-बिजली तारों से हुई मौतों के चलते अंडरग्राउंड करवाए तार, तीन हजार डेमोइसेल क्रेन को बचाया जोधपुर,(ईएमएस)। जानवरों से प्यार तो लगभग सभी को होता है लेकिन इतना प्यार कि अपना सब कुछ इनके लिए न्यौछावर कर दें। ऐसी दीवानगी और पक्षियों के लिए प्यार जोधपुर के खीजन में देखने को मिला। यहां खीचन (फलोदी) के सेवाराम, जैसा नाम-वैसा ही इनका काम है। पेशे से मजदूर सेवाराम 27 साल से पक्षियों की सेवा कर रहे हैं। इस दौरान तीन हजार कुरजा का रेस्क्यू किया है। इनके प्रयासों से पक्षियों की राह में आने वाले बिजली के तार अंडरग्राउंड कर दिए गए हैं। सेवाराम ने अपना घर भी हर साल साइबेरिया से आने वाली डेमोइसेल क्रेन (कुरजां) के लिए समर्पित कर दिया है। उनका यह घर टूरिस्ट स्पॉट बन गया है। सेवाराम की सेवा के किस्से रूस, मंगोलिया, ब्रिटेन, अमेरिका तक पहुंच चुके हैं। इन देशों में उन पर कई आर्टिकल छप चुके हैं। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक सेवाराम माली ने बताया कि स्कूल के दिनों की बात है। उन्होंने देखा कि एक कुरजां (डेमोइसेल क्रेन) बिजली के तार से करंट की चपेट में आकर घायल हो गई। वे उसे पांच किलोमीटर दूर रेस्क्यू सेंटर ले गए। तभी से उनका इन कुरजां से रिश्ता बन गया। 27 साल में सेवाराम ने तीन हजार कुरजां को रेस्क्यू किया। सभी रेस्क्यू पक्षियों का रिकॉर्ड भी रजिस्टर में मेंटेन है। उनका कहना है कि बिजली के तार से कुरजां के टकराकर घायल होने व जान गंवाने के मामले को उन्होंने यह कदम उठाया। इसके बाद कोर्ट ने संज्ञान लेकर क्षेत्र में बिजली के तारों को अंडरग्राउंड करने का आदेश दिया। सेवाराम का घर अब टूरिस्ट पॉइंट बन चुका है। सेवाराम के घर के पास का क्षेत्र कुरजां का चुग्गा घर है। सुबह 20 से 25 हजार कुरजां यहां आकर दाना चुगती हैं और एक साथ उड़ान भरती हैं। सुबह-सुबह का यह नजारा देखने देसी–विदेशी टूरिस्ट सेवाराम के घर आते हैं। छत से डेमोइसेल क्रेन की अठखेलियां देखते हैं। कैमरे में कैद करते हैं। सेवाराम हर दिन कुरजां कितने बजे आती हैं? कितने बजे दाना चुगती हैं? कितनी बजे उड़ कर तालाब की तरफ जाती हैं…यह सब डिटेल रजिस्टर में मेंशन करते हैं। यही नहीं कितनी कुरजां आईं, उनकी संख्या भी लिखते हैं। चुग्गा घर में आने वाली कुरजां के पैरों में टैग लगे होते हैं, जिसकी जानकारी भी सेवाराम रखते हैं। सेवाराम को 2001 में कॉर्पोरेट सोशल रेस्पोंसबिलिटी फंड से एंबुलेंस गिफ्ट मिली हैं। घायल पक्षियों को सेवाराम इस एंबुलेंस में अस्पताल ले जाते हैं। सेवाराम इस एंबुलेंस का रखरखाव व डीजल की व्यवस्था अपने स्तर पर करते हैं। खीचन में ही बर्ड रेस्क्यू सेंटर बने, इसकी मांग लंबे समय से हो रही है। सेवाराम ने बताया कि इसके लिए जमीन मिल चुकी है। बजट मिला, लेकिन लैप्स हो गया। तालाब के चारों ओर लगी जाली को हटा कर दीवार बनाने की मांग कर रहे हैं, ताकि पक्षियों की जान बच सके। सिराज/ईएमएस 18जनवरी26