अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति ने वैश्विक व्यापार व्यवस्था की बुनियाद को झकझोर कर रख दिया है। “अमेरिका फर्स्ट” के नारे के तहत ट्रंप ने आयात शुल्क को अमेरिका का नीतिगत वैश्विक दादागिरी का हथियार बना दिया है। इसके दायरे में चीन, रूस, यूरोप के देश अथवा विकासशील सभी देश शामिल हैं। ट्रम्प की इस नीति ने केवल द्विपक्षीय व्यापार को नहीं, बल्कि विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) की प्रासंगिकता को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है। वैश्विक व्यापार संधि का मूल सिद्धांत, अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत सभी देशों के बीच में व्यापार करने की सुविधा थी। ट्रंप प्रशासन ने स्टील, एल्युमिनियम, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य उत्पादों पर एक तरफा टैरिफ लगाकर वैश्विक व्यापार संधि के नियमों को खुली चुनौती दी है। अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर लगाए गए ये टैरिफ दरअसल अमेरिका के संरक्षणवाद और दादागिरी का नया चेहरा है। सबसे चिंताजनक पहलू यह है, अमेरिका ने डब्ल्यूटीओ की विवाद निपटान प्रणाली को ही पंगु बना दिया है। अपीलीय निकाय में जजों की नियुक्ति को रोक कर सारे विश्व को यह संदेश दे दिया गया है। यदि फैसले अमेरिका के अनुकूल न हों, तो वह संस्थान ही निष्क्रिय कर दो। दुनिया के सभी देश अमेरिका की इस दादागिरी का विरोध भी नहीं कर रहे हैं। डोनाल्ड ट्रंप का यह रवैया वैश्विक व्यापार संधि की नियम-आधारित व्यवस्था से हटकर ताकत-आधारित व्यवस्था की ओर ढकेल रहा है। ट्रंप के टैरिफ के कारण वैश्विक आपूर्ति एवं लेन-देन की व्यवस्थाएं बुरी तरह से प्रभावित हुईं हैं। अमेरिका सहित दुनिया के देशों में महंगाई और बेरोजगारी बढ़ी है। दुनिया के देशों में आर्थिक एवं सामरिक अनिश्चितता का माहौल बना है। विकासशील देशों के लिए यह स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण हो गई है। क्योंकि वह न तो प्रतिशोधात्मक टैरिफ लगाने की स्थिति में हैं और ना हीं वैश्विक व्यापार संधि के नियमों के तहत उन्हें न्याय मिल पा रहा है। वैश्विक व्यापार संधि के नियमों के अनुसार त्वरित न्याय पाने की आशा भी पूरी तरह से खत्म हो गई है। वैश्विक व्यापार संधि, जिसने सारी दुनिया के देशों को एक दूसरे से जोड़ने का काम किया था। वह व्यवस्था एक ऐसे चौराहे पर आकर खड़ी हो गई है। जहां पर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की दादागिरी देखने को मिल रही है। अमेरिका के एकाधिकार वाद ने बहुपक्षवाद की व्यवस्था को कड़ी चुनौती दी है। वैश्विक व्यापार संधि की संस्थाओं और नियमों का पालन नहीं होने के कारण सारी दुनिया के देश अधिनायकवाद की व्यवस्था से फिर एक बार जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं। जो वैश्विक शांति के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है। दूसरी ओर राष्ट्रवादी संरक्षणवाद की दादागिरी की ट्रंप-नीति ने यह साफ कर दिया है, यदि सबसे शक्तिशाली देश नियम तोड़ने लगे, तो संस्थाएँ केवल कागज़ी बनकर रह जाती हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद और अन्य वैश्विक संस्थाओं का लगभग यही हाल हैं। वैश्विक व्यापार सन्धि कुछ देशों की राजनीतिक इच्छाओं का बंधक बनकर रह जाएगी? या वैश्विक व्यापार संधि के नियमों में सुधार कर फिर से इसे वैश्विक स्तर पर प्रभावी बनाया जाएगा? इसकी जिम्मेदारी केवल अमेरिका की नहीं है। पूरी दुनिया के देशों की सामूहिक समझदारी एवं जिम्मेदारी पर ही वैश्विक व्यापार संधि का भविष्य निर्भर करता है। वैश्विक व्यापार संधि यदि टूटती है तो इसका असर विकासशील देशों पर तो पड़ेगा ही सारी दुनिया के देशों के लिए आर्थिक मंदी का खतरा भी बड़ी तेजी के साथ बढ़ेगा। वैश्विक व्यापार संधि लागू होने के बाद दुनिया के सारे देशों की सरकारें भारी कर्ज में हैं। आम नागरिक भी कर्ज के बोझ से दबे हुए हैं। वैश्विक व्यापार संधि के माध्यम से आर्थिक विकास रोजगार और सामाजिक विकास को बढ़ाने के लिए जो कर्ज की व्यवस्था शुरू की गई थी, उससे अब कोई भी नहीं बचा है। वैश्विक व्यापार संधि को कमजोर करना वैश्विक अर्थ व्यवस्था को कमजोर करना है। इसकी कीमत सभी देशों को चुकानी पड़ेगी। दुनिया के साथ से ज्यादा देशों में आर्थिकमंदी, बेरोजगारी और महंगाई के खिलाफ अभी आंदोलन चल रहे हैं। वर्तमान में जो लोग सत्ता में बैठे हुए हैं, उन्हें चुनौती मिल रही है। आम जनता महंगाई और बेरोजगारी के कारण त्रस्त है। जिसके कारण दुनिया में आर्थिक मंदी आने के बाद दुनिया के देशों में आपसी विवाद बड़ी तेजी के साथ बढ़ेंगे। यह स्थिति तीसरे विश्व युद्ध को भी जन्म दे सकती है। इस तरह की धारणाएं बनने लगी हैं। ईएमएस / 11 जनवरी 26