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19-Jan-2026
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- अमेरिकी होलोकॉस्ट म्यूज़ियम की चेतावनी - सामूहिक हिंसा के खतरे में भारत का वैश्विक सूची में चौथा स्थान - 7.5 फीसदी जोखिम का आकलन नई दिल्ली (ईएमएस)। संयुक्त राज्य अमेरिका के होलोकॉस्ट मेमोरियल म्यूज़ियम की एक अहम रिपोर्ट ने भारत को लेकर गंभीर चेतावनी जारी की है। म्यूज़ियम के अर्ली वार्निंग प्रोजेक्ट द्वारा दिसंबर 2025 में जारी वार्षिक वैश्विक आकलन के अनुसार, भारत अगले दो वर्षों में नागरिकों के खिलाफ बड़े पैमाने पर हिंसा (मास एट्रॉसिटी) के जोखिम वाले देशों में चौथे स्थान पर है। इस अध्ययन में कुल 168 देशों का विश्लेषण किया गया है। रिपोर्ट की सबसे चिंताजनक बात यह है कि भारत उन देशों में शीर्ष पर है, जहां फिलहाल बड़े पैमाने पर सामूहिक हत्याएं नहीं हो रहीं, लेकिन भविष्य में इसके भड़कने की आशंका सबसे अधिक है। यानी भारत को एक संभावित नए “फ्लैशपॉइंट” के रूप में देखा जा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 2026 के अंत तक नागरिकों के खिलाफ सुनियोजित सामूहिक हिंसा होने की आशंका 7.5 प्रतिशत है। शोधकर्ता “सामूहिक हिंसा” को ऐसे मामलों के रूप में परिभाषित करते हैं, जहां किसी समूह की पहचान जैसे धर्म, जातीयता, राजनीति या भौगोलिक आधार के कारण एक साल के भीतर कम से कम 1000 गैर-लड़ाकू नागरिकों की हत्या की जाती है। भारत से ऊपर जिन तीन देशों को रखा गया है, वे हैं म्यांमार, चाड और सूडान। हालांकि इन देशों में पहले से ही बड़े पैमाने पर हिंसा और गृह संघर्ष जारी हैं। ऐसे में भारत की स्थिति अलग और अधिक ध्यान देने योग्य मानी जा रही है, क्योंकि यहां अभी व्यापक स्तर पर ऐसी हिंसा नहीं हो रही, लेकिन जोखिम संकेत तेजी से उभर रहे हैं। यह अध्ययन अमेरिकी होलोकॉस्ट मेमोरियल म्यूज़ियम और डार्टमाउथ कॉलेज के शोधकर्ताओं ने मिलकर किया है। इसमें बीते कई दशकों के आंकड़ों का विश्लेषण कर यह समझने की कोशिश की गई कि सामूहिक हिंसा से पहले देशों में कौन-से समान लक्षण दिखाई देते हैं। फिर उन्हीं संकेतों को मौजूदा हालात से मिलाया गया। रिपोर्ट में सवाल उठाया गया है कि “आज कौन-से देश उन देशों से सबसे ज्यादा मिलते-जुलते हैं, जहां अतीत में सामूहिक हत्याएं शुरू होने से एक-दो साल पहले ऐसे हालात बने थे?” इस मॉडल में 30 से ज्यादा कारकों को शामिल किया गया है, जिनमें जनसंख्या का आकार, आर्थिक स्थिति, राजनीतिक स्वतंत्रता, आंतरिक संघर्ष और सशस्त्र गतिविधियां शामिल हैं। ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो हर साल औसतन एक या दो देशों में नई सामूहिक हिंसा की घटनाएं शुरू होती हैं। म्यूज़ियम के साइमन-स्क्जोड्ट सेंटर फॉर द प्रिवेंशन ऑफ जेनोसाइड के रिसर्च डायरेक्टर लॉरेंस वूचर ने रिपोर्ट की प्रस्तावना में लिखा है कि इस अध्ययन का उद्देश्य सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों को समय रहते चेतावनी देना है, ताकि वे रोकथाम पर संसाधन केंद्रित कर सकें। उन्होंने कहा, “होलोकॉस्ट रोका जा सकता था। चेतावनी संकेतों को गंभीरता से लेकर और समय रहते कदम उठाकर जानें बचाई जा सकती हैं।” हालांकि रिपोर्ट यह भी साफ करती है कि यह कोई पक्की भविष्यवाणी नहीं है। शोधकर्ता मानते हैं कि मॉडल कारण और परिणाम को सीधे नहीं जोड़ता। उदाहरण के लिए, किसी देश की बड़ी जनसंख्या अपने आप में हिंसा का कारण नहीं होती, लेकिन ऐतिहासिक रूप से बड़े देशों में सामूहिक हिंसा की घटनाएं अधिक देखी गई हैं, इसलिए इसे जोखिम संकेतक माना जाता है। रिपोर्ट में भारत सहित शीर्ष 30 जोखिम वाले देशों के लिए सिफारिश की गई है कि नीति-निर्माता यह आकलन करें कि क्या वे नागरिकों के खिलाफ संभावित व्यवस्थित हिंसा के खतरे को पर्याप्त गंभीरता से ले रहे हैं या नहीं। साथ ही यह भी पूछा गया है कि चुनाव, राजनीतिक उथल-पुथल, बड़े विरोध प्रदर्शन या सामाजिक तनाव जैसे कौन-से ट्रिगर हालात को विस्फोटक बना सकते हैं। शोधकर्ताओं ने अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और राष्ट्रीय सरकारों से आग्रह किया है कि वे अपने स्तर पर विस्तृत जोखिम मूल्यांकन करें और समाज की उन ताकतों को मजबूत करें, जो हिंसा को रोकने में मदद कर सकती हैं। रिपोर्ट का कहना है की यह सिर्फ एक चेतावनी है, अंतिम फैसला नहीं। लेकिन अगर इतिहास से सबक लिया जाए, तो ऐसे संकेतों को नज़रअंदाज़ करना भारी पड़ सकता है।