लंदन(ईएमएस)।ग्रीनलैंड के स्वामित्व और वहां सैन्य उपस्थिति को लेकर अमेरिका और यूरोप के बीच छिड़ा विवाद अब एक खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा यूरोपीय देशों पर 10 फीसदी टैरिफ (आयात शुल्क) लगाने की घोषणा के बाद पश्चिमी देशों का गठबंधन बिखरता नजर आ रहा है। जहां जर्मनी ने दबाव में आकर अपने कदम पीछे खींच लिए हैं, वहीं आठ अन्य यूरोपीय देशों ने अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत करते हुए अमेरिका के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। ताजा सैन्य घटनाक्रम में, जर्मनी की सेना ने ग्रीनलैंड से अपनी ‘टोही टीम’ को वापस बुलाना शुरू कर दिया है। रिपोर्टों के अनुसार, 15 जर्मन सैनिक एक नागरिक उड़ान से कोपेनहेगन के लिए रवाना हो रहे हैं। विश्लेषक इसे राष्ट्रपति ट्रंप की उस धमकी के सीधे असर के रूप में देख रहे हैं, जिसमें उन्होंने डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन, फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, नीदरलैंड और फिनलैंड से आने वाले सामानों पर भारी टैरिफ लगाने का ऐलान किया था। जर्मनी की अर्थव्यवस्था पहले से ही मंदी के दौर से गुजर रही है, ऐसे में बर्लिन अमेरिका के साथ सीधे व्यापार युद्ध का जोखिम उठाने से बच रहा है। अमेरिकी प्रशासन ने जो टैरिफ का गणित पेश किया है, वह बेहद सख्त है। 1 फरवरी से इन आठ देशों के सामानों पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगेगा, जिसे 1 जून से बढ़ाकर 25 प्रतिशत कर दिया जाएगा। ट्रंप ने स्पष्ट कर दिया है कि ये प्रतिबंध तब तक जारी रहेंगे जब तक अमेरिका को ग्रीनलैंड खरीदने की अनुमति नहीं मिल जाती। यह इतिहास में पहली बार है जब किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने ही नाटो सहयोगियों के खिलाफ क्षेत्रीय विस्तार के लिए आर्थिक प्रतिबंधों का सहारा लिया है। भले ही जर्मनी ने अपने सैनिक हटा लिए हों, लेकिन यूरोपीय संघ का नेतृत्व झुकने को तैयार नहीं है। यूरोपीय संघ की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने स्पष्ट किया कि आर्कटिक में यूरोपीय देशों की गतिविधियां किसी के लिए खतरा नहीं हैं और यूरोप अपनी संप्रभुता बनाए रखने के लिए एकजुट रहेगा। वहीं, यूरोपीय संघ की विदेश नीति प्रमुख काजा कैलास ने चेतावनी दी कि अमेरिका और यूरोप का यह आपसी झगड़ा रूस और चीन जैसे देशों के लिए जश्न का अवसर है। उन्होंने कहा कि सहयोगियों के बीच विभाजन का सीधा लाभ दुश्मनों को मिलेगा और इससे यूक्रेन युद्ध जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों से ध्यान भटकेगा। फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने भी ट्रंप के इस कदम की कड़ी निंदा की है। मैक्रों ने दो टूक कहा कि राष्ट्रों की संप्रभुता पर कोई समझौता नहीं होगा और टैरिफ की धमकियां पूरी तरह से अस्वीकार्य हैं। अब पूरी दुनिया की नजरें 1 फरवरी की समयसीमा पर टिकी हैं। यदि ट्रंप अपने आदेश पर अडिग रहते हैं, तो यह पश्चिमी दुनिया की एकता के अंत और एक नई, अस्थिर विश्व व्यवस्था की शुरुआत हो सकती है। वीरेंद्र/ईएमएस/19जनवरी2026 -----------------------------------