काबुल,(ईएमएस)। अफगानिस्तान में सत्ता पर काबिज तालिबान के भीतर गंभीर अंदरूनी संघर्ष के संकेत तेजी से उभर रहे हैं। काबुल और कंधार के बीच बढ़ती खींचतान ने साफ कर दिया है कि आंदोलन अब पहले जैसी एकजुट इकाई नहीं रहा। हाल ही में लीक हुई ऑडियो क्लिप ने संकट को सार्वजनिक किया हैं, जिसमें तालिबान के सुप्रीम लीडर हिबतुल्लाह अखुंदजादा खुद यह चेतावनी दे रहे हैं कि आंतरिक मतभेद “इस्लामिक अमीरात के पतन” का कारण बन सकते हैं। बात दें कि तालिबान के भीतर मूल रूप से दो प्रमुख धड़े उभर कर सामने आए हैं। पहला धड़ा कंधार आधारित है, जिसका नेतृत्व अखुंदजादा करते हैं। यह गुट एक अत्यंत कठोर, बंद और धार्मिक शासन का समर्थक है, जहां समाज के हर पहलू पर धार्मिक नेताओं का नियंत्रण हो और अफगानिस्तान बाहरी दुनिया से लगभग कटकर रहे। महिलाओं की शिक्षा, मीडिया की स्वतंत्रता और वैश्विक संपर्क इस दृष्टिकोण में लगभग अस्वीकार्य हैं। दूसरा धड़ा काबुल केंद्रित है, जिसमें आंतरिक मंत्री सिराजुद्दीन हक्कानी सबसे प्रभावशाली चेहरा हैं। यह गुट यथार्थवादी और व्यावहारिक रुख अपनाने के पक्ष में माना जाता है। इनके अनुसार, तालिबान को सत्ता में टिके रहने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से सीमित ही सही, लेकिन संवाद रखना होगा। अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण, विदेशी सहायता और महिलाओं की बुनियादी शिक्षा जैसे मुद्दों पर यह गुट अपेक्षाकृत लचीला नजर आता है। सितंबर में इंटरनेट और फोन सेवाओं को बंद करने और फिर काबुल गुट द्वारा उन्हें बहाल कर देने की घटना इस टकराव का सबसे ठोस उदाहरण मानी जा रही है। यह कदम तालिबान की परंपरागत अनुशासन व्यवस्था के बिल्कुल खिलाफ था, जहां अमीर के आदेश को अंतिम और अटल माना जाता रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह घटना तालिबान के भीतर “मौन विद्रोह” का संकेत है। दिलचस्प बात यह है कि अखुंदजादा को 2016 में सर्वोच्च नेता इसलिए चुना गया था क्योंकि उन्हें सहमति बनाने वाला व्यक्ति माना जाता था। सैन्य अनुभव की कमी के कारण उन्होंने हक्कानी जैसे युद्धक कमांडर पर भरोसा किया। लेकिन आज वही हक्कानी उनके सबसे बड़े राजनीतिक चुनौतीकर्ता बनते दिख रहे हैं। यह संघर्ष फिलहाल खुली टूट में नहीं बदला है, लेकिन संकेत स्पष्ट हैं अगर कंधार और काबुल के बीच संतुलन नहीं बना, तो तालिबान की एकता, और शायद उसका शासन भी, गंभीर खतरे में पड़ सकता है। आशीष दुबे / 15 जनवरी 2026