर से 8-10 घंटे तक चूल्हे को जलाते हैं। चूल्हा और गोइठा का संबंध केवल भोजन पकाने से नहीं, बल्कि एक जीवनशैली से है जो हमें प्रकृति के करीब रखती है। यह हमारे पूर्वजों की विरासत और सादगी का प्रतीक है, जिसे आज भी ग्रामीण भारत में संजोकर रखा गया है। छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिला में आज भी लोग पुराने और पारंपरिक ईंधनों का उपयोग न सिर्फ अपने दैनिक जीवन में कर रहे हैं, बल्कि परंपराओं के अनुसार धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं को भी पूरी श्रद्धा के साथ निभा रहे हैं. होली के पर्व से पहले गांवों में घरों में पाले गए मवेशियों के गोबर से गोईठा बनाया जाता है.मान्यता है कि गोबर शुद्धता और पवित्रता का प्रतीक होता है, यही कारण है कि होली के दिनों में गोईठा की मांग बढ़ जाती है. कई लोग इसे बनाकर बेचते हैं, वहीं जिनके पास गोईठा उपलब्ध नहीं होता, वे गांवों से इसे लाकर होलिका दहन करते हैं. यह परंपरा न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ी हुई है, बल्कि ग्रामीण संस्कृति और सदियों पुरानी जीवनशैली की गहराई को भी दर्शाती है. चूल्हा और गोइठा: ग्रामीण जीवन के प्रतीक पारंपरिक संस्कृति: गाँव में मिट्टी के चूल्हे पर बना खाना - विशेषकर रोटी, दाल और बाटी - स्वाद और सौंधी महक के लिए जाना जाता है। (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 13 मार्च /2026