मनोरंजन
19-Jan-2026
...


मुंबई (ईएमएस)। हाल ही में 19वें जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के उद्घाटन सत्र में पहुंचे मशहूर गीतकार और लेखक जावेद अख्तर ने अपने शुरुआती करियर के दिनों को याद करते हुए बताया कि उस दौर में असिस्टेंट डायरेक्टर की स्थिति कितनी अपमानजनक हुआ करती थी। उन्होंने कहा कि जब वह पहली बार फिल्म इंडस्ट्री में असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर आए थे, तब इस पद को कोई इज्जत नहीं मिलती थी। असिस्टेंट डायरेक्टर्स से तरह-तरह के छोटे और अपमानजनक काम करवाए जाते थे। जावेद अख्तर के मुताबिक, उस समय उनसे कहा जाता था कि मैडम के जूते उठा लाओ, हीरो का कोट या जैकेट कहां है, ये सब तुम्हें ही देखना है। उन्होंने कहा कि उस दौर में असिस्टेंट डायरेक्टर हीरो का नाम लेने की भी हिम्मत नहीं कर सकता था। आज के समय में जब वह देखते हैं कि असिस्टेंट डायरेक्टर्स बड़े सितारों को नाम से बुलाते हैं, तो उन्हें यह बदलाव देखकर हैरानी होती है और थोड़ा डर भी लगता है। जावेद अख्तर ने कहा कि आज फिल्म इंडस्ट्री काफी हद तक व्यवस्थित और प्रोफेशनल हो चुकी है। काम के बंटवारे और सम्मान में बड़ा बदलाव आया है, जो इंडस्ट्री के लिए एक सकारात्मक संकेत है। उन्होंने इस बदलाव को समय के साथ आई समझ और प्रोफेशनलिज्म का नतीजा बताया। इस कार्यक्रम में जावेद अख्तर ने सेकुलरिजम पर भी अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि सेकुलर सोच को केवल भाषणों या लेक्चर तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि इसे जीवन का हिस्सा बनाना चाहिए। अगर कोई चीज सिर्फ एक दिन समझाई जाए तो वह बनावटी हो जाती है और लंबे समय तक टिकती नहीं है। लेकिन जब लोग इसे अपने बड़ों, अपने आसपास के समाज और रोजमर्रा की जिंदगी में जीते हुए देखते हैं, तो यह स्वाभाविक रूप से इंसान के अंदर समा जाती है। अपने बचपन को याद करते हुए जावेद अख्तर ने एक दिलचस्प किस्सा भी साझा किया। उन्होंने बताया कि वह अपनी नानी के घर में रहते थे और उनके नाना 50 पैसे का लालच देकर उन्हें धार्मिक शिक्षा देना चाहते थे। लेकिन उनकी नानी ने इसका विरोध किया और कहा कि किसी को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी पर धर्म थोपे। जावेद अख्तर ने कहा कि उसी दिन उनकी धार्मिक शिक्षा वहीं खत्म हो गई। उस समय उन्हें 50 पैसे न मिलने का अफसोस जरूर हुआ था, लेकिन आज जब वह उस घटना को याद करते हैं तो नानी की समझदारी और संवेदनशीलता पर गर्व महसूस करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि काश आज के नेताओं में उस साधारण महिला की संवेदनशीलता का थोड़ा सा अंश भी होता। बता दें कि जावेद अख्तर ने जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के मंच से न सिर्फ अपने जीवन के अनुभव साझा किए, बल्कि फिल्म इंडस्ट्री के बदलते चेहरे और समाज में सेकुलर सोच की अहमियत पर भी खुलकर बात की। सुदामा/ईएमएस 19 जनवरी 2026