संगम नगरी प्रयागराज में चल रहे माघ मेले में रविवार को मौनी अमावस्या के मौके पर गंगा स्नान को लेकर ज्योतिष पीठ शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के भक्तों और पुलिस के बीच जमकर बवाल हुआ। इसके बाद पुलिस ने उनके भक्तों को घसीटते हुए ले गई और शंकराचार्य को बिना स्नान किए वापस जाना पड़ा। अपने और अपने भक्तों के साथ हुई कथित अभद्रता के बाद अब शंकराचार्य अपने शिविर के बाहर धरने पर बैठ गए। शंकराचार्य ने कहा है कि जब तक पुलिस प्रशासन ससम्मान प्रोटोकॉल के साथ नहीं ले जाएगा तब तक गंगा स्नान नहीं करूंगा। आपको थोड़ा विस्तार से बता दें प्रयागराज के माघ मेले में मौनी अमावस्या के पावन अवसर पर उस समय तनाव की स्थिति पैदा हो गई, जब प्रशासन ने ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के काफिले को संगम तट पर जाने से रोक दिया। संगम पर भारी भीड़ को देखते हुए पुलिस ने शंकराचार्य से उनके पालकी रथ से उतरकर पैदल आगे बढ़ने का अनुरोध किया था। शंकराचार्य के अनुयायी रथ के साथ ही आगे बढ़ना चाहते थे। इस दौरान पुलिस और समर्थकों के बीच तीखी बहस और धक्का-मुक्की हुई। आरोप है इस व्यवहार से नाराज होकर शंकराचार्य ने संगम में स्नान करने से मना कर दिया और वहीं धरने पर बैठ गए। सवाल उठता है कि ऐसे भीड़ भरे माहौल में जहां करोड़ों लोग स्नान के लिए आ रहे हैं वहाँ पुलिस और प्रशासन के कंधों पर व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी है क्योंकि बीते साल इसी प्रयागराज में कुम्भ के मेले में तमाम सावधानी के बावजूद भगदड़ में बहुत से लोग अपनी जान गंवा बैठे थे ऐसे हालात को रोकने के लिए यदि प्रशासन किसी सम्मानीय शंकराचार्य से कर जोड़ कर विनती करता है कि आप मात्र पांच सौ कदम पालकी रथ से उतर कर स्नान कर लीजिए और शंकराचार्य महोदय भीड़ नियंत्रण और व्यवस्था बनाए रखने की तमाम प्राथमिकता को दर किनार कर नदी तट तक अपने अनुयायियों समेत रथ में सवार होकर ही जाने की जिद पर उतर आएं तो इसे क्या कहेंगे? क्या कुछ कदम पैदल चलने मात्र से उनकी प्रतिष्ठा कम हो जाती? क्या शंकराचार्य के गरिमामयी पद पर भी वह अराजकता फैलाने की कोशिश में हैं? या जानबूझकर कर ऐसा हरकत करना चाहते हैं कि उत्तर प्रदेश की योगी सरकार और उनके पुलिस प्रशासन को घेर कर चर्चा में आने की जुगत की जाए? क्या यही एक धर्म गुरु शंकराचार्य का आचरण है? अब आपको उस सनातन संस्कृति और सभ्यता का हवाला देते हैं जिसके पावन पुनीत ग्रंथ रामचरितमानस में लिखा है संतन्ह के लच्छन रघुबीरा। कहहु नाथ भव भंजन भीरा॥ हे रघुवीर! हे भव-भय (जन्म-मरण के भय) का नाश करने वाले मेरे नाथ! अब कृपा कर संतों के लक्षण कहिए!... श्री रामजी ने कहा- बिरति बिबेक बिनय बिग्याना। बोध जथारथ बेद पुराना॥ दंभ मान मद करहिं न काऊ। भूलि न देहिं कुमारग पाऊ॥3॥ भावार्थ - संत वैराग्य, विवेक, विनय, विज्ञान (परमात्मा के तत्व का ज्ञान) और वेद-पुराण का यथार्थ ज्ञान रहता है। वे दम्भ, अभिमान और मद कभी नहीं करते और भूलकर भी कुमार्ग पर पैर नहीं रखते हैं। षट बिकार जित अनघ अकामा। अचल अकिंचन सुचि सुखधामा॥ अमित बोध अनीह मितभोगी। सत्यसार कबि कोबिद जोगी।। भावार्थ : वे संत (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर- इन) छह विकारों (दोषों) को जीते हुए, पापरहित, कामनारहित, निश्चल (स्थिरबुद्धि), अकिंचन (सर्वत्यागी), बाहर-भीतर से पवित्र, सुख के धाम, असीम ज्ञानवान्, इच्छारहित, मिताहारी, सत्यनिष्ठ, कवि, विद्वान, योगी हैं। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का अहम प्रशासन की व्यवस्था को स्वीकार करने में आड़े आ रहा था या वह जानबूझकर टकराव की स्थिति पैदा करना चाहते थे। कमिश्नर सौम्या अग्रवाल, पुलिस कमिश्नर जोगिंदर कुमार और डीएम मनीष कुमार वर्मा के मनाने के बाद भी जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद नहीं माने तो पुलिस ने बलपूर्वक उनको वहां से हटाना शुरू किया. इस दौरान साधु- संन्यासियों ने विरोध करना शुरू किया, जिससे बाद हाथापाई हो गई.पुलिस कर्मियों और साधुओं के बीच तीखी झड़प हुई. इसके बाद कुछ साधुओं को पुलिसकर्मियों ने घसीट कर वहां से हटा दिया. इस दौरान उनके अनुयायियों और पुलिस बल के बीच तीखी झड़प भी हुई. पुलिस ने कई अनुयायियों को हिरासत में भी लिया है.शंकराचार्य के अनुयायियों का आरोप है कि शंकराचार्य के रथ को पुलिस के जवानों ने सादी वर्दी में खींचकर संगम नोज से 1 किलोमीटर दूर छोड़ दिया. यह शंकराचार्य का अपमान है. इस तरह स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद बिना मौनी अमावस्या स्नान के ही वापस लौट गए. जिस समय पुलिस साधुओं को बल पूर्वक हटा रही थी शंकराचार्य काफी क्रोध में नजर आए. अविमुक्तेश्वरानंद ने मीडिया से कहा है कि पिछले 39 सालों से वह इसी परंपरा का निर्वहन करते हुए मौनी अमावस्या का स्नान करते रहे हैं. शंकराचार्य होने के बाद गरिमा के अनुरूप उन्होंने पालकी पर सवार होकर संगम स्नान करते रहे हैं. शिविर से मुझे पुलिस अधिकारियों ने ही अपनी सुरक्षा में लेकर संगम नोज तक पहुंचाया था. मैं रथ पर इसलिए सवार होकर आया था कि यहां लाखों श्रद्धालु आए हैं. अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि अगर मैं पैदल जाता तो वह मुझे प्रणाम करने, मुझसे बात करने का प्रयास करते. ऐसे में भगदड़ मच सकती थी. मैं शंकराचार्य हूं और अपने गरिमा के अनुरूप ही पालकी से मौनी अमावस्या के स्नान के लिए जाना चाह रहा था. प्रशासन ने रोका है. यह उनसे पूछा जाना चाहिए कि यह किस नियम के विरुद्ध है. उधर प्रयागराज की मंडल आयुक्त सौम्या अग्रवाल ने मामले पर मीडिया से बातचीत में कहा कि माघ मेले में पालकी- रथ से किसी भी साधु सन्यासी को संगम तक आने की अनुमति नहीं है. पूर्व में माघ मेले में ना ही इस तरह की कोई परंपरा रही है. शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने किसी तरह की परमिशन भी नहीं ले रखी थी.यहां पहुंचने के बाद मैंने और पुलिस कमिश्नर जोगेंद्र कुमार ने उनसे बात की. उन्हें समझाने का प्रयास किया कि आप यहां तक आ ही गए हैं तो अब रथ से उतरकर संगम में जाकर स्नान कीजिए. उनसे बहुत मिन्नत की गई, लेकिन स्वामी जी पालकी और अपने 200 अनुयायियों के साथ संगम में स्नान करने की जिद पर अड़े रहे। पुलिस कमिश्नर जोगिंदर कुमार ने मीडिया को बताया कि संगम क्षेत्र में 452 सौ सीसीटीवी कैमरे लगे हैं उनकी जांच कराई जाएगी, जिसने वेरिफिकेशन तोड़ी है उसके खिलाफ हम कैसे रजिस्टर्ड करेंगे. मौनी अमावस्या के स्नान में लाखों श्रद्धालु इस वक्त संगम में स्नान कर रहे हैं लिहाजा सुरक्षा से किसी भी तरह की खिलवाड़ नहीं की जा सकती है. यह कानून का सीधा उल्लंघन है और लाखों श्रद्धालुओं की जान के साथ खिलवाड़ भी. इसमें सीसीटीवी फुटेज खंगाला जा रहा है, प्राथमिकी दर्ज होगी. आपको बता दें कि मौनी अमावस्या के स्नान में श्रद्धालुओं के आने का सिलसिला देर शाम तक जारी रहा रात तक 4 से 5 करोड़ श्रद्धालुओं ने संंगम में स्नान कर पुन्य अर्जित किया . मेला क्षेत्र को नो व्हीकल जोन घोषित किया गया है। अब शंकराचार्य के मामले को लेकर विपक्षी भी मैदान में उतर आएं हैं उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा है कि बीजेपी सरकार ‘दिव्य-भव्य’ के दावे से पहले ‘सभ्य’ बने। अखिलेश यादव ने एक्स’ पर कहा, सदियों से चली आ रही शाही-स्नान की अखंड सनातनी परंपरा में गत वर्ष भी इसी सरकार द्वारा विघ्न डाला गया था। प्रश्न ये है कि ऐसी घटनाएं बीजेपी की सरकार में ही क्यों हो रही हैं। मौनी अमावस्या का शाही-स्नान क्या पहली बार हो रहा है? इस अवस्था के लिए बीजेपी का कुशासन और नाकाम व्यवस्था ही दोषी है। सवाल फिर वही है कि आज के दौर में धार्मिक गुरु भी राजनीतिक खेमेबाजी फर्जी अभिमान और अहंकार से ग्रस्त हैं शंकराचार्य जैसे गरिमामयी पदवी पर विराजमान होकर भी यदि हम सांसारिक मद मान पर नियंत्रण नहीं कर पाए तो समाज को संयम सदाचार का पाठ कैसे पढ़ाएंगे? बहरहाल हमारा तो यही सुझाव है कि माननीय शंकराचार्य राजनीतिक पूर्वाग्रह दुराग्रह से बाहर निकल रामचरितमानस की पंक्तियों पर चिंतन करें- संत ह्रदय नवनीत समाना और संत ह्रदय जस निर्मल बारि को चरितार्थ करें। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं) ईएमएस / 19 जनवरी 26